DGP नियुक्ति पर झारखंड सरकार घिरी, केंद्र की 209 पन्नों की IA पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
झारखंड DGP नियुक्ति विवाद में केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची। गृह मंत्रालय ने 209 पन्नों की IA दाखिल कर 2025 की नियमावली और तदाशा मिश्रा की नियुक्ति पर सवाल उठाए। 8 अक्टूबर को सुनवाई होगी।
HighLights:
- केंद्र ने झारखंड की 2025 DGP नियुक्ति नियमावली को सुप्रीम कोर्ट में दी चुनौती
- केंद्र सरकार ने 209 पन्नों की अंतरिम याचिका (IA) दाखिल किया
- डीजीपी तदाशा मिश्रा की नियुक्ति पर भी केंद्र ने सवाल उठाये, 8 अक्टूबर को मामले की सुनवाई
- केंद्र ने प्रकाश सिंह फैसले के निर्देशों के उल्लंघन का आरोप लगाया
नई दिल्ली (Threesocieties.com Desk): झारखंड में पुलिस महानिदेशक (DGP) की नियुक्ति को लेकर केंद्र और राज्य सरकार के बीच विवाद अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय ने झारखंड सरकार की DGP नियुक्ति प्रक्रिया को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में 209 पन्नों की अंतरिम याचिका (IA) दाखिल की है। केंद्र ने राज्य सरकार की ओर से बनाई गई ‘झारखंड पुलिस महानिदेशक और पुलिस महानिरीक्षक (पुलिस बल के प्रमुख) चयन एवं नियुक्ति नियमावली, 2025’ को सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्देशों के विपरीत बताते हुए इसे रद्द करने की मांग की है।
केंद्र ने याचिका में नियमावली के तहत की गई DGP नियुक्तियों को भी अवैध घोषित करने और प्रकाश सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का पूरी तरह पालन कराने का अनुरोध किया है। मामले में झारखंड की मौजूदा DGP तदाशा मिश्रा की नियुक्ति भी सवालों के घेरे में है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की ओर से दायर अवमानना याचिका को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति दी है। मामले की सुनवाई 8 अक्टूबर को होने वाली है।
209 पन्नों की IA में केंद्र ने क्या कहा?
केंद्र सरकार की ओर से दाखिल अंतरिम याचिका में झारखंड सरकार की DGP नियुक्ति प्रक्रिया पर गंभीर आपत्ति जताई गई है। केंद्र का कहना है कि राज्य सरकार ने 8 जनवरी 2025 को अपनी अलग DGP नियुक्ति नियमावली अधिसूचित की, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही DGP नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी कर रखे हैं।
केंद्र के अनुसार, राज्य की नई नियमावली में DGP के चयन के लिए राज्य स्तर पर समिति बनाए जाने का प्रावधान किया गया है। केंद्र का दावा है कि यह व्यवस्था सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय प्रक्रिया से अलग है और इसमें UPSC की भूमिका को दरकिनार किया गया है।केंद्र ने अदालत से इस नियमावली को अवैध घोषित कर रद्द करने तथा इसके आधार पर हुई नियुक्तियों की समीक्षा करने की मांग की है।
प्रकाश सिंह फैसले का दिया गया हवाला
DGP नियुक्ति विवाद में केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट के 2006 के प्रकाश सिंह फैसले को मुख्य आधार बनाया है। इस फैसले और बाद के निर्देशों में पुलिस महानिदेशक की नियुक्ति के लिए एक निर्धारित प्रक्रिया तय की गई थी। इसके अनुसार राज्य सरकार को DGP पद के लिए योग्य वरिष्ठ अधिकारियों में से चयन करना होता है। इसके लिए UPSC द्वारा तैयार किए गए पैनल को आधार बनाया जाता है। अधिकारियों की वरिष्ठता, सेवा रिकॉर्ड और पुलिस बल का नेतृत्व करने के अनुभव जैसे मानकों को भी महत्व दिया जाता है। केंद्र का आरोप है कि झारखंड सरकार की 2025 की नियमावली इस निर्धारित प्रक्रिया से अलग है।
अनुराग गुप्ता की नियुक्ति पर भी केंद्र ने उठाए सवाल
केंद्र ने अपनी याचिका में झारखंड के पूर्व DGP अनुराग गुप्ता की नियुक्ति का भी उल्लेख किया है। केंद्र के अनुसार, झारखंड सरकार ने 2 फरवरी 2025 को अनुराग गुप्ता को दो साल के कार्यकाल के लिए DGP नियुक्त किया था, जबकि उनकी सेवानिवृत्ति में उस समय करीब तीन महीने ही बचे थे। केंद्र ने इस नियुक्ति को लेकर झारखंड सरकार को पत्र भेजकर आपत्ति जताई थी। बाद में अनुराग गुप्ता ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली। केंद्र का कहना है कि DGP की नियुक्ति के समय अधिकारी की कम से कम छह महीने की सेवा शेष होना जरूरी है।
तदाशा मिश्रा की नियुक्ति बनी विवाद का केंद्र
