जहानाबाद नरसंहार: पटना हाई कोर्ट ने 13 दोषियों को किया बरी, उम्रकैद रद्द
1996 जहानाबाद नरसंहार मामले में पटना हाई कोर्ट ने 13 अभियुक्तों की उम्रकैद की सजा रद्द कर उन्हें बरी किया। पुलिस जांच में गंभीर खामियों पर DGP को तीन महीने में कार्रवाई के निर्देश।
HighLights:
- पटना हाई कोर्ट ने 1996 के नरसंहार मामले में सभी 13 अपीलकर्ताओं को संदेह का लाभ दिया
- उम्रकैद की सजा रद्द, ट्रायल कोर्ट के 3 अप्रैल 2023 के फैसले को पलट दिया गया
- पोस्टमार्टम रिपोर्ट, पहचान परेड और भौतिक साक्ष्यों के संग्रह में कमियां सामने आईं
- लापरवाह जांच अधिकारियों की भूमिका की समीक्षा के लिए तीन वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की समिति बनाने को कहा गया
पटना (Threesocieties.com Desk): बिहार के चर्चित 1996 जहानाबाद नरसंहार मामले में पटना हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए 13 अभियुक्तों की उम्रकैद की सजा रद्द कर दी है। हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलटते हुए सभी 13 अपीलकर्ताओं को संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया। अदालत ने मामले की जांच और अभियोजन के दौरान कई गंभीर खामियां पाईं। साथ ही, बिहार के पुलिस महानिदेशक (DGP) को लापरवाह जांच अधिकारियों की भूमिका की समीक्षा के लिए तीन वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की समिति गठित करने और तीन महीने के भीतर उचित प्रशासनिक कार्रवाई करने का निर्देश दिया है।
यह फैसला न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद और न्यायमूर्ति कुमार मनीष की खंडपीठ ने सुनाया। ट्रायल कोर्ट ने 3 अप्रैल 2023 को इस मामले में 13 अभियुक्तों को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। हाई कोर्ट ने अपीलों पर सुनवाई के बाद साक्ष्यों और जांच प्रक्रिया में गंभीर कमियां पाते हुए दोषसिद्धि और सजा को बरकरार नहीं रखा।
क्या है 1996 का जहानाबाद नरसंहार मामला?
यह घटना 8 अगस्त 1996 की रात की बताई जाती है। उस समय करपी थाना क्षेत्र के केयार आहर के पास सिंचाई के लिए पानी को लेकर विवाद हुआ था। आरोप के अनुसार, 30 से 40 अज्ञात उग्रवादियों ने एक झोपड़ी पर हमला कर दिया था। इस हमले में चार लोगों की गोली लगने से मौत हो गई थी। मृतकों की पहचान भरत सिंह, मंगेतर सिंह, राम निवास सिंह और नवलेश सिंह के रूप में की गई थी। घटना में प्रमोद कुमार समेत अन्य लोग भी घायल हुए थे।
मामले की जांच के बाद पुलिस ने अभियुक्तों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया। लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद ट्रायल कोर्ट ने 3 अप्रैल 2023 को 13 अभियुक्तों को दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इस फैसले को चुनौती देते हुए अभियुक्तों ने पटना हाई कोर्ट में अपील दायर की थी।
हाई कोर्ट ने क्यों रद्द की उम्रकैद की सजा?
