DGP तदाशा मिश्रा की कुर्सी पर संकट? सुप्रीम कोर्ट ने नियुक्ति नियमों पर उठाए सवाल
Jharkhand DGP विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने तदाशा मिश्रा की नियुक्ति नियमावली पर सवाल उठाए। सरकार से एक सप्ताह में पुनर्विचार, DGP को नोटिस और देशभर के नियमों की समीक्षा का निर्देश।
HighLights:
- सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड की DGP नियुक्ति नियमावली 2025 पर उठाए सवाल
- प्रकाश सिंह फैसले के विपरीत प्रावधान होने की जताई आशंका
- DGP तदाशा मिश्रा को नोटिस, नियुक्ति पर अंतिम फैसला अभी नहीं
- न्यायमित्र राजू रामचंद्रन को सभी राज्यों के DGP नियुक्ति नियमों की समीक्षा का निर्देश
नई दिल्ली (Threesocieties.com Desk): झारखंड की पुलिस महानिदेशक (DGP) तदाशा मिश्रा की नियुक्ति को लेकर विवाद एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। शीर्ष अदालत ने झारखंड सरकार की ओर से बनाए गए डीजीपी नियुक्ति नियमों पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि ये प्रावधान प्रथम दृष्टया प्रकाश सिंह मामले में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के विपरीत नजर आते हैं। अदालत ने तदाशा मिश्रा को अपना पक्ष रखने का अवसर देने के साथ झारखंड सरकार से भी जवाब मांगा है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि विवादित नियमों को रद्द किया जाता है, तो तदाशा मिश्रा की नियुक्ति भी प्रभावित हो सकती है। इसलिए उनकी बात सुने बिना नियुक्ति के संबंध में अंतिम आदेश देना उचित नहीं होगा।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल तदाशा मिश्रा को पद से हटाने का कोई आदेश नहीं दिया है। मामले में नियुक्ति नियमों की वैधता पर अंतिम फैसला होना अभी बाकी है। अदालत ने झारखंड सरकार को विवादित नियमों पर पुनर्विचार करने या अगली सुनवाई में उनका कानूनी बचाव करने का अवसर दिया है।
छह महीने की सेवा शेष रहने की शर्त पर विवाद
इस पूरे विवाद की मुख्य वजह डीजीपी पद पर नियुक्ति के लिए सेवानिवृत्ति से पहले न्यूनतम छह महीने की सेवा शेष रहने की शर्त है। सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश सिंह मामले में दिए गए निर्देशों के अनुसार, डीजीपी पद के लिए विचार किए जाने वाले अधिकारियों के चयन में सेवा अवधि, रिकॉर्ड और अनुभव जैसे मानकों का पालन किया जाना चाहिए। संबंधित निर्देशों में अधिकारी के पास कम से कम छह महीने की शेष सेवा होने की शर्त भी शामिल है।
केंद्र सरकार का आरोप है कि झारखंड सरकार ने अपने नियमों में बदलाव कर इस शर्त को दरकिनार किया और इसके बाद तदाशा मिश्रा को 30 दिसंबर 2025 को राज्य का डीजीपी नियुक्त कर दिया। उस समय उनकी निर्धारित सेवानिवृत्ति में महज एक दिन बचा था।केंद्र ने अदालत में दलील दी है कि इस तरह की नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप नहीं है। सरकार की ओर से बनाए गए नियमों और उनके तहत हुई नियुक्तियों की वैधता को चुनौती दी गई है।
क्या रद्द हो सकती है तदाशा मिश्रा की नियुक्ति?
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि विवादित नियम को निरस्त किया जाता है, तो उसके आधार पर हुई तदाशा मिश्रा की नियुक्ति पर भी असर पड़ सकता है। इसी वजह से पीठ ने उन्हें जवाब दाखिल करने और अपना पक्ष रखने का अवसर देने का निर्णय लिया। अदालत ने झारखंड सरकार से तदाशा मिश्रा को नोटिस जारी करने को कहा है, ताकि वह सुनवाई में उपस्थित होकर अपना पक्ष रख सकें और अदालत की सहायता कर सकें। इससे स्पष्ट है कि फिलहाल उनकी नियुक्ति स्वतः रद्द नहीं हुई है। आगे का फैसला विवादित नियमों की वैधता, संबंधित पक्षों की दलीलों और अदालत के अंतिम आदेश पर निर्भर करेगा।
एक सप्ताह में नियमों पर पुनर्विचार करे झारखंड सरकार
सुनवाई के दौरान झारखंड सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने पीठ को बताया कि राज्य सरकार नियुक्ति नियमों पर फिर से विचार करेगी। पीठ ने कहा कि राज्य चाहे तो विवादित प्रावधान पर पुनर्विचार कर सकता है। इसके साथ ही सरकार को अपना जवाबी हलफनामा दाखिल करने और नियमों का कानूनी आधार स्पष्ट करने का विकल्प भी दिया गया है। अदालत ने मामले को एक सप्ताह बाद सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया। ऐसे में अब झारखंड सरकार के अगले कदम और विवादित नियमों पर उसके रुख पर नजर रहेगी।
न्यायमित्र को देशभर के DGP नियुक्ति नियमों की समीक्षा का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को केवल झारखंड तक सीमित नहीं रखा है। अदालत की सहायता के लिए नियुक्त वरिष्ठ अधिवक्ता और न्यायमित्र (Amicus Curiae) राजू रामचंद्रन को निर्देश दिया गया है कि वह अन्य राज्यों में डीजीपी की नियुक्ति से संबंधित कानूनों और नियमों की भी समीक्षा करें। न्यायमित्र से यह देखने को कहा गया है कि विभिन्न राज्यों में डीजीपी नियुक्ति के लिए बनाए गए प्रावधान सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुरूप हैं या नहीं। इससे संकेत मिलता है कि अदालत पुलिस प्रमुखों की नियुक्ति से संबंधित नियमों की व्यापक समीक्षा कर सकती है। यदि अन्य राज्यों में भी ऐसे प्रावधान पाए जाते हैं, जो शीर्ष अदालत के निर्देशों से टकराते हैं, तो उन पर भी विचार हो सकता है।
केंद्र सरकार ने क्यों दी नियमावली को चुनौती?
केंद्र सरकार ने झारखंड की 'सेलेक्शन एंड अपॉइंटमेंट ऑफ डायरेक्टर जनरल एंड इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस, झारखंड (हेड ऑफ पुलिस फोर्स) रेगुलेशन, 2025' की वैधता को चुनौती दी है। यह नियमावली 8 जनवरी 2025 को अधिसूचित की गई थी। केंद्र का कहना है कि डीजीपी नियुक्ति की प्रक्रिया में सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश सिंह फैसले का पालन जरूरी है। इस फैसले के तहत राज्य के पुलिस प्रमुख के चयन में संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की महत्वपूर्ण भूमिका निर्धारित की गई है। द्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में दलील दी कि केंद्र सरकार पहले भी झारखंड को नियमों में मौजूद विसंगतियों के बारे में बता चुकी है। केंद्र ने यह भी कहा कि यदि अन्य राज्यों में भी सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के विपरीत नियम बनाए गए हैं, तो उनकी भी जांच होनी चाहिए। केंद्र ने अदालत से झारखंड में संबंधित नियमों के तहत हुई डीजीपी नियुक्तियों की वैधता पर विचार करने का अनुरोध किया है।
UPSC की भूमिका भी विवाद के केंद्र में
नियुक्ति प्रक्रिया में UPSC की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। केंद्र का तर्क है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार डीजीपी पद के लिए पात्र अधिकारियों के पैनल की प्रक्रिया में UPSC की निर्धारित भूमिका का पालन होना चाहिए। केंद्र ने झारखंड की नियमावली पर आपत्ति जताते हुए कहा है कि राज्य की ओर से अपनाई गई प्रक्रिया शीर्ष अदालत के निर्देशों के अनुरूप नहीं है।
दूसरी ओर, झारखंड सरकार की ओर से कपिल सिब्बल ने नियमों का बचाव करने की बात कही और अन्य राज्यों में डीजीपी नियुक्ति से संबंधित प्रावधानों का भी उल्लेख किया। राज्य ने नियमों पर पुनर्विचार करने की सहमति जताई है। अब अदालत के सामने यह सवाल है कि झारखंड की नियमावली सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्देशों के अनुरूप है या नहीं और इसके तहत हुई नियुक्तियों पर क्या कानूनी प्रभाव पड़ेगा।
क्या है प्रकाश सिंह मामला?
प्रकाश सिंह मामला पुलिस सुधारों से जुड़ा सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक मामला है। इसमें शीर्ष अदालत ने पुलिस व्यवस्था में पारदर्शिता, पेशेवर स्वतंत्रता और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की नियुक्ति एवं कार्यकाल से संबंधित दिशा-निर्देश दिए थे। डीजीपी की नियुक्ति के लिए निर्धारित प्रक्रिया का उद्देश्य चयन को सेवा रिकॉर्ड, अनुभव और योग्यता जैसे मानकों से जोड़ना है। साथ ही, पुलिस प्रमुख के कार्यकाल में स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए न्यूनतम दो वर्ष के कार्यकाल से संबंधित निर्देश भी दिए गए हैं। झारखंड में मौजूदा विवाद इस बात को लेकर है कि राज्य की 2025 की नियमावली और उसके तहत की गई नियुक्तियां इन निर्देशों के अनुरूप हैं या नहीं।
अब आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल नियुक्ति रद्द करने का अंतिम आदेश नहीं दिया है। अदालत ने तदाशा मिश्रा को जवाब देने का अवसर दिया है और झारखंड सरकार से नियमों पर पुनर्विचार करने को कहा है। आगे की सुनवाई में मुख्य रूप से तीन सवालों पर ध्यान रहेगा:
क्या झारखंड की डीजीपी नियुक्ति नियमावली 2025 सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश सिंह फैसले के अनुरूप है?
क्या सेवानिवृत्ति से एक दिन पहले तदाशा मिश्रा की नियुक्ति निर्धारित दिशा-निर्देशों के तहत वैध थी?
क्या अन्य राज्यों में भी डीजीपी नियुक्ति से जुड़े नियमों की समीक्षा और उनमें बदलाव की जरूरत है?
फिलहाल तदाशा मिश्रा की नियुक्ति पर अंतिम निर्णय नहीं हुआ है। एक सप्ताह बाद होने वाली सुनवