PCPNDT Act पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: पुलिस नहीं कर सकती सीधे FIR और जांच

सुप्रीम कोर्ट ने PCPNDT Act पर बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि पुलिस इस कानून के तहत सीधे FIR दर्ज कर मुख्य जांच नहीं कर सकती। Appropriate Authority ही शिकायत की जांच और कार्रवाई करेगी। जानिए फैसले की पूरी जानकारी।

PCPNDT Act पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: पुलिस नहीं कर सकती सीधे FIR और जांच
धारा 27 और 28 की व्याख्या से सुप्रीम कोर्ट ने स्थिति साफ की।

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        HIGHIGHTS:

  • PCPNDT Act पर Appropriate Authority करेगी शिकायतों की जांच
  • पुलिस की भूमिका जरूरत पड़ने पर सहायक रहेगी
  • पुलिस चार्जशीट पर मजिस्ट्रेट सीधे संज्ञान नहीं ले सकता
  • सामान्य आपराधिक कानून के अलग अपराधों की पुलिस जांच पर रोक नहीं
  • भ्रूण लिंग निर्धारण और लिंग चयन के खिलाफ कानून की विशेष प्रक्रिया बरकरार

नई दिल्ली (Threesocieties.com Desk):  भ्रूण के लिंग निर्धारण और लिंग चयन पर रोक लगाने वाले PCPNDT Act को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार, 20 अगस्त 2026 को बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस कानून के तहत अपराध होने पर पुलिस अपने स्तर पर FIR दर्ज कर मुख्य जांच एजेंसी के तौर पर कार्रवाई नहीं कर सकती। ऐसे मामलों में कानून के तहत गठित Appropriate Authority (उपयुक्त प्राधिकारी) को ही शिकायत की जांच और कानूनी कार्रवाई की निर्धारित प्रक्रिया अपनानी होगी।

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि PCPNDT Act में अपराधों को भले ही संज्ञेय और गैर-जमानती बनाया गया है, लेकिन सिर्फ इस आधार पर पुलिस को सामान्य आपराधिक प्रक्रिया के तहत FIR दर्ज कर जांच करने का अधिकार नहीं मिल जाता। इस कानून में अपराधों से निपटने के लिए एक विशेष वैधानिक व्यवस्था बनाई गई है, जिसका पालन किया जाना जरूरी है।

पुलिस नहीं होगी मुख्य जांच एजेंसी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि PCPNDT Act की प्रकृति सामान्य आपराधिक कानून से अलग है। इसमें मेडिकल, तकनीकी और संवेदनशील पहलू जुड़े हैं। इसलिए कानून ने विशेष रूप से Appropriate Authority को शिकायतों की जांच और आगे की कार्रवाई की जिम्मेदारी दी है। कोर्ट ने यह भी कहा कि PCPNDT Act के तहत पुलिस को जांचकर्ता के रूप में इस्तेमाल करने से बचना चाहिए। हालांकि जरूरत पड़ने पर Appropriate Authority के निर्देश पर पुलिस सहायक या पूरक भूमिका निभा सकती है। यानी इसका सीधा मतलब यह है कि भ्रूण के लिंग निर्धारण या लिंग चयन से संबंधित PCPNDT Act के अपराध की जानकारी मिलने पर पुलिस अपने स्तर से इस एक्ट के तहत सामान्य FIR और जांच की प्रक्रिया शुरू नहीं कर सकती।

FIR दर्ज करने की पुलिस शक्ति पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि जब PCPNDT Act की धारा 27 के तहत अपराधों को संज्ञेय और गैर-जमानती बनाया गया है, तो क्या पुलिस थाने में FIR दर्ज कर जांच शुरू कर सकती है? कोर्ट ने इसका जवाब नकारात्मक दिया। पीठ ने माना कि धारा 27 और धारा 28 को कानून की अन्य धाराओं के साथ पढ़ने पर यह स्पष्ट होता है कि PCPNDT Act के अपराधों के लिए पुलिस को मुख्य जांचकर्ता बनाने का उद्देश्य कानून में नहीं है।

धारा 28 में है शिकायत की खास प्रक्रिया

इस फैसले में PCPNDT Act की धारा 28 की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। कानून के मुताबिक अदालत किसी अपराध का संज्ञान सामान्य पुलिस चार्जशीट के आधार पर नहीं ले सकती। इसके लिए कानून में निर्धारित तरीके से शिकायत होनी चाहिए। ऐसी शिकायत Appropriate Authority या उसके द्वारा अधिकृत अधिकारी कर सकता है। इसके अलावा कानून में निर्धारित शर्तों के तहत वह व्यक्ति भी शिकायत कर सकता है, जिसने कथित अपराध की जानकारी Appropriate Authority को देने के बाद निर्धारित अवधि की नोटिस प्रक्रिया पूरी की हो। यही विशेष प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के फैसले का महत्वपूर्ण आधार बनी।

