HighLights :
- कार्तिक मास 27 अक्टूबर से 24 नवंबर तक, व्रत-त्योहारों की रहेगी धूम
- करवा चौथ, धनतेरस, दीपावली और गोवर्धन पूजा समेत कई प्रमुख पर्व
- 13 से 16 नवंबर तक चार दिवसीय छठ महापर्व, डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य
- 20 नवंबर को देवउठनी एकादशी और 21 नवंबर को तुलसी विवाह
पटना (Threesocieties.com Desk): हिंदू धर्म में विशेष धार्मिक महत्व रखने वाला कार्तिक मास 27 अक्टूबर 2026 से शुरू होकर 24 नवंबर 2026 तक चलेगा। इस दौरान व्रत-त्योहारों की धूम रहेगी। करवा चौथ से शुरू होने वाला त्योहारों का सिलसिला धनतेरस, दीपावली, गोवर्धन पूजा, भाई दूज और लोक आस्था के महापर्व छठ तक पहुंचेगा। इसके बाद देवउठनी एकादशी, तुलसी विवाह और कार्तिक पूर्णिमा जैसे धार्मिक अवसर भी आएंगे।
शरद ऋतु के इस पवित्र महीने में घरों और मंदिरों में पूजा-पाठ, दीपदान, भजन-कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठानों का विशेष माहौल देखने को मिलेगा। बिहार में छठ महापर्व को लेकर खास उत्साह रहेगा। घाटों की साफ-सफाई, पूजा सामग्री की खरीदारी और पारंपरिक तैयारियों के बीच लोक आस्था का यह पर्व सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का संदेश देगा।
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कार्तिक मास में क्यों खास है पूजा-पाठ और दीपदान?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कार्तिक मास भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है। इस महीने में सुबह स्नान, भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की पूजा, तुलसी सेवा, दीपदान, व्रत और धार्मिक कथाओं के श्रवण को पुण्यदायी माना जाता है। मान्यता है कि इस दौरान नियमित पूजा-पाठ, आत्मसंयम, सेवा और दान करने से आध्यात्मिक शांति मिलती है। कई श्रद्धालु पूरे महीने सुबह जल्दी उठकर स्नान करते हैं और मंदिरों में दीप जलाते हैं। घरों में तुलसी के पौधे के पास दीपक जलाने तथा धार्मिक अनुष्ठान करने की भी परंपरा है। कार्तिक मास का महत्व केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। इस महीने में दीपावली की रौनक, भाई-बहन के रिश्तों की आत्मीयता, छठ की लोक परंपराएं और कार्तिक पूर्णिमा के स्नान-दान का विशेष संगम देखने को मिलता है।
कार्तिक मास 2026 के प्रमुख व्रत-त्योहारों की पूरी लिस्ट
29 अक्टूबर: करवा चौथ
कार्तिक मास के प्रमुख व्रतों में करवा चौथ का विशेष स्थान है। इस दिन सुहागिन महिलाएं पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और वैवाहिक जीवन की खुशहाली की कामना से व्रत रखती हैं। परंपरा के अनुसार, महिलाएं दिनभर उपवास करती हैं और शाम को चंद्रमा के दर्शन तथा पूजा के बाद व्रत खोलती हैं। पूजा में भगवान गणेश और शिव-पार्वती की आराधना का विशेष महत्व है।
1 नवंबर: अहोई अष्टमी
अहोई अष्टमी पर माताएं संतान की सुख-समृद्धि और लंबी आयु की कामना से व्रत रखती हैं। इस दिन अहोई माता की पूजा और कथा श्रवण की परंपरा है। संतान के कल्याण के लिए रखा जाने वाला यह व्रत उत्तर भारत के कई हिस्सों में श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।