अपीलों पर सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों और पुलिस जांच की प्रक्रिया की पड़ताल की। अदालत के सामने ऐसी कई कमियां आईं, जिनसे अभियोजन के मामले की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हुए।
1. मृतकों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर गंभीर सवाल
अदालत ने पाया कि चारों मृतकों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट को मुकदमे के दौरान प्रदर्शित साक्ष्य के रूप में पेश नहीं किया गया था। पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टरों से भी पूछताछ नहीं की गई थी। ऐसी स्थिति में मौत से जुड़े चिकित्सकीय साक्ष्यों को अदालत के समक्ष विधिवत स्थापित करने में कमी रह गई। आपराधिक मुकदमों में चिकित्सकीय साक्ष्य घटनाक्रम और मौत के कारणों की पुष्टि करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
2. अभियुक्तों की पहचान के लिए टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड नहीं
हाई कोर्ट ने जांच के दौरान पहचान की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। पुलिस ने अभियुक्तों की पहचान के लिए टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (TIP) नहीं कराई थी। मामले में गवाहों ने घटना के करीब आठ साल बाद अदालत में पहली बार अभियुक्तों की पहचान की थी। अदालत ने पहचान से संबंधित परिस्थितियों और प्रक्रिया की कमियों को महत्वपूर्ण माना। इतने लंबे अंतराल के बाद की गई पहचान को अन्य पुष्टिकारक साक्ष्यों के संदर्भ में परखना जरूरी था।
3. घटनास्थल से भौतिक साक्ष्य जुटाने में लापरवाही
अदालत ने पुलिस की ओर से घटनास्थल से भौतिक साक्ष्य एकत्र करने की प्रक्रिया में भी कमियां पाईं। खून से सनी मिट्टी, खाली कारतूस यानी खोखा, लाठी और अन्य संभावित साक्ष्यों को जब्त करने के लिए आवश्यक जब्ती सूची तैयार नहीं की गई थी। इन साक्ष्यों को फॉरेंसिक जांच के लिए प्रयोगशाला भी नहीं भेजा गया था। इससे घटनास्थल से मिले संभावित साक्ष्यों की वैज्ञानिक जांच और अभियोजन के दावों की पुष्टि प्रभावित हुई। अदालत ने जांच में ऐसी कमियों को गंभीरता से लेते हुए कहा कि पुलिस की लापरवाही का असर न्यायिक प्रक्रिया पर पड़ सकता है।
DGP को तीन वरिष्ठ अधिकारियों की समिति बनाने का निर्देश
मामले में जांच अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठने के बाद पटना हाई कोर्ट ने बिहार के पुलिस महानिदेशक को विशेष निर्देश दिए हैं। अदालत ने डीजीपी से तीन वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की समिति गठित करने को कहा है। यह समिति मामले की जांच में सामने आई लापरवाही और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की समीक्षा करेगी। निर्देश के अनुसार, तीन महीने के भीतर उचित प्रशासनिक कार्रवाई की जानी है।
इस निर्देश का उद्देश्य केवल इस मामले की जांच में हुई कमियों की समीक्षा करना ही नहीं, बल्कि पुलिस जांच की जवाबदेही सुनिश्चित करना भी है। आपराधिक मामलों में साक्ष्य जुटाने, उन्हें सुरक्षित रखने और कानूनी प्रक्रिया के अनुसार अदालत में प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी जांच एजेंसियों की होती है।
अन्य मामलों में वांछित नहीं होने पर रिहाई का आदेश
पटना हाई कोर्ट ने सभी 13 अपीलकर्ताओं को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि यदि वे किसी अन्य मामले में वांछित नहीं हैं, तो उन्हें तुरंत रिहा किया जाए। इस फैसले के साथ ही 1996 के जहानाबाद नरसंहार मामले में ट्रायल कोर्ट की ओर से सुनाई गई उम्रकैद की सजा समाप्त हो गई है। यह फैसला आपराधिक मुकदमों में ठोस साक्ष्य, विश्वसनीय पहचान और निष्पक्ष जांच के महत्व को रेखांकित करता है।
न्यायिक प्रक्रिया में जांच की गुणवत्ता अहम
जहानाबाद नरसंहार मामले में पटना हाई कोर्ट का फैसला इस बात को सामने लाता है कि गंभीर आपराधिक मामलों में भी दोषसिद्धि के लिए अभियोजन को विश्वसनीय और कानूनी रूप से स्वीकार्य साक्ष्य प्रस्तुत करने होते हैं। जांच में हुई कमियां यदि अभियोजन के मामले को कमजोर करती हैं, तो अदालत को उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निर्णय लेना होता है। इस मामले में 13 अभियुक्तों को बरी करने के साथ हाई कोर्ट ने जांच अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की दिशा में भी कदम उठाया है। अब डीजीपी द्वारा गठित की जाने वाली समिति की समीक्षा और उसके बाद की प्रशासनिक कार्रवाई पर नजर रहेगी।
Threesocieties News Desk 



