“सरना-सनातन एक ही संस्कृति के प्रतीक… हिंदू जन्म से होते हैं, बनाए तो ईसाई-मुसलमान जाते हैं” : बाबूलाल

झारखंड भाजपा नेता एवं नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने सरना, सनातन और हिंदू को एक समान बताते हुए कांग्रेस और झामुमो पर आदिवासी समाज को बांटने की राजनीति करने का आरोप लगाया। पेसा कानून नियमावली से ‘रूढ़ि’ शब्द हटाने पर भी उन्होंने सरकार को घेरा।

“सरना-सनातन एक ही संस्कृति के प्रतीक… हिंदू जन्म से होते हैं, बनाए तो ईसाई-मुसलमान जाते हैं” : बाबूलाल
बाबूलाल मरांडी के बयान से झारखंड की राजनीति गरमाई।

रांची (Threesocieties.com Desk): झारखंड की राजनीति में आदिवासी पहचान, सरना धर्म और सनातन को लेकर एक बार फिर बड़ा सियासी विवाद खड़ा हो गया है। नेता प्रतिपक्ष Baboolal Marandi ने कांग्रेस और झामुमो पर आदिवासी समाज को बांटने की राजनीति करने का गंभीर आरोप लगाया है।

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रविवार को हरमू स्थित भाजपा प्रदेश कार्यालय में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में बाबूलाल मरांडी ने कहा कि “सरना, सनातन और हिंदू में कोई अंतर नहीं है। इनकी परंपराएं, प्रकृति पूजा और सांस्कृतिक मूल समान हैं।” उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज सदियों से पेड़, पहाड़, पत्थर, जल और धरती माता की पूजा करता आया है और यही परंपरा सनातन संस्कृति में भी देखने को मिलती है।

“हिंदू बनाए नहीं जाते, जन्म से होते हैं”

मरांडी ने अपने बयान में कहा कि देश में हिंदू बनाने की कोई परंपरा नहीं रही है। उन्होंने कहा— “हिंदू बनाए नहीं जाते, वे जन्म से होते हैं। बनाए तो ईसाई और मुसलमान जाते हैं।” उनके इस बयान के बाद राज्य की राजनीति में नई बहस शुरू हो गई है। राजनीतिक जानकार मान रहे हैं कि आने वाले समय में सरना धर्म, आदिवासी पहचान और धार्मिक राजनीति का मुद्दा और तेज हो सकता है।

कांग्रेस और झामुमो पर बड़ा हमला

नेता प्रतिपक्ष ने कांग्रेस और Jharkhand Mukti Morcha पर आरोप लगाते हुए कहा कि दोनों दल वोट बैंक की राजनीति के लिए आदिवासी समाज में विभाजन पैदा कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि कांग्रेस अंग्रेजों की “फूट डालो और राज करो” नीति पर काम कर रही है और अब समाज को तोड़ने के लिए नए-नए हथकंडे अपनाए जा रहे हैं। मरांडी ने कहा कि जब देश में कांग्रेस का जनाधार कमजोर हो रहा है, तब वह समाज को धार्मिक और जातीय आधार पर बांटकर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर रही है।

पेसा कानून नियमावली पर भी उठाए सवाल

बाबूलाल मरांडी ने राज्य सरकार द्वारा पेसा कानून की नियमावली से ‘रूढ़ि’ शब्द हटाने पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि यह आदिवासी समाज की पारंपरिक व्यवस्था और संस्कृति को कमजोर करने की कोशिश है। उनके मुताबिक आदिवासी समाज की परंपराएं, रीति-रिवाज और ग्राम व्यवस्था उनकी पहचान का हिस्सा हैं, जिन्हें समाप्त नहीं किया जा सकता।

“सरना स्थल बचेंगे तभी संस्कृति बचेगी”

मरांडी ने कहा कि राज्यभर में सरना, मसना और पहनाई जैसी पारंपरिक धार्मिक स्थलों की जमीन लगातार अतिक्रमण और माफियाओं के कब्जे में जा रही है। उन्होंने सरकार से मांग की कि आदिवासी पूजा स्थलों को संरक्षित, सुरक्षित और विकसित किया जाए ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी संस्कृति और परंपराओं से जुड़ी रहें। उन्होंने कहा— “जब तक सरना स्थल और पारंपरिक धार्मिक जमीन सुरक्षित नहीं होगी, तब तक आदिवासी संस्कृति भी सुरक्षित नहीं रह पाएगी।”

झारखंड की राजनीति में बढ़ सकती है गर्मी

मरांडी के इस बयान के बाद झारखंड की राजनीति में एक बार फिर सरना बनाम सनातन की बहस तेज होने की संभावना है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले चुनावों में आदिवासी पहचान और धार्मिक मुद्दे प्रमुख चुनावी एजेंडा बन सकते हैं।