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Highlights: 

  • निर्दलीय MLC वंशीधर ब्रजवासी और राहुल राज के भाजपा से जुड़ने पर विवाद
  • राजद और जनसुराज ने दल-बदल कानून के उल्लंघन का लगाया आरोप
  • राजद नेता मनोज कुमार झा ने विधान परिषद सभापति से की सदस्यता रद्द करने की मांग
  • जदयू नेताओं ने भी दोनों की भाजपा में एंट्री पर जताई नाराजगी

पटना (Threesocieties.com Desk): बिहार की राजनीति में दो निर्दलीय विधान पार्षदों (MLC) के भाजपा के साथ जुड़ने को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से निर्वाचित वंशीधर ब्रजवासी और सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से जीते राहुल राज की सदस्यता पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। भाजपा में शामिल होने के बाद विपक्ष ने दल-बदल कानून के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए उनकी सदस्यता रद्द करने की मांग कर दी है।

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मामला इतना बढ़ गया कि भाजपा को भी अपने कदम पीछे खींचने पड़े। विपक्ष के हमले और जदयू नेताओं की नाराजगी के बीच भाजपा ने यू-टर्न लेते हुए दावा किया है कि दोनों निर्दलीय एमएलसी पार्टी में शामिल नहीं हुए हैं, बल्कि उन्होंने भाजपा को अपना समर्थन दिया है। पार्टी ने दोनों नेताओं के भाजपा में शामिल होने से संबंधित सोशल मीडिया पोस्ट भी हटा ली है।

हालांकि, भाजपा के इस स्पष्टीकरण के बावजूद विवाद थमता नजर नहीं आ रहा है। विपक्ष का कहना है कि यदि दोनों नेताओं ने भाजपा की सदस्यता ग्रहण की है तो यह दल-बदल कानून के दायरे में आ सकता है। सोशल मीडिया पर सामने आई तस्वीरों में दोनों नेताओं को भाजपा की सदस्यता पर्ची दिखाते हुए देखा गया है। ऐसे में अब सबकी निगाहें विधान परिषद के सभापति के फैसले पर टिकी हैं।

निर्दलीय MLC की सदस्यता पर क्यों उठे सवाल?

बिहार विधान परिषद चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीत दर्ज करने वाले वंशीधर ब्रजवासी और राहुल राज का भाजपा से जुड़ना अब राजनीतिक और कानूनी विवाद का विषय बन गया है। दरअसल, दोनों नेताओं ने हाल ही में भाजपा का दामन थामने का ऐलान किया था। इसके बाद भाजपा की ओर से भी सोशल मीडिया पर दोनों नेताओं के पार्टी में शामिल होने की जानकारी साझा की गई थी। तस्वीरों में दोनों नेताओं को पार्टी की सदस्यता पर्ची के साथ दिखाया गया।

इसके बाद राजद और जनसुराज ने भाजपा पर संविधान और दल-बदल कानून की अनदेखी करने का आरोप लगाया। विपक्ष का तर्क है कि निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में सदन के लिए निर्वाचित होने के बाद किसी राजनीतिक दल की सदस्यता ग्रहण करने का मामला दल-बदल कानून के तहत अयोग्यता का आधार बन सकता है। विपक्ष ने सवाल उठाया है कि यदि कोई नेता निर्दलीय चुनाव जीतकर सदन में पहुंचता है और बाद में किसी राजनीतिक दल की सदस्यता लेता है, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं होनी चाहिए?

मनोज कुमार झा ने सभापति से की सदस्यता रद्द करने की मांग

इस पूरे विवाद में राजद के वरिष्ठ नेता और सांसद मनोज कुमार झा ने भी मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने बिहार विधान परिषद के सभापति से दोनों नेताओं को अयोग्य घोषित करने की अपील की है। मनोज कुमार झा का कहना है कि सदन की सदस्यता और दल-बदल से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों का पालन होना चाहिए। यदि दोनों नेताओं ने भाजपा की सदस्यता ग्रहण की है तो इस मामले में नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि इस मामले में उचित कार्रवाई नहीं होती है तो विपक्ष इसे अदालत में भी ले जाएगा और जनता के बीच भी उठाएगा। विपक्ष का कहना है कि भाजपा एक तरफ संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ निर्दलीय निर्वाचित सदस्यों को पार्टी में शामिल कर नियमों की अनदेखी कर रही है।

विवाद बढ़ा तो भाजपा ने लिया यू-टर्न

विपक्ष के लगातार हमलों और दल-बदल कानून के उल्लंघन के आरोपों के बाद भाजपा बैकफुट पर नजर आ रही है। पार्टी की ओर से अब कहा जा रहा है कि वंशीधर ब्रजवासी और राहुल राज भाजपा में औपचारिक रूप से शामिल नहीं हुए हैं। दोनों ने सिर्फ भाजपा को समर्थन दिया है। भाजपा का तर्क है कि निर्दलीय निर्वाचित सदस्य किसी राजनीतिक दल का समर्थन कर सकते हैं। पार्टी ने दोनों नेताओं को भाजपा में शामिल कराने से संबंधित सोशल मीडिया पोस्ट भी हटा दी है। हालांकि, भाजपा के इस दावे पर विपक्ष ने सवाल खड़े किए हैं। विपक्ष का कहना है कि यदि दोनों नेताओं ने सिर्फ समर्थन दिया था तो फिर उनकी भाजपा में ज्वाइनिंग की घोषणा क्यों की गई थी? सदस्यता पर्ची के साथ तस्वीरें क्यों जारी की गई थीं? अब भाजपा की सफाई और पहले जारी की गई तस्वीरों के बीच विरोधाभास को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है।

जदयू की नाराजगी भी बनी भाजपा के लिए मुश्किल

इस विवाद का एक और महत्वपूर्ण पहलू एनडीए के भीतर की नाराजगी है। दोनों निर्दलीय एमएलसी ने विधान परिषद चुनाव में जदयू के उम्मीदवारों को हराकर जीत हासिल की थी। ऐसे में चुनाव के तुरंत बाद भाजपा से उनका जुड़ना जदयू के कई नेताओं को पसंद नहीं आया।

राहुल राज की कहानी: टिकट नहीं मिला तो निर्दलीय लड़े चुनाव

सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से निर्वाचित राहुल राज का भाजपा से पुराना राजनीतिक संबंध रहा है। वह चुनाव से पहले भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति के सदस्य थे। हालांकि, विधान परिषद चुनाव में यह सीट जदयू के खाते में चली गई और उन्हें एनडीए का टिकट नहीं मिला। इसके बाद राहुल राज ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव मैदान में उतरने का फैसला किया। पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार के खिलाफ चुनाव लड़ने के कारण उन्हें जदयू से छह वर्षों के लिए निष्कासित कर दिया गया था। 27 अक्टूबर को चुनाव परिणाम आने के बाद चौथे दिन ही राहुल राज के भाजपा से जुड़ने की खबर सामने आई। इसके बाद एनडीए के भीतर राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गईं।

वंशीधर ब्रजवासी दूसरी बार बने निर्दलीय MLC

दूसरी ओर, तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से निर्वाचित वंशीधर ब्रजवासी भी बिहार की राजनीति में चर्चित चेहरा हैं। उन्होंने दूसरी बार निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीत दर्ज की है। शिक्षकों और युवाओं के कल्याण के मुद्दे को लेकर राजनीति करने वाले ब्रजवासी ने भी भाजपा का समर्थन करने और पार्टी से जुड़ने की घोषणा की थी। उनकी जीत को जदयू के लिए बड़ा झटका माना गया, क्योंकि उन्होंने जदयू के उम्मीदवार को हराया था। ऐसे में चुनाव के तुरंत बाद भाजपा के साथ उनका जुड़ना एनडीए के भीतर भी चर्चा का विषय बन गया।

जदयू नेताओं ने सोशल मीडिया पर भी उठाए सवाल

दोनों निर्दलीय एमएलसी के भाजपा से जुड़ने के बाद जदयू के नेताओं की नाराजगी भी सामने आई है। तीन दिन पहले अभिषेक ने फेसबुक पोस्ट के जरिए चुनाव परिणाम और एनडीए के भीतर की परिस्थितियों पर सवाल उठाए थे। उन्होंने आरोप लगाया था कि एनडीए नेताओं के चक्रव्यूह के कारण उनकी हार हुई। उनके पक्ष में आए 4700 मतों को रद्द किए जाने का भी दावा किया गया। इस बयान के बाद एनडीए के भीतर चुनावी रणनीति और सहयोगी दलों के बीच तालमेल को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

अब सभापति के फैसले पर टिकी निगाहें

बिहार के इस राजनीतिक विवाद में अब सबसे अहम भूमिका विधान परिषद के सभापति की हो सकती है। विपक्ष की मांग है कि दोनों नेताओं के भाजपा से जुड़ने के मामले की जांच कराई जाए और यदि दल-बदल कानून का उल्लंघन पाया जाता है तो उनकी सदस्यता रद्द की जाए। दूसरी तरफ भाजपा का कहना है कि दोनों नेताओं ने पार्टी की सदस्यता नहीं ली है, बल्कि समर्थन दिया है। ऐसे में पूरे मामले में यह महत्वपूर्ण होगा कि दोनों नेताओं की ओर से वास्तव में क्या औपचारिक कदम उठाए गए थे और उनके खिलाफ अयोग्यता से संबंधित प्रावधान लागू होते हैं या नहीं। सोशल मीडिया पर जारी तस्वीरें, भाजपा की ओर से पहले की गई ज्वाइनिंग की घोषणा और बाद में उससे पीछे हटने का फैसला इस विवाद को और दिलचस्प बना रहा है।