6 नवंबर: धनतेरस
धनतेरस के साथ दीपावली के प्रमुख उत्सवों की शुरुआत होगी। इस दिन भगवान धन्वंतरि की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, धनतेरस पर खरीदारी करना शुभ माना जाता है। इस अवसर पर लोग बर्तन, सोना-चांदी और घरेलू उपयोग की वस्तुएं खरीदते हैं।
बाजारों में सजावट, रोशनी और खरीदारी की चहल-पहल बढ़ जाती है। कई घरों में धन की देवी मां लक्ष्मी की पूजा की तैयारी भी शुरू हो जाती है।
8 नवंबर: दीपावली
दीपावली कार्तिक मास के सबसे प्रमुख त्योहारों में से एक है। इस दिन घरों, दुकानों और प्रतिष्ठानों में दीपक जलाए जाते हैं। मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा कर सुख, समृद्धि और मंगल की कामना की जाती है। दीपावली के अवसर पर घरों की साफ-सफाई, रंगोली, सजावट और दीप प्रज्ज्वलन की परंपरा है। बाजारों में मिठाइयों, सजावटी सामान, दीपों और पूजा सामग्री की मांग बढ़ जाती है। हालांकि, त्योहार की खुशियों के साथ पर्यावरण और स्वास्थ्य का ध्यान रखते हुए सुरक्षित तरीके से उत्सव मनाना भी जरूरी है।
10 नवंबर: गोवर्धन पूजा
दीपावली के बाद गोवर्धन पूजा मनाई जाएगी। भगवान श्रीकृष्ण और गोवर्धन पर्वत से जुड़ा यह पर्व प्रकृति, पशुधन और कृषि के महत्व को रेखांकित करता है। कई स्थानों पर अन्नकूट तैयार कर भगवान को भोग लगाया जाता है। मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना होती है और श्रद्धालु परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। गोवर्धन पूजा प्रकृति के प्रति सम्मान और सामूहिक सहभागिता का संदेश भी देती है।
11 नवंबर: भाई दूज
भाई दूज भाई-बहन के स्नेह और विश्वास का पर्व है। इस दिन बहनें अपने भाइयों को तिलक लगाकर उनकी लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। भाई भी बहनों की रक्षा और खुशहाली का संकल्प लेते हैं। कई परिवारों में इस दिन बहनें भाइयों को घर बुलाकर भोजन कराती हैं और उपहार देती हैं। दीपावली के उत्सव के बाद आने वाला यह पर्व पारिवारिक रिश्तों को मजबूत करने का अवसर देता है।
13 से 16 नवंबर तक छठ महापर्व की धूम
बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश समेत देश के विभिन्न हिस्सों में मनाया जाने वाला छठ महापर्व कार्तिक मास का सबसे महत्वपूर्ण लोकपर्व है। भगवान सूर्य और छठी मैया की आराधना को समर्पित इस पर्व में व्रती कठिन नियमों का पालन करते हुए परिवार की सुख-समृद्धि और संतान के कल्याण की कामना करते हैं। छठ का अनुष्ठान चार दिनों तक चलता है। इसमें पवित्रता, अनुशासन, सात्विक भोजन और सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा का विशेष महत्व है।
छठ महापर्व का चार दिवसीय कार्यक्रम इस प्रकार है:
13 नवंबर: नहाय-खाय
छठ पर्व की शुरुआत नहाय-खाय से होगी। व्रती स्नान कर घर और रसोई की साफ-सफाई करते हैं। इसके बाद सात्विक भोजन ग्रहण किया जाता है। भोजन में कद्दू-भात और चने की दाल जैसे पारंपरिक पकवानों का प्रचलन है।
14 नवंबर: खरना
दूसरे दिन खरना किया जाएगा। व्रती दिनभर उपवास रखने के बाद शाम को पूजा-अर्चना करते हैं और प्रसाद ग्रहण करते हैं। पारंपरिक रूप से गुड़ की खीर, रोटी और अन्य सात्विक प्रसाद तैयार किए जाते हैं। खरना के बाद व्रतियों का कठिन निर्जला उपवास शुरू होता है।
15 नवंबर: अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य
छठ के तीसरे दिन व्रती नदी, तालाब या अन्य निर्धारित जलाशयों के घाट पर पहुंचकर डूबते सूर्य को अर्घ्य देते हैं। इस दौरान बांस की सूप और टोकरी में फल, ठेकुआ तथा अन्य पारंपरिक प्रसाद सजाए जाते हैं। घाटों पर लोकगीतों, दीपों और श्रद्धालुओं की उपस्थिति से विशेष धार्मिक वातावरण बनता है।
16 नवंबर: उदीयमान सूर्य को अर्घ्य
छठ के अंतिम दिन सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा। इसके साथ चार दिवसीय अनुष्ठान पूरा होगा और व्रती पारण करेंगे। छठ पर्व की विशेषता यह है कि इसमें डूबते और उगते दोनों सूर्य की उपासना की जाती है। बिहार में छठ को लेकर घाटों की सफाई, सुरक्षा, रोशनी, पेयजल और यातायात व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया जाता है। परिवारों में प्रसाद बनाने और पूजा सामग्री जुटाने की तैयारियां भी जोर पकड़ती हैं।
20 नवंबर: देवउठनी एकादशी
देवउठनी एकादशी को प्रबोधिनी एकादशी भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागते हैं। चातुर्मास की समाप्ति और मांगलिक कार्यों की शुरुआत से भी इस तिथि को जोड़ा जाता है। श्रद्धालु इस दिन व्रत रखकर भगवान विष्णु की पूजा करते हैं। मंदिरों में विशेष अनुष्ठान होते हैं और घरों में दीप जलाकर पूजा-अर्चना की जाती है।
21 नवंबर: तुलसी विवाह
तुलसी विवाह में तुलसी माता और भगवान शालिग्राम के विवाह का प्रतीकात्मक आयोजन किया जाता है। कई परिवारों में इस दिन तुलसी के पौधे को सजाकर पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, तुलसी विवाह से सुख-समृद्धि और पारिवारिक मंगल की कामना की जाती है। यह पर्व विशेष रूप से उन परिवारों में महत्वपूर्ण है, जहां तुलसी पूजन और वैष्णव परंपराओं का नियमित पालन किया जाता है।
24 नवंबर: कार्तिक पूर्णिमा
कार्तिक मास का समापन कार्तिक पूर्णिमा के साथ होगा। इस दिन स्नान, दान, दीपदान और पूजा-पाठ का विशेष महत्व माना जाता है। श्रद्धालु पवित्र नदियों और अन्य धार्मिक स्थलों पर स्नान कर दान-पुण्य करते हैं। कार्तिक पूर्णिमा को देव दीपावली के रूप में भी मनाया जाता है, विशेषकर वाराणसी जैसे धार्मिक नगरों में। इस अवसर पर घाटों और मंदिरों में दीप जलाने की परंपरा है। गुरु नानक जयंती भी इसी तिथि पर पड़ रही है।
कार्तिक मास में इन बातों का रखें ध्यान
कार्तिक मास में व्रत और पूजा करने वाले श्रद्धालु अपनी परंपरा और स्थानीय पंचांग के अनुसार अनुष्ठान करें। त्योहारों की तिथियों और पूजा के शुभ मुहूर्त में क्षेत्रीय अंतर संभव है। इसलिए विशेष पूजा या व्रत से पहले स्थानीय पंचांग से पुष्टि करना उचित रहेगा।इस पवित्र महीने का संदेश भक्ति, सेवा, संयम, प्रकृति के प्रति सम्मान और परिवार के साथ मिलकर त्योहार मनाने से जुड़ा है। दीपावली की रोशनी से लेकर छठ के घाटों तक और कार्तिक पूर्णिमा के दीपदान तक, पूरा महीना धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक परंपराओं की जीवंत तस्वीर प्रस्तुत करेगा।