झारखंड पुलिस में विभागीय परीक्षा से नियुक्त SI के प्रमोशन पर रोक जारी, 2018 बैच से सीनीयरटी विवाद गहराया
झारखंड हाईकोर्ट ने 2018 बैच के सीधी भर्ती और विभागीय परीक्षा से नियुक्त सब-इंस्पेक्टरों के बीच सीनियरिटी विवाद में विभागीय परीक्षा से नियुक्त दरोगाओं की इंस्पेक्टर पद पर प्रोन्नति पर लगी रोक बरकरार रखी। गृह विभाग को नोटिस जारी करने का आदेश, अगली सुनवाई 2 सितंबर को होगी।
HighLights:
- हाईकोर्ट ने विभागीय परीक्षा से नियुक्त दरोगाओं की इंस्पेक्टर पद पर प्रोन्नति पर रोक बरकरार रखी
- गृह विभाग के माध्यम से सीमित विभागीय परीक्षा से नियुक्त सभी दरोगाओं को नोटिस जारी करने का आदेश
- 2018 बैच के सीधी भर्ती और विभागीय परीक्षा से नियुक्त सब-इंस्पेक्टरों के बीच सीनियरिटी विवाद
रांची (Threesocieties.com Desk): झारखंड पुलिस में वर्ष 2018 बैच के सब-इंस्पेक्टरों की वरीयता (सीनियरिटी) को लेकर चल रहे विवाद में झारखंड हाईकोर्ट ने गुरुवार को महत्वपूर्ण आदेश दिया। जस्टिस दीपक रौशन की एकल पीठ ने सीमित विभागीय परीक्षा के माध्यम से नियुक्त सब-इंस्पेक्टरों की इंस्पेक्टर पद पर होने वाली प्रोन्नति पर पहले से लगी रोक को बरकरार रखते हुए मामले में गृह विभाग के जरिए सभी संबंधित विभागीय परीक्षा से नियुक्त दरोगाओं को नोटिस जारी करने का निर्देश दिया।
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अदालत ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 2 सितंबर की तिथि निर्धारित की है। हाईकोर्ट के इस आदेश से फिलहाल विभागीय परीक्षा के माध्यम से नियुक्त दरोगाओं की इंस्पेक्टर पद पर प्रोन्नति पर रोक बनी रहेगी।
क्या है पूरा मामला?
यह विवाद वर्ष 2017 में झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC) द्वारा जारी दो अलग-अलग विज्ञापनों से शुरू हुआ। पहला विज्ञापन 05/2017 के तहत खुली प्रतियोगिता परीक्षा के माध्यम से सब-इंस्पेक्टरों की सीधी भर्ती के लिए जारी किया गया था। इसके बाद 09/2017 के तहत विभाग में कार्यरत कर्मचारियों के लिए सीमित विभागीय प्रतियोगिता परीक्षा आयोजित की गई, जिसके जरिए भी सब-इंस्पेक्टरों की नियुक्ति हुई। दोनों प्रक्रियाओं से चयनित अभ्यर्थियों को वर्ष 2018 में नियुक्ति मिली। विवाद तब पैदा हुआ जब विभाग ने जारी वरीयता सूची में विभागीय परीक्षा (09/2017) से नियुक्त दरोगाओं को सीधी भर्ती (05/2017) वाले अधिकारियों से ऊपर स्थान दे दिया।
याचिकाकर्ताओं ने क्या कहा?
याचिकाकर्ता उत्तम तिवारी एवं अन्य की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनोज टंडन और अधिवक्ता सुमित गाड़ोदिया ने अदालत में पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि सीधी भर्ती का विज्ञापन पहले जारी हुआ था, जबकि विभागीय परीक्षा का विज्ञापन बाद में आया। इसके बावजूद वरीयता सूची तैयार करते समय निर्धारित नियमों और प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि विज्ञापन के क्रम और चयन प्रक्रिया की प्राथमिकता के आधार पर सीधी भर्ती वाले अधिकारियों को वरिष्ठता में पहले स्थान पर रखा जाना चाहिए था। लेकिन विभाग ने इसके विपरीत विभागीय परीक्षा से नियुक्त अधिकारियों को प्राथमिकता दे दी, जिससे उनके अधिकार प्रभावित हुए।
हाईकोर्ट का सख्त रुख
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने पहले ही सब-इंस्पेक्टर से इंस्पेक्टर पद पर होने वाली प्रोन्नति पर अंतरिम रोक लगा दी थी। गुरुवार की सुनवाई में अदालत ने इस रोक को जारी रखा और गृह विभाग को निर्देश दिया कि सीमित विभागीय परीक्षा से नियुक्त सभी संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी कर उनका पक्ष अदालत के समक्ष प्रस्तुत कराया जाए। अदालत का मानना है कि सभी प्रभावित पक्षों को सुनने के बाद ही इस महत्वपूर्ण सेवा विवाद पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा।
2 सितंबर को होगी अगली सुनवाई
अब सभी संबंधित पक्षों के जवाब दाखिल होने के बाद मामले की अगली सुनवाई 2 सितंबर को होगी। पुलिस महकमे के हजारों अधिकारियों की निगाहें इस फैसले पर टिकी हैं, क्योंकि इसका असर भविष्य की वरिष्ठता सूची और इंस्पेक्टर पद पर होने वाली प्रोन्नतियों पर पड़ सकता है।




