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Highlights:

  • सोनिया गांधी ने कहा- इमरजेंसी के लिए सिर्फ संजय गांधी जिम्मेदार नहीं थे
  • इंदिरा गांधी के कुछ वरिष्ठ सहयोगियों का भी उन पर दबाव था
  •  राजीव गांधी का दृष्टिकोण उस समय दूसरों से अलग था
  •  सोनिया के मुताबिक, इंदिरा गांधी को बाद में आपातकाल की ज्यादतियों पर खेद हुआ

नई दिल्ली (Threesocieties.com Desk): देश में 25 जून 1975 को लगाए गए आपातकाल (इमरजेंसी) को लेकर कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी ने एक बार फिर उस दौर की राजनीति और घटनाओं पर अपनी बात रखी है। उन्होंने आपातकाल के दौरान हुई ज्यादतियों के लिए संजय गांधी को अकेले जिम्मेदार मानने से इनकार किया है। सोनिया गांधी के मुताबिक, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर उनके कुछ वरिष्ठ सहयोगियों का भी काफी दबाव था।

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सोनिया गांधी की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है, जब उनकी संस्मरण पुस्तक Belonging: A Journey of Love 10 नवंबर को दुनिया भर में रिलीज होने वाली है। इस पुस्तक में उन्होंने अपनी जिंदगी के कई महत्वपूर्ण अनुभवों, यादों और राजीव गांधी के साथ अपने रिश्ते से जुड़े प्रसंगों को साझा किया है।

'द हिंदू' को दिए एक इंटरव्यू में सोनिया गांधी ने आपातकाल, इंदिरा गांधी और संजय गांधी की भूमिका पर विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि आमतौर पर लोगों की नजर में संजय गांधी को आपातकाल का पर्याय माना जाता है, लेकिन उस दौर की पूरी जिम्मेदारी केवल उनके ऊपर डालना सही नहीं होगा।

इंदिरा गांधी पर था वरिष्ठ सहयोगियों का दबाव

सोनिया गांधी ने कहा कि आपातकाल के दौरान केवल संजय गांधी ही जिम्मेदार नहीं थे। इंदिरा गांधी के कुछ वरिष्ठ सहयोगियों की तरफ से भी उन पर काफी दबाव था। उन्होंने कहा, "ऐसा नहीं था कि सिर्फ संजय ही जिम्मेदार थे, हालांकि आम लोगों की नजर में उन्हें अक्सर आपातकाल का पर्याय माना जाता है। उस समय उनके कुछ वरिष्ठ सहयोगियों का काफी दबाव था और मुझे लगता है कि उनके आसपास राजीव जैसे बहुत कम लोग थे, जिनकी सोच अलग थी।" सोनिया गांधी के इस बयान को 1975 से 1977 के बीच देश में लागू आपातकाल के दौरान सत्ता के भीतर चल रही राजनीतिक परिस्थितियों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

इंदिरा गांधी को बाद में हुआ था अपनी गलतियों का एहसास

इंटरव्यू में सोनिया गांधी ने यह भी कहा कि इंदिरा गांधी ने बाद में आपातकाल के दौरान लिए गए कुछ फैसलों और हुई ज्यादतियों पर खेद जताया था। उन्होंने कहा कि किसी घटना को पीछे मुड़कर देखने पर उसकी परिस्थितियों और परिणामों को बेहतर तरीके से समझा जा सकता है। सोनिया के मुताबिक, इंदिरा गांधी ने खुद स्थिति को समझा और मार्च 1977 में लोकसभा चुनाव कराने का फैसला लिया। सोनिया गांधी ने कहा कि इंदिरा गांधी ने बाद में सार्वजनिक रूप से आपातकाल के दौरान लिए गए सख्त फैसलों और ज्यादतियों पर अफसोस जताया था। उनकी इस टिप्पणी से यह संकेत मिलता है कि सोनिया गांधी आपातकाल के फैसले और उसके बाद की राजनीतिक घटनाओं को एक व्यापक ऐतिहासिक संदर्भ में देखती हैं।

आपातकाल को लोकतंत्र विरोधी मानने पर क्या बोलीं सोनिया?

