हत्या के आरोपी नाबालिग भी नहीं बचेंगे! सुप्रीम कोर्ट बोला- शर्तें पूरी हों तो बालिगों की तरह चलेगा मुकदमा
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि हत्या जैसे जघन्य अपराध के आरोपी नाबालिगों पर कानूनी शर्तें पूरी होने पर बालिगों की तरह मुकदमा चलाया जा सकता है। जानिए कोर्ट का पूरा फैसला, किशोर न्याय अधिनियम के प्रावधान और इस फैसले का क्या होगा असर।
HighLights:
- कानूनी शर्तें पूरी होने पर नाबालिग पर बालिग की तरह मुकदमा चलाया जा सकता है
- किशोर न्याय अधिनियम, 2015 के तहत हत्या को जघन्य अपराध माना गया
- पटना हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर अपील सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की
- कोर्ट ने कहा- जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड पहले प्रारंभिक मूल्यांकन करेगा
नई दिल्ली (Threesocieties.com Desk): हत्या जैसे जघन्य अपराधों में शामिल नाबालिगों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि यदि कानून में निर्धारित सभी आवश्यक शर्तें पूरी होती हैं, तो हत्या के आरोपी नाबालिग पर भी बालिग की तरह मुकदमा चलाया जा सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल एवं संरक्षण) अधिनियम, 2015 के तहत हत्या (आईपीसी की धारा 302) जघन्य अपराध की श्रेणी में आती है।
यह फैसला जस्टिस जेबी पार्डीवाला और उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने सुनाया। कोर्ट ने बिहार के एक 16 वर्षीय किशोर की अपील खारिज कर दी, जिसने पटना हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे हत्या के मामले में बालिग की तरह मुकदमे का सामना करने की अनुमति दी गई थी।
क्या था मामला?
मामला बिहार का है, जहां 16 वर्षीय किशोर पर एक लड़के की कथित रूप से गर्दन काटकर हत्या करने का आरोप है। इस गंभीर अपराध को देखते हुए जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने प्रारंभिक मूल्यांकन किया था। बाद में पटना हाई कोर्ट ने माना कि आरोपी की मानसिक और शारीरिक क्षमता, अपराध की प्रकृति और परिस्थितियों को देखते हुए उस पर वयस्क की तरह मुकदमा चलाया जाना चाहिए। इसके बाद मामला नियमित अदालत में भेजने का निर्देश दिया गया। इस आदेश के खिलाफ आरोपी किशोर ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए अपील खारिज कर दी।
क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हर नाबालिग आरोपी पर स्वतः वयस्क की तरह मुकदमा नहीं चलाया जाएगा। इसके लिए जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड को पहले प्रारंभिक मूल्यांकन (Preliminary Assessment) करना होगा। बोर्ड यह जांच करेगा कि—
आरोपी की उम्र 16 से 18 वर्ष के बीच है या नहीं।
वह अपराध की प्रकृति और उसके परिणाम को समझने की मानसिक क्षमता रखता था या नहीं।
अपराध करने की परिस्थितियां क्या थीं।
आरोपी की शारीरिक एवं मानसिक परिपक्वता कैसी थी।
यदि इन सभी पहलुओं के आधार पर बोर्ड संतुष्ट होता है, तभी मामला नियमित सत्र अदालत में भेजा जा सकता है।
क्यों अहम है यह फैसला?
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भविष्य में हत्या जैसे जघन्य अपराधों से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण मिसाल माना जाएगा। इससे यह स्पष्ट हो गया है कि गंभीर अपराधों में केवल आरोपी के नाबालिग होने के आधार पर उसे विशेष राहत नहीं मिलेगी। हालांकि अदालत ने यह भी दोहराया कि प्रत्येक मामले में अलग-अलग तथ्यों और कानूनी प्रक्रिया का पालन अनिवार्य होगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय एक ओर गंभीर अपराधों पर सख्त संदेश देता है, वहीं दूसरी ओर किशोर न्याय कानून के तहत निर्धारित सुरक्षा और निष्पक्ष प्रक्रिया को भी बरकरार रखता है।
किन मामलों में संभव होगा बालिगों जैसा ट्रायल?
आरोपी की आयु 16 से 18 वर्ष के बीच हो।
अपराध जघन्य (Heinous Offence) की श्रेणी में आता हो।
जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड प्रारंभिक मूल्यांकन में आरोपी को पर्याप्त मानसिक और शारीरिक रूप से सक्षम पाए।
बोर्ड यह माने कि मामला नियमित अदालत में भेजा जाना उचित है।