अनुराग गुप्ता के बाद झारखंड सरकार ने 30 दिसंबर 2025 को तदाशा मिश्रा को राज्य का DGP नियुक्त किया। इस नियुक्ति को लेकर विवाद इसलिए बढ़ा क्योंकि तदाशा मिश्रा को नियुक्ति के अगले ही दिन यानी 31 दिसंबर 2025 को सेवानिवृत्त होना था। यानी उनकी नियुक्ति के समय उनकी सेवा अवधि में महज एक दिन शेष था। केंद्र ने इसी मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रमुखता से उठाया है।
छह महीने की शेष सेवा का नियम हटाने का आरोप
केंद्र के अनुसार, तदाशा मिश्रा की नियुक्ति से ठीक पहले 29 दिसंबर 2025 को राज्य सरकार ने एक संकल्प पारित कर छह महीने की न्यूनतम शेष सेवा की शर्त को हटा दिया। इसके अगले दिन यानी 30 दिसंबर को तदाशा मिश्रा को DGP नियुक्त किया गया। केंद्र का आरोप है कि यह पूरी प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के निर्धारित मानकों को दरकिनार करने के लिए की गई।
गृह मंत्रालय ने 6 जनवरी 2026 को झारखंड सरकार को पत्र भेजकर 8 जनवरी 2025 की नियमावली और तदाशा मिश्रा की नियुक्ति को रद्द करने तथा प्रकाश सिंह मामले के निर्देशों के अनुरूप नई नियुक्ति प्रक्रिया शुरू करने को कहा था। हालांकि, केंद्र के मुताबिक राज्य सरकार ने उसकी आपत्ति के बावजूद अपनी प्रक्रिया जारी रखी।
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र की अवमानना याचिका
अब केंद्र सरकार ने इसी मामले को सुप्रीम कोर्ट में उठाया है। केंद्र की ओर से अदालत से झारखंड सरकार के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की मांग की गई है। केंद्र का कहना है कि राज्य सरकार ने DGP नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट के पहले से जारी निर्देशों का पालन नहीं किया। केंद्र ने अदालत से मांग की है कि झारखंड सरकार को प्रकाश सिंह मामले में दिए गए सभी निर्देशों का पालन करने का आदेश दिया जाए।
सीजेआई की पीठ के सामने उठा मामला
केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बुधवार को भारत के प्रधान न्यायाधीश (CJI) न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष मामले को उठाया। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल हैं। सॉलिसिटर जनरल ने अनुरोध किया कि केंद्र की अवमानना याचिका को तदाशा मिश्रा की नियुक्ति से संबंधित पहले से लंबित याचिकाओं के साथ सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाए। पीठ ने इस अनुरोध को स्वीकार करते हुए मामले को 8 अक्टूबर को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई।
DGP नियुक्ति के दो साल के कार्यकाल पर भी सवाल
प्रकाश सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट ने DGP के कार्यकाल को लेकर भी महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं। इसके तहत नियुक्त DGP को सामान्य तौर पर कम से कम दो साल का कार्यकाल देने की व्यवस्था है, भले ही उसकी सेवानिवृत्ति की तारीख पहले क्यों न आ रही हो। इसी वजह से तदाशा मिश्रा की नियुक्ति को लेकर कानूनी सवाल और गंभीर हो गए हैं। एक तरफ उनकी नियुक्ति के समय सेवानिवृत्ति में सिर्फ एक दिन बचा था, वहीं दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों में DGP को न्यूनतम कार्यकाल देने की बात कही गई है।
न्यायमित्र ने भी उठाया था छह महीने की सेवा का मुद्दा
इस मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता और न्यायमित्र राजू रामचंद्रन भी पहले सुप्रीम कोर्ट के समक्ष DGP नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर अपनी बात रख चुके हैं। उन्होंने अदालत को बताया था कि DGP नियुक्ति के समय संबंधित अधिकारी की कम से कम छह महीने की सेवा शेष रहने की शर्त का पालन किया जाना चाहिए। तदाशा मिश्रा की नियुक्ति इसी बिंदु पर विवादित हुई है।
अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिकी नजर
अब 8 अक्टूबर को होने वाली सुनवाई पर झारखंड की राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों की नजरें टिकी हैं। सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह होगा कि झारखंड सरकार की 2025 की DGP नियुक्ति नियमावली क्या अदालत के पहले से जारी निर्देशों के अनुरूप है? इसके साथ ही यह भी महत्वपूर्ण होगा कि तदाशा मिश्रा की नियुक्ति के समय छह महीने की सेवा शेष होने की शर्त में बदलाव और उनकी नियुक्ति की प्रक्रिया कानूनी रूप से वैध थी या नहीं। यदि अदालत केंद्र की दलीलों से सहमत होती है तो झारखंड सरकार की DGP नियुक्ति प्रक्रिया और 2025 की नियमावली को लेकर बड़ा कानूनी संकट खड़ा हो सकता है। फिलहाल सभी की नजरें 8 अक्टूबर की सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर हैं।