पुलिस की चार्जशीट पर मजिस्ट्रेट भी संज्ञान नहीं ले सकता

सुप्रीम कोर्ट ने एक और महत्वपूर्ण बात साफ की है। अगर PCPNDT Act के तहत पुलिस ने जांच कर चार्जशीट दाखिल कर भी दी, तो केवल उस पुलिस चार्जशीट के आधार पर सक्षम मजिस्ट्रेट इस कानून के तहत अपराध का संज्ञान नहीं ले सकता। कोर्ट ने कहा कि धारा 28 एक पूर्ण वैधानिक व्यवस्था प्रदान करती है और उसी में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार ही अदालत अपराध का संज्ञान ले सकती है।इसका असर उन मामलों पर भी पड़ सकता है जहां PCPNDT Act की धाराओं में पुलिस FIR दर्ज कर जांच कर चुकी है और चार्जशीट अदालत में दाखिल की गई है। हालांकि प्रत्येक मामले का असर उसके तथ्यों और संबंधित कानूनी स्थिति के आधार पर तय होगा।

क्या पुलिस की भूमिका पूरी तरह खत्म हो गई?

नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस की भूमिका को पूरी तरह खत्म नहीं किया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि Appropriate Authority की जरूरत और निर्देश के अनुसार पुलिस सहायक भूमिका निभा सकती है। साथ ही यह रोक केवल PCPNDT Act के तहत अपराधों पर लागू है। यदि उसी घटना में सामान्य आपराधिक कानून के तहत कोई अलग और स्वतंत्र अपराध बनता है, तो उस अपराध की जांच और अभियोजन करने की पुलिस की शक्ति इस फैसले से प्रभावित नहीं होगी।

भ्रूण लिंग जांच पर रोक क्यों महत्वपूर्ण है?

PCPNDT Act का उद्देश्य गर्भधारण से पहले या गर्भावस्था के दौरान तकनीकों के जरिए लिंग चयन और भ्रूण के लिंग की पहचान को रोकना है। कानून का मकसद कन्या भ्रूण हत्या और लिंग आधारित भेदभाव पर रोक लगाना तथा देश में लिंगानुपात को लेकर पैदा होने वाली गंभीर सामाजिक समस्या से निपटना है। ऐसे मामलों में मेडिकल और तकनीकी साक्ष्यों की अहम भूमिका होती है। इसी संवेदनशीलता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानून में बनाई गई विशेष व्यवस्था के तहत ही कार्रवाई की जानी चाहिए।

किस मामले में आया फैसला?

यह फैसला State of Uttar Pradesh बनाम Brij Pal Singh मामले में आया। मामला PCPNDT Act की धारा 27 और 28 के बीच संबंध तथा पुलिस की जांच शक्ति से जुड़े सवालों से संबंधित था। इलाहाबाद हाई कोर्ट के 30 सितंबर 2024 के फैसले के बाद तीन कानूनी सवाल सुप्रीम कोर्ट के सामने पहुंचे थे।

सुप्रीम कोर्ट ने तीनों प्रमुख सवालों पर स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि:

PCPNDT Act के अपराधों में केवल संज्ञेय और गैर-जमानती होने के आधार पर पुलिस FIR दर्ज नहीं कर सकती।
पुलिस इस कानून के तहत मुख्य जांच एजेंसी नहीं हो सकती।
Appropriate Authority को शिकायतों की जांच और कार्रवाई की जिम्मेदारी है।
जरूरत पड़ने पर पुलिस Appropriate Authority की सहायता कर सकती है।
पुलिस की जांच के बाद दाखिल चार्जशीट के आधार पर मजिस्ट्रेट PCPNDT Act के अपराध का संज्ञान नहीं ले सकता।
हालांकि अलग सामान्य आपराधिक अपराध होने पर पुलिस की जांच शक्ति प्रभावित नहीं होगी।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का क्या मतलब?

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से PCPNDT Act के तहत कार्रवाई की प्रक्रिया को लेकर महत्वपूर्ण कानूनी स्पष्टता सामने आई है। अब ऐसे मामलों में कानून में निर्धारित प्राधिकारी और शिकायत की प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक होगा। इस फैसले का एक अहम पहलू यह भी है कि 'संज्ञेय अपराध' होने का अर्थ हर स्थिति में यह नहीं है कि विशेष कानून में निर्धारित प्रक्रिया को दरकिनार कर पुलिस सीधे FIR और जांच शुरू कर दे। जहां किसी विशेष कानून ने अपराधों के लिए अलग जांच और शिकायत तंत्र बनाया है, वहां उस विशेष प्रक्रिया की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला PCPNDT Act के तहत पुलिस की भूमिका, Appropriate Authority की जिम्मेदारी और अदालत द्वारा संज्ञान लेने की प्रक्रिया को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल के रूप में देखा जा रहा है।