नंगे पैर लड़ी लड़ाई, जीत के बाद पहनी चप्पल, कंडक्टर के बेटे दीपांशु का DUSU में जलवा
DUSU चुनाव में निर्दलीय दीपांशु शौकीन ने उपाध्यक्ष पद पर 13,705 वोटों से जीत दर्ज की। NSUI से टिकट नहीं मिलने के बाद नंगे पैर प्रचार कर चर्चा में आए दीपांशु DTC बस कंडक्टर के बेटे हैं।
HighLights:
- NSUI से टिकट नहीं मिलने के बाद निर्दलीय चुनाव लड़े दीपांशु शौकीन
- DUSU उपाध्यक्ष पद पर दीपांशु ने दर्ज की शानदार जीत
- एबीवीपी के इशू मौर्य को 13,705 वोटों से हराया, दीपांशु को मिले 30,615 वोट
- छात्र सुरक्षा के लिए 14 दिन तक नंगे पैर किया चुनाव प्रचार
नई दिल्ली (Threesocieties.com Desk): दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ (DUSU) चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार दीपांशु शौकीन ने उपाध्यक्ष पद पर शानदार जीत दर्ज कर अपनी अलग पहचान बनाई है। NSUI से टिकट नहीं मिलने के बाद निर्दलीय मैदान में उतरे दीपांशु ने एबीवीपी और NSUI के उम्मीदवारों को पीछे छोड़ते हुए उपाध्यक्ष पद अपने नाम किया।
दीपांशु शौकीन को कुल 30,615 वोट मिले। उन्होंने एबीवीपी के इशू मौर्य को 13,705 वोटों के अंतर से हराया। उनकी जीत इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने छात्रों की सुरक्षा के मुद्दे को लेकर 14 दिनों तक नंगे पैर प्रचार करने का संकल्प लिया था। जीत के बाद दीपांशु ने अपना संकल्प पूरा किया और पैरों में चप्पल पहनी। उनके इस अनोखे अभियान ने चुनाव के दौरान छात्रों का ध्यान खींचा।
NSUI से टिकट नहीं मिला तो निर्दलीय मैदान में उतरे
दीपांशु शौकीन चुनाव से पहले NSUI के उपाध्यक्ष पद के प्रमुख दावेदारों में शामिल थे। उनका नामांकन भी हुआ था, लेकिन बाद में पार्टी की ओर से उन्हें नामांकन वापस लेने के लिए कहा गया। दीपांशु ने नामांकन वापस लेने से इनकार कर दिया और निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव मैदान में डटे रहे। इसके बाद उन्होंने जोरदार प्रचार अभियान चलाया और छात्रों के बीच अपनी पकड़ मजबूत की। चुनाव परिणाम ने उनके इस फैसले को चर्चा का विषय बना दिया। शुरुआत से ही बढ़त बनाए रखने वाले दीपांशु ने आखिरकार उपाध्यक्ष पद पर जीत दर्ज की।
बस कंडक्टर के बेटे हैं दीपांशु
दीपांशु शौकीन पश्चिमी दिल्ली के पीरागढ़ी गांव के रहने वाले हैं। उनके पिता राकेश शौकीन दिल्ली परिवहन निगम में बस कंडक्टर हैं, जबकि उनकी मां आंगनबाड़ी कार्यकर्ता हैं। दीपांशु ने वर्ष 2026 में भगत सिंह कॉलेज से ग्रेजुएशन पूरा किया। वर्तमान में वह दिल्ली विश्वविद्यालय के डिपार्टमेंट ऑफ बुद्धिस्ट स्टडीज के छात्र हैं।साधारण पारिवारिक पृष्ठभूमि से आने वाले दीपांशु की छात्र राजनीति में सक्रियता ने उन्हें डूसू चुनाव में प्रमुख चेहरा बना दिया।
छात्रों की सुरक्षा के लिए 14 दिन नंगे पैर किया प्रचार
