धनबाद के 4 सब रजिस्ट्रार को हाई कोर्ट से बड़ी राहत, विभागीय कार्रवाई रद्द; कहा- रिकॉर्ड ऑफ राइट्स जांचना उनका काम नहीं
Jharkhand High Court News: झारखंड हाई कोर्ट ने धनबाद के चार सब-रजिस्ट्रार के खिलाफ भूमि निबंधन अनियमितता मामले में चल रही विभागीय कार्यवाही रद्द कर दी। कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड ऑफ राइट्स की जांच करना रजिस्ट्रार का वैधानिक दायित्व नहीं है।
HighLights:
- झारखंड हाई कोर्ट ने धनबाद के चार सब-रजिस्ट्रार को बड़ी राहत दी
- भूमि निबंधन अनियमितता मामले में विभागीय कार्यवाही रद्द
- कोर्ट ने कहा- रिकॉर्ड ऑफ राइट्स की शुद्धता जांचना राजस्व अधिकारी की जिम्मेदारी
- रजिस्ट्रार का दायित्व केवल दस्तावेज के पर्याप्त विवरण की पुष्टि करना
- भ्रष्टाचार, मिलीभगत या व्यक्तिगत लाभ का कोई आरोप नहीं मिला
- 2020 की शिकायत के आधार पर शुरू हुई थी विभागीय कार्रवाई
रांची/धनबाद (Threesocieties.com Desk): झारखंड हाई कोर्ट ने भूमि निबंधन में कथित अनियमितताओं से जुड़े मामले में धनबाद के चार सब-रजिस्ट्रार को बड़ी राहत देते हुए उनके खिलाफ शुरू की गई विभागीय कार्यवाही को रद्द कर दिया है। न्यायमूर्ति दीपक रोशन की अदालत ने स्पष्ट कहा कि रिकॉर्ड ऑफ राइट्स (Record of Rights) की सत्यता की जांच करना निबंधन पदाधिकारी का वैधानिक दायित्व नहीं है।
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अदालत के इस फैसले से संतोष कुमार, सुजीत कुमार, मिहिर कुमार और श्वेता कुमारी को राहत मिली है। चारों अधिकारियों ने अलग-अलग याचिकाएं दायर कर विभागीय कार्यवाही शुरू करने की अधिसूचना और आरोप-पत्र को चुनौती दी थी।
कोर्ट ने क्या कहा?
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि छोटानागपुर काश्तकारी नियमावली, 1959 के नियम-58 के अनुसार रिकॉर्ड ऑफ राइट्स की शुद्धता बनाए रखने की जिम्मेदारी राजस्व अधिकारी की होती है, न कि सब-रजिस्ट्रार की। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पंजीकरण अधिकारी का दायित्व केवल यह सुनिश्चित करना है कि दस्तावेज में संपत्ति का विवरण पहचान के लिए पर्याप्त हो। उसे भूमि के स्वामित्व, खाता-प्लाट की सत्यता अथवा रिकॉर्ड ऑफ राइट्स की जांच करने का कोई कानूनी अधिकार या दायित्व नहीं दिया गया है।
सिर्फ खाता-प्लाट विसंगति के आधार पर कार्रवाई नहीं
कोर्ट ने कहा कि पुराने और नए सर्वे खाता एवं प्लाट नंबरों में अंतर होना मात्र विभागीय कार्रवाई का आधार नहीं बन सकता। यदि संबंधित अधिकारी के दायित्व में यह जांच शामिल ही नहीं है, तो केवल इसी आधार पर उन्हें दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
भ्रष्टाचार या व्यक्तिगत लाभ का कोई आरोप नहीं
फैसले में अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि चारों अधिकारियों पर न तो भ्रष्टाचार, न किसी प्रकार की मिलीभगत, न किसी को अनुचित लाभ पहुंचाने और न ही व्यक्तिगत लाभ लेने का कोई आरोप लगाया गया था। आरोप केवल इतना था कि उन्होंने दस्तावेजों में दर्ज खाता-प्लाट का सत्यापन नहीं किया। अदालत ने कहा कि यह कार्य उनके वैधानिक दायित्व के दायरे में आता ही नहीं है।
कैसे शुरू हुआ था पूरा मामला?
पूरा विवाद वर्ष 2020 में शुरू हुआ, जब सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में परिचय देने वाले राकेश कुमार राही ने धनबाद जिला अवर निबंधक कार्यालय और विभिन्न अंचल कार्यालयों में भूमि निबंधन एवं म्यूटेशन में अनियमितताओं की शिकायत की थी। इसके बाद 19 अगस्त 2020 को राजस्व, निबंधन एवं भूमि सुधार विभाग के सचिव ने धनबाद उपायुक्त को जांच के निर्देश दिए। उप समाहर्ता और दो कार्यपालक दंडाधिकारियों की जांच समिति गठित की गई। जांच रिपोर्ट के आधार पर संबंधित अधिकारियों को पहले कारण बताओ नोटिस जारी किया गया और बाद में वर्ष 2023 एवं 2025 में आरोप-पत्र जारी कर विभागीय कार्यवाही शुरू की गई।
क्या थे मुख्य आरोप?
जांच रिपोर्ट में आरोप लगाया गया था कि कई बिक्री विलेख (Sale Deed) में पुराने और नए सर्वे खाता एवं प्लाट नंबरों में मेल नहीं था। साथ ही यह भी कहा गया कि दस्तावेजों का संबंधित अंचल कार्यालय से सत्यापन नहीं कराया गया। हालांकि हाई कोर्ट ने माना कि इन तथ्यों के आधार पर सब-रजिस्ट्रारों पर विभागीय कार्रवाई उचित नहीं थी क्योंकि कानून के अनुसार इस प्रकार की जांच उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आती।
फैसले का व्यापक असर
कानूनी जानकारों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में भूमि निबंधन से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण मिसाल साबित हो सकता है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी अधिकारी पर तभी कार्रवाई की जा सकती है, जब उस पर लगाए गए आरोप उसके वैधानिक दायित्वों से सीधे जुड़े हों। केवल प्रशासनिक प्रक्रिया की विसंगतियों के आधार पर विभागीय कार्रवाई करना उचित नहीं माना जा सकता। इस फैसले से न केवल संबंधित चार अधिकारियों को राहत मिली है, बल्कि राज्य में भूमि निबंधन से जुड़े अधिकारियों की जिम्मेदारियों और अधिकारों की सीमा भी स्पष्ट हो गई है।




