Highlights:
- अनंत सिंह की सदस्यता खत्म करने की मांग पर विधानसभा सचिवालय ने सात दिन में जवाब मांगा
- जेडीयू ने एमएलसी चुनाव में पार्टी उम्मीदवार के खिलाफ प्रचार करने का आरोप लगाया
- पप्पू यादव ने विधानसभा अध्यक्ष प्रेम कुमार से कार्रवाई में दोहरे मापदंड पर सवाल किया
- भाजपा विधायक राजू सिंह को जुलाई में हत्या के मामले में चार साल की सजा सुनाई गई थी
पटना/पूर्णिया (Threesocieties.com Desk): बिहार की राजनीति में विधायकों की सदस्यता को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। मोकामा के विधायक अनंत सिंह को विधानसभा सचिवालय की ओर से सदस्यता समाप्त करने की मांग पर नोटिस भेजे जाने के बाद पूर्णिया के निर्दलीय सांसद पप्पू यादव ने सवाल उठाए हैं। उन्होंने विधानसभा की कार्रवाई में दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगाते हुए पूछा है कि अनंत सिंह के मामले में इतनी तेजी क्यों दिखाई जा रही है, जबकि हत्या के एक मामले में चार साल की सजा पाए भाजपा विधायक राजू सिंह के खिलाफ अब तक सदस्यता समाप्त करने की दिशा में कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
पप्पू यादव ने विधानसभा अध्यक्ष प्रेम कुमार और बिहार सरकार को निशाने पर लेते हुए कहा कि कानून और विधानसभा की कार्रवाई सभी जनप्रतिनिधियों के लिए एक समान होनी चाहिए। अगर किसी विधायक की सदस्यता समाप्त करने के लिए नियमों का हवाला दिया जा रहा है तो दूसरे मामले में भी उसी नियम के तहत कार्रवाई होनी चाहिए।
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अनंत सिंह को सात दिन में जवाब देने का नोटिस
मोकामा के विधायक अनंत सिंह की सदस्यता को लेकर विवाद जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) की शिकायत के बाद शुरू हुआ। जेडीयू ने विधानसभा अध्यक्ष से शिकायत की थी कि अनंत सिंह ने पार्टी के उम्मीदवार के खिलाफ प्रचार कर दल-विरोधी गतिविधियों में हिस्सा लिया है। शिकायत के मुताबिक, पटना ग्रेजुएट निर्वाचन क्षेत्र के एमएलसी चुनाव में अनंत सिंह ने जेडीयू उम्मीदवार नीरज कुमार के बजाय जन सुराज पार्टी के प्रत्याशी अनुज सिंह के समर्थन में प्रचार किया था। पार्टी ने इसे अनुशासनहीनता और दल-विरोधी गतिविधि बताते हुए उनकी विधानसभा सदस्यता समाप्त करने की मांग की।
इस शिकायत पर विधानसभा अध्यक्ष प्रेम कुमार के निर्देश के बाद विधानसभा सचिवालय ने अनंत सिंह को नोटिस जारी किया है। नोटिस में उनसे सात दिनों के भीतर अपना पक्ष रखने को कहा गया है। यही कार्रवाई अब बिहार की राजनीति में चर्चा का विषय बन गई है। पप्पू यादव का सवाल है कि अनंत सिंह के मामले में विधानसभा सचिवालय इतनी तेजी दिखा रहा है तो भाजपा विधायक राजू सिंह के मामले में अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
पप्पू यादव ने कहा- सरकार बचाने में अनंत सिंह का इस्तेमाल किया
पप्पू यादव ने अपने लाइव वीडियो में विधानसभा की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा कि अनंत सिंह की विचारधारा से उनकी सहमति नहीं है, लेकिन कार्रवाई में भेदभाव नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा, 'आपने अनंत सिंह का इस्तेमाल सरकार बनाने में किया। अब अनंत सिंह की सदस्यता खत्म करने के लिए तुरंत नोटिस दे दिया। मैं किसी का विरोधी नहीं हूं। मेरी विचारधारा अनंत सिंह से नहीं मिलती। लेकिन स्पीकर और भाजपा के मुख्यमंत्री से पूछना चाहता हूं कि अनंत सिंह की सदस्यता के मामले में इतनी जल्दबाजी क्यों है?'
पप्पू यादव ने आगे सवाल उठाया कि जब भाजपा विधायक राजू सिंह को हत्या के एक मामले में चार साल की सजा हुई तो उनकी सदस्यता समाप्त करने के लिए विधानसभा अध्यक्ष के पास कार्रवाई की मांग क्यों नहीं की गई? उन्होंने आरोप लगाया कि राजनीतिक जरूरत के हिसाब से कार्रवाई की गति बदल जाती है। पप्पू यादव ने यह भी दावा किया कि नीतीश कुमार के महागठबंधन छोड़ने के बाद सरकार बचाने में अनंत सिंह ने जेडीयू और भाजपा की मदद की थी। उनके इस बयान के बाद बिहार की सियासत में अनंत सिंह और राजू सिंह के मामलों की तुलना शुरू हो गई है।
राजू सिंह को जुलाई में हुई थी चार साल की सजा
पप्पू यादव ने मुजफ्फरपुर जिले की साहेबगंज विधानसभा सीट से भाजपा विधायक राजू सिंह का मामला उठाया है। राजू सिंह को दिल्ली की एक अदालत ने जुलाई 2026 में हत्या से जुड़े मामले में चार साल की सजा सुनाई थी। इस फैसले के बाद उनकी विधानसभा सदस्यता को लेकर भी सवाल उठने लगे थे। हालांकि, सितंबर 2026 में दिल्ली हाईकोर्ट ने उनकी सजा निलंबित कर दी थी। लेकिन अदालत ने उनकी दोषसिद्धि पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। अदालत का कहना था कि निचली अदालत के फैसले में फिलहाल ऐसी कोई गंभीर या स्पष्ट त्रुटि नजर नहीं आती, जिसके आधार पर दोषसिद्धि पर रोक लगाई जाए। इसी आधार पर पप्पू यादव का सवाल है कि जब राजू सिंह की दोषसिद्धि बरकरार है तो उनकी सदस्यता को लेकर विधानसभा की ओर से अब तक क्या कार्रवाई की गई?
दीपांकर भट्टाचार्य भी उठा चुके हैं सवाल
राजू सिंह की सदस्यता का मामला सिर्फ पप्पू यादव तक सीमित नहीं है। भाकपा-माले के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य भी इस मुद्दे पर विधानसभा की भूमिका पर सवाल उठा चुके हैं। माले की ओर से विधानसभा अध्यक्ष को औपचारिक पत्र भेजकर राजू सिंह की सदस्यता समाप्त करने की मांग की गई थी। पार्टी का कहना है कि दो साल से अधिक की सजा के मामलों में जनप्रतिनिधियों की सदस्यता को लेकर कानून के प्रावधानों के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। माले ने भी सवाल उठाया है कि जब एक विधायक के खिलाफ सदस्यता समाप्त करने की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है तो दूसरे विधायक के मामले में देरी क्यों हो रही है?
राहुल गांधी और आजम खान के मामलों का भी दिया जा रहा उदाहरण
इस पूरे विवाद में कांग्रेस नेता राहुल गांधी और समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान के मामलों का भी उदाहरण दिया जा रहा है। जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत दो साल या उससे अधिक की सजा होने पर दोषसिद्धि के बाद अयोग्यता का प्रावधान है। इसी कानूनी व्यवस्था के तहत राहुल गांधी और आजम खान की सदस्यता समाप्त हुई थी। राहुल गांधी को गुजरात की अदालत से सजा मिलने के बाद लोकसभा सचिवालय ने उनकी सदस्यता समाप्त कर दी थी। इसी तरह आजम खान की सदस्यता भी सजा के बाद समाप्त हुई थी।हालांकि, हर मामले में अदालत के आदेश, दोषसिद्धि पर रोक, सजा के निलंबन और संबंधित कानूनी परिस्थितियों को अलग-अलग देखना जरूरी होता है।
अनंत सिंह और राजू सिंह दोनों के मामलों पर टिकी निगाहें
बिहार विधानसभा में अनंत सिंह और राजू सिंह की सदस्यता को लेकर उठे सवाल अब राजनीतिक बहस का विषय बन गए हैं। एक ओर अनंत सिंह को जेडीयू की शिकायत पर सात दिन में जवाब देने का नोटिस मिला है। दूसरी ओर भाजपा विधायक राजू सिंह के मामले में दोषसिद्धि के बावजूद विधानसभा की कार्रवाई को लेकर विपक्षी दल और नेता सवाल उठा रहे हैं।
पप्पू यादव ने इस पूरे मामले को राजनीतिक दोहरे मापदंड से जोड़ते हुए विधानसभा अध्यक्ष से जवाब मांगा है। अब देखना होगा कि अनंत सिंह के जवाब के बाद विधानसभा सचिवालय क्या कदम उठाता है और राजू सिंह की सदस्यता को लेकर उठ रहे सवालों पर क्या निर्णय लिया जाता है। बिहार की राजनीति में अब सवाल सिर्फ दो विधायकों की सदस्यता का नहीं, बल्कि विधानसभा में कानून और नियमों के समान इस्तेमाल का भी बन गया है।