दीपांशु के चुनाव अभियान की सबसे ज्यादा चर्चा उनके नंगे पैर प्रचार को लेकर हुई। सत्य निकेतन हादसे के बाद उन्होंने छात्रों की सुरक्षा और हॉस्टल की सुविधाओं को लेकर आवाज उठाई। उन्होंने संकल्प लिया था कि जब तक वह छात्रों की आवाज बनने की दिशा में आगे नहीं बढ़ते, तब तक चप्पल नहीं पहनेंगे। इसके बाद धूप, गर्मी और लंबे पैदल प्रचार के बावजूद वह करीब 14 दिनों तक नंगे पैर छात्रों के बीच पहुंचे। उनका कहना था कि यह सिर्फ उनके पैरों का सवाल नहीं है, बल्कि विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले छात्रों की सुरक्षा, सम्मान और बेहतर सुविधाओं का सवाल है।
जीत के बाद पूरा हुआ संकल्प
DUSU चुनाव में जीत दर्ज करने के बाद दीपांशु ने अपना संकल्प पूरा किया और चप्पल पहनी। उनके इस कदम की तस्वीर और वीडियो चुनाव परिणाम के बाद चर्चा में रहे। दीपांशु ने अपनी जीत को सिर्फ व्यक्तिगत जीत नहीं बताया। उनका कहना है कि यह उन छात्रों की जीत है, जो विश्वविद्यालय में सुरक्षित हॉस्टल, बेहतर सुविधाएं और अपनी समस्याओं की मजबूत आवाज चाहते हैं।
माता-पिता को बेटे पर गर्व
दीपांशु की जीत से उनके माता-पिता भी बेहद भावुक नजर आए। पिता के बस कंडक्टर और मां के आंगनबाड़ी कार्यकर्ता होने के कारण उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि भी चुनाव के दौरान चर्चा में रही। शुरुआत में लगातार नंगे पैर प्रचार करने को लेकर परिवार चिंतित था, लेकिन बाद में माता-पिता ने बेटे के संकल्प और छात्र हित के मुद्दे का समर्थन किया। जीत के बाद दीपांशु ने अपने माता-पिता को भी अपनी सफलता का हिस्सा बताया।
NSUI के फैसले पर उठे सवाल
दीपांशु को NSUI से टिकट नहीं मिलने के बाद उनका निर्दलीय चुनाव लड़ना संगठन के लिए चर्चा का विषय बन गया। चुनाव से पहले दीपांशु और विशेष यादव को NSUI की संभावित सूची में मजबूत दावेदार माना जा रहा था। टिकट नहीं मिलने के बाद दोनों के समर्थकों में नाराजगी देखने को मिली। चुनाव अभियान के दौरान डीयू की सड़कों पर कुछ समर्थक भावुक होकर रोते हुए भी नजर आए। हालांकि, चुनाव परिणाम के बाद दीपांशु ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर उपाध्यक्ष पद जीतकर अपनी राजनीतिक पकड़ का प्रदर्शन किया।
अब उपाध्यक्ष के रूप में छात्र मुद्दों पर रहेगी नजर
दीपांशु शौकीन की जीत के साथ उनके सामने अब चुनाव प्रचार के दौरान किए गए वादों और उठाए गए छात्र मुद्दों को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी होगी।छात्र सुरक्षा, हॉस्टल की बेहतर व्यवस्था और विद्यार्थियों की समस्याओं को लेकर उन्होंने जिस तरह चुनाव अभियान चलाया, अब देखना होगा कि डूसू उपाध्यक्ष के रूप में वह इन मुद्दों को किस तरह उठाते हैं।नंगे पैर प्रचार से शुरू हुई दीपांशु की चुनावी कहानी जीत के बाद चप्पल पहनने के साथ भले ही पूरी हुई हो, लेकिन छात्र राजनीति में उनके लिए असली परीक्षा अब शुरू हुई है।