अब देखना होगा कि विधान परिषद के सभापति इस मामले में क्या रुख अपनाते हैं। क्या वंशीधर ब्रजवासी और राहुल राज की सदस्यता पर कोई खतरा आएगा या भाजपा का समर्थन वाला तर्क उन्हें राहत दिलाएगा? फिलहाल बिहार की सियासत में यह मामला चर्चा का बड़ा विषय बना हुआ है।

दोनों निर्दलीय एमएलसी बीजेपी में शामिल हुए 

विधान परिषद की स्नातक एवं शिक्षक क्षेत्र से जीते दो निर्दलीय सदस्य- वंशीधर ब्रजवासी और राहुल राज को आनन-फानन में भाजपा की सदस्यता दिला दी गई, लेकिन, जब कानूनी पेच और मुख्य सहयोगी जदयू की नाराजगी की चिंता हुई तो कहा गया कि ये दोनों पार्टी में शामिल नहीं हुए हैं। केवल भाजपा का समर्थन किया है। दल बदल कानून के तहत सदन के लिए निर्वाचित निर्दलीय सदस्य किसी दल की सदस्यता ग्रहण नहीं कर सकते। वे समर्थन कर सकते हैं। दल की सदस्यता ग्रहण करने की छूट राष्ट्रपति या राज्यपाल की ओर से मनोनीत सदस्यों को है।

क्या है मामला?

सारण शिक्षक क्षेत्र से निर्वाचित राहुत राज मूल रूप से भाजपा के हैं। वे भाजपा की प्रदेश कार्य समिति के सदस्य थे। लेकिन जदयू के अधिकृत उम्मीदवार आनंद पुष्कर के विरुद्ध नामांकन दाखिल करने के कारण उन्हें दल से छह वर्षों के लिए निष्कासित कर दिया गया। 27 अक्टूबर को परिणाम आया और उसके चौथे दिन उन्हें भाजपा में शामिल कर लिया गया। तिरहुत स्नातक क्षेत्र से निर्दलीय निर्वाचित वंशीधर ब्रजवासी का किस्सा अलग है। वे दूसरी बार निर्दलीय जीते और शिक्षकों-युवाओं के कल्याण के नाम पर भाजपा में शामिल हो गए। उन्होंने जदयू के अभिषेक झा को पराजित किया। दिलचस्प यह है कि तीन दिन पहले अभिषेक ने अपने फेसबुक पर लिखा था कि एनडीए नेताओं के चक्रव्यूह के कारण उनकी हार हुई। उनके पक्ष में आए 47 सौ मतों को रद कर दिया गया।

ब्रजवासी के भाजपा में शामिल होते ही जदयू की कतारों में यह बात फैल गई कि क्या अभिषेक का आरोप सही है? तिरहुत स्नातक क्षेत्र से चार बार चुनाव जीत चुके जदयू के सांसद देवेशचंद्र ठाकुर ने भी एनडीए के कई नेताओं पर अभिषेक का समर्थन न करने का आरोप लगाया। ठाकुर के 2024 में लोकसभा के लिए चुने जाने के बाद ही वहां उसी साल उप चुनाव हुआ था, उसमें भी जदयू उम्मीदवार अभिषेक झा की हार हुई थी। तब भी निर्दलीय वंशीधर ब्रजवासी ही जीते थे।

सोशल मीडिया प्लेटफार्म से हटा दावा

भाजपा में शामिल होने के तुरंत बाद ब्रजवासी ने इंटरनेट मीडिया पर पोस्ट किया कि वे अपने मतदाताओं के हित के लिए भाजपा में शामिल हो गए हैं। लेकिन, जैसे ही इस पर विवाद हुआ, उन्होंने पहले वाले पोस्ट को हटा लिया। दूसरा पोस्ट डाल दिया कि भाजपा में शामिल नहीं हुए हैं। बल्कि भाजपा का समर्थन करने की घोषणा की है। उनकी पलटी पर इंटरनेट मीडिया के यूजर मजे ले रहे हैं। राहुल राज ने भी शामिल होने के बदले समर्थन देने की बात कही।