जब सोनिया गांधी से पूछा गया कि क्या आपातकाल को लोकतंत्र विरोधी और तानाशाहीपूर्ण दौर के रूप में देखना सही होगा, तो उन्होंने माना कि उस दौरान लोकतांत्रिक अधिकारों को सीमित किया गया था। उन्होंने कहा कि आपातकाल समाप्त होने के बाद ही उन्हें इसकी वास्तविक गंभीरता का पता चला। सोनिया गांधी के मुताबिक, उस दौरान लोकतांत्रिक अधिकारों में कटौती की गई थी और बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) के अधिकार को निलंबित कर दिया गया था। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि आपातकाल लागू करने की प्रक्रिया संवैधानिक प्रावधानों के तहत पूरी की गई थी। यहां गौरतलब है कि किसी फैसले का संवैधानिक प्रक्रिया के तहत लिया जाना और उसके लोकतांत्रिक प्रभावों का मूल्यांकन दो अलग-अलग विषय हैं। आपातकाल के दौरान नागरिक स्वतंत्रता, प्रेस की आजादी और राजनीतिक विरोध की स्थिति को लेकर देश में लंबे समय तक बहस होती रही है।

इंदिरा गांधी ने अपनी समझदारी से स्थिति सुधारने की कोशिश की

सोनिया गांधी ने इंटरव्यू में अपनी सास और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के फैसलों का जिक्र करते हुए कहा कि आखिरकार उन्होंने अपनी समझदारी से परिस्थितियों को समझना शुरू किया और स्थिति को सुधारने के लिए कदम उठाए। उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि आखिरकार मेरी सास ने अपनी समझदारी से स्थिति को समझना शुरू कर दिया था और उसे सुधारने के लिए कदम उठाए।" सोनिया गांधी के मुताबिक, उनके पति राजीव गांधी लोगों की शिकायतें और प्रतिक्रियाएं सुनते थे और उन्हें अपनी मां तक पहुंचाते थे। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि राजीव गांधी का दृष्टिकोण उस समय के कुछ अन्य लोगों से अलग था।

इंदिरा गांधी ने मार्च 1977 में कराया था चुनाव

भारत में 25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने देश में आपातकाल लागू किया था। यह दौर 21 मार्च 1977 तक चला। आपातकाल के दौरान नागरिकों के कई मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगाए गए। विपक्षी नेताओं और राजनीतिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियां हुईं। प्रेस पर सेंसरशिप लागू की गई और सरकार के खिलाफ आवाज उठाने की स्वतंत्रता सीमित हो गई। इस दौर में संजय गांधी की भूमिका भी काफी विवादों में रही। खासकर जबरन नसबंदी अभियान और दिल्ली में झुग्गी बस्तियों को हटाने जैसी कार्रवाइयों को लेकर उनकी आलोचना होती रही है। हालांकि, आपातकाल की घोषणा के बाद मार्च 1977 में इंदिरा गांधी ने लोकसभा चुनाव कराने का फैसला किया। चुनाव में कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा और जनता पार्टी सत्ता में आई। मोरारजी देसाई देश के प्रधानमंत्री बने। इस चुनाव को भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना माना जाता है।

10 नवंबर को रिलीज होगी सोनिया गांधी की किताब

सोनिया गांधी की संस्मरण पुस्तक Belonging: A Journey of Love 10 नवंबर को रिलीज होने वाली है। इस पुस्तक में उन्होंने अपनी व्यक्तिगत जिंदगी, परिवार, राजीव गांधी के साथ रिश्ते और जीवन के महत्वपूर्ण अनुभवों को साझा किया है। पुस्तक के रिलीज होने से पहले दिए गए इंटरव्यू में इमरजेंसी पर उनकी टिप्पणी ने एक बार फिर 1975-77 के राजनीतिक दौर को चर्चा में ला दिया है। सोनिया गांधी का कहना है कि आपातकाल के लिए केवल संजय गांधी को जिम्मेदार ठहराना उस दौर की पूरी तस्वीर नहीं बताता। उनके अनुसार, इंदिरा गांधी के आसपास के वरिष्ठ सहयोगियों की भूमिका और तत्कालीन परिस्थितियों को भी समझना जरूरी है। आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का ऐसा अध्याय है, जिस पर आज भी राजनीतिक और ऐतिहासिक बहस जारी है।