Highlights:
- BCCL सेंट्रल अस्पताल, धनबाद की करीब 14 करोड़ रुपये का टेंडर निविदा प्रक्रिया विवादों में,CBI जांच की मांग
- झारखंड कॉन्ट्रैक्टर्स एसोसिएशन का दावा है कि 341 निविदादाताओं में से 339 को अयोग्य घोषित किया गया
- स्थानीय कार्यालय की अनिवार्यता सहित टेंडर की कुछ शर्तों को लेकर संगठन ने आपत्ति जताई
- एसोसिएशन ने हाईकोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर करने की बात कही है
धनबाद (Threesocieties.com Desk): भारत कोकिंग कोल लिमिटेड (BCCL) के सेंट्रल अस्पताल, धनबाद की करीब 14 करोड़ रुपये की निविदा प्रक्रिया को लेकर विवाद गहरा गया है। झारखंड कॉन्ट्रैक्टर्स एसोसिएशन ने टेंडर प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए अस्पताल प्रबंधन और संबंधित अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। एसोसिएशन का दावा है कि इस निविदा प्रक्रिया में शामिल कुल 341 निविदादाताओं में से 339 को अयोग्य घोषित कर दिया गया, जबकि केवल दो निविदादाता ही आगे की प्रक्रिया में रह गए।
संगठन ने आरोप लगाया है कि निविदा की शर्तों और तकनीकी मूल्यांकन की प्रक्रिया से प्रतिस्पर्धा तथा समान अवसर के सिद्धांत प्रभावित होने की आशंका है। एसोसिएशन ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने, जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की पड़ताल करने और जरूरत पड़ने पर निविदा प्रक्रिया रद्द कर नए सिरे से टेंडर जारी करने की मांग की है।मामले को लेकर संगठन ने झारखंड हाईकोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर करने की बात कही है। इसके साथ ही धनबाद स्थित केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) अथवा किसी अन्य स्वतंत्र जांच एजेंसी से जांच कराने की मांग भी उठाई गई है। हालांकि, फिलहाल ये आरोप एसोसिएशन की ओर से लगाए गए हैं और इनकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
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पहली निविदा रद्द, फिर दोबारा जारी करने का आरोप
झारखंड कॉन्ट्रैक्टर्स एसोसिएशन के अनुसार, BCCL सेंट्रल अस्पताल की इस निविदा को पहली बार 7 अप्रैल 2026 को जारी किया गया था। बाद में पहली निविदा रद्द कर 21 अप्रैल 2026 को दोबारा टेंडर निकाला गया। संगठन ने दूसरी निविदा में शामिल शर्तों पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि इनके कारण निविदा प्रक्रिया में प्रतिस्पर्धा सीमित होने और कुछ एजेंसियों को लाभ मिलने की आशंका पैदा हुई। एसोसिएशन के मुताबिक, धनबाद में स्थानीय कार्यालय होना अनिवार्य करने जैसी शर्त भी विवाद का विषय है। संगठन का कहना है कि सरकारी उपक्रमों की निविदा प्रक्रिया में ऐसी शर्तें होनी चाहिए, जो पारदर्शिता, निष्पक्षता और अधिक से अधिक योग्य निविदादाताओं की भागीदारी सुनिश्चित करें। हालांकि, संबंधित निविदा दस्तावेजों और शर्तों की स्वतंत्र समीक्षा के बिना यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि किसी विशेष एजेंसी को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से नियम बनाए गए थे।
341 निविदादाताओं में से 339 को अयोग्य घोषित करने का दावा
इस पूरे विवाद का सबसे अहम पहलू तकनीकी मूल्यांकन को लेकर उठे सवाल हैं। एसोसिएशन का दावा है कि कुल 341 निविदादाताओं में से 339 को अयोग्य घोषित कर दिया गया और केवल दो निविदादाता ही आगे की प्रक्रिया में रह गए। संगठन ने इस अनुपात को लेकर सवाल उठाते हुए कहा है कि इतने बड़े पैमाने पर निविदादाताओं को अयोग्य घोषित किए जाने के कारणों की निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए। एसोसिएशन की मांग है कि अयोग्यता के आधार, संबंधित दस्तावेजों, तकनीकी मूल्यांकन के मानकों और निर्णय लेने की प्रक्रिया की जांच की जाए। हालांकि, केवल बड़ी संख्या में निविदादाताओं के अयोग्य घोषित होने से अपने आप अनियमितता साबित नहीं होती। इसकी वास्तविक स्थिति जानने के लिए यह देखना जरूरी होगा कि प्रत्येक निविदादाता को किन निर्धारित शर्तों के आधार पर अयोग्य घोषित किया गया और क्या सभी मामलों में नियमों का समान रूप से पालन किया गया।
स्थानीय कार्यालय की शर्त पर उठाए सवाल
एसोसिएशन ने दूसरी निविदा में धनबाद में स्थानीय कार्यालय होने की अनिवार्यता जैसी शर्त पर भी आपत्ति जताई है। संगठन का आरोप है कि इस तरह की शर्तें अन्य क्षेत्रों में काम करने वाली योग्य एजेंसियों की भागीदारी को प्रभावित कर सकती हैं। एसोसिएशन के अनुसार, निविदा की शर्तें ऐसी होनी चाहिए, जिनका उद्देश्य कार्य की गुणवत्ता, समयबद्ध निष्पादन और सेवा की विश्वसनीयता सुनिश्चित करना हो। संगठन ने सवाल उठाया है कि यदि स्थानीय कार्यालय की शर्त रखी गई थी, तो उसके पीछे का औचित्य क्या था और क्या यह शर्त संबंधित कार्य की वास्तविक जरूरतों के अनुरूप थी। इस मामले में निविदा की मूल शर्तों, तकनीकी पात्रता मानकों और स्थानीय कार्यालय की अनिवार्यता के औचित्य की समीक्षा महत्वपूर्ण होगी। इससे स्पष्ट हो सकेगा कि शर्तें कार्य की आवश्यकताओं के अनुरूप थीं या उनके कारण प्रतिस्पर्धा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका थी।
संविधान के अनुच्छेद 14 और CVC दिशा-निर्देशों का हवाला
झारखंड कॉन्ट्रैक्टर्स एसोसिएशन ने अपनी आपत्तियों में संविधान के अनुच्छेद 14 तथा केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) के दिशा-निर्देशों का हवाला दिया है। अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता और कानूनों के समान संरक्षण के सिद्धांत से संबंधित है। वहीं, सार्वजनिक खरीद और निविदा प्रक्रियाओं में पारदर्शिता, निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा तथा जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए संबंधित नियमों और दिशा-निर्देशों का पालन महत्वपूर्ण होता है।
एसोसिएशन का आरोप है कि विवादित निविदा की शर्तें और मूल्यांकन प्रक्रिया समान अवसर तथा निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं थीं। संगठन ने मांग की है कि संबंधित अधिकारियों के निर्णयों की जांच कर यह पता लगाया जाए कि निविदा प्रक्रिया में लागू नियमों का पालन किया गया या नहीं। हालांकि, किसी निविदा में संवैधानिक प्रावधानों या CVC दिशा-निर्देशों का उल्लंघन हुआ है या नहीं, इसका निर्धारण संबंधित दस्तावेजों, लागू नियमों और सक्षम प्राधिकारी अथवा न्यायालय की समीक्षा के आधार पर ही किया जा सकता है।
तकनीकी मूल्यांकन और स्पष्टीकरण का अवसर नहीं देने का आरोप
एसोसिएशन ने तकनीकी मूल्यांकन की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए हैं। संगठन का आरोप है कि जिन निविदादाताओं को अयोग्य घोषित किया गया, उन्हें अपनी आपत्तियां रखने और स्पष्टीकरण देने के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया गया। संगठन के मुताबिक, यदि किसी निविदादाता के दस्तावेजों में कमी पाई गई थी, तो लागू निविदा शर्तों और नियमों के अनुरूप मूल्यांकन किया जाना चाहिए था। एसोसिएशन का कहना है कि अयोग्यता के कारण स्पष्ट होने चाहिए और निर्धारित प्रक्रिया के तहत उपलब्ध स्पष्टीकरण या शिकायत के विकल्पों पर विचार किया जाना चाहिए।
इस संबंध में यह देखना आवश्यक होगा कि निविदा दस्तावेजों में स्पष्टीकरण देने का कोई प्रावधान था या नहीं, संबंधित निविदादाताओं को क्या सूचनाएं दी गईं और तकनीकी मूल्यांकन समिति ने अयोग्यता के क्या कारण दर्ज किए। इन रिकॉर्ड के सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि प्रक्रिया में किसी तरह की प्रक्रियागत कमी रही या नहीं।
MSME छूट के प्रावधानों पर भी सवाल
झारखंड कॉन्ट्रैक्टर्स एसोसिएशन ने सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME) से जुड़े छूट के प्रावधानों को लागू करने के तरीके पर भी सवाल उठाए हैं। संगठन का आरोप है कि संबंधित निविदा में MSME से जुड़े प्रावधानों पर उचित तरीके से विचार नहीं किया गया। एसोसिएशन ने मांग की है कि पात्रता, छूट और दस्तावेजों के मूल्यांकन से जुड़े नियमों की समीक्षा की जाए। हालांकि, MSME से संबंधित प्रत्येक छूट हर प्रकार की निविदा में स्वतः लागू नहीं होती। इसका निर्धारण लागू सरकारी नीति, निविदा की प्रकृति, खरीद की शर्तों और संबंधित प्रावधानों पर निर्भर करता है। इसलिए इस मामले में यह जांचना महत्वपूर्ण होगा कि कौन-से नियम लागू थे और पात्र निविदादाताओं के मामलों में उनका किस तरह पालन किया गया।
शिकायत के बाद कानूनी रास्ता अपनाने की तैयारी
एसोसिएशन के मुताबिक, मामले को लेकर अस्पताल प्रबंधन और संबंधित अधिकारियों के समक्ष शिकायत की गई थी। संगठन का दावा है कि शिकायत पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं होने के बाद कानूनी रास्ता अपनाने का निर्णय लिया गया। संगठन ने कहा है कि निविदा प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं की जांच कराई जानी चाहिए, ताकि पूरी प्रक्रिया की वास्तविक स्थिति सामने आ सके। एसोसिएशन का मानना है कि सार्वजनिक धन से जुड़े कार्यों में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना जरूरी है। संगठन ने झारखंड हाईकोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर करने की बात कही है। हालांकि, याचिका की वास्तविक स्थिति, उसके दायर होने की तारीख और उसमें मांगी गई राहत की पुष्टि संबंधित न्यायालयी रिकॉर्ड से की जानी चाहिए।
CBI जांच और नए सिरे से टेंडर जारी करने की मांग
झारखंड कॉन्ट्रैक्टर्स एसोसिएशन ने पूरे मामले की जांच धनबाद स्थित CBI अथवा किसी अन्य निष्पक्ष जांच एजेंसी से कराने की मांग की है। संगठन का कहना है कि जांच के माध्यम से निविदा की शर्तों, तकनीकी मूल्यांकन और अयोग्यता के निर्णयों की निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए। एसोसिएशन ने यह भी मांग की है कि यदि जांच में अनियमितताएं सामने आती हैं, तो संबंधित अधिकारियों और अन्य जिम्मेदार लोगों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाए। इसके अलावा, संगठन ने आवश्यकता पड़ने पर मौजूदा निविदा प्रक्रिया रद्द कर पारदर्शी तरीके से नए सिरे से टेंडर जारी करने की मांग उठाई है। एसोसिएशन का कहना है कि नई प्रक्रिया में पात्रता की शर्तें स्पष्ट हों और सभी योग्य एजेंसियों को निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा का अवसर मिले। फिलहाल, CBI जांच की मांग को संगठन की मांग के रूप में ही देखा जाना चाहिए। जांच शुरू होने, किसी एजेंसी को मामला सौंपे जाने या किसी अधिकारी के दोषी पाए जाने की पुष्टि उपलब्ध जानकारी से नहीं होती।
अब BCCL प्रबंधन के आधिकारिक जवाब पर नजर
करीब 14 करोड़ रुपये की निविदा को लेकर उठे सवालों के बीच अब BCCL सेंट्रल अस्पताल प्रबंधन और संबंधित अधिकारियों का पक्ष महत्वपूर्ण होगा। निविदा जारी करने, पहली निविदा रद्द करने, दूसरी निविदा की शर्तें तय करने और तकनीकी मूल्यांकन के आधार को लेकर प्रबंधन की प्रतिक्रिया से विवाद के कई पहलू स्पष्ट हो सकते हैं। फिलहाल, झारखंड कॉन्ट्रैक्टर्स एसोसिएशन की ओर से लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। अस्पताल प्रबंधन का आधिकारिक पक्ष भी उपलब्ध जानकारी में सामने नहीं आया है। ऐसे में किसी अधिकारी या एजेंसी को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा।
मामले की वास्तविक स्थिति जानने के लिए निविदा के मूल दस्तावेज, तकनीकी मूल्यांकन रिपोर्ट, अयोग्य घोषित किए गए निविदादाताओं के कारण, शिकायतों पर हुई कार्रवाई और संबंधित प्रबंधन का जवाब महत्वपूर्ण होगा। यदि दस्तावेजों की जांच में नियमों के उल्लंघन के प्रमाण मिलते हैं, तो सक्षम प्राधिकारी नियमानुसार आगे की कार्रवाई कर सकते हैं। वहीं, यदि निविदा प्रक्रिया लागू नियमों के अनुसार हुई है, तो रिकॉर्ड के आधार पर स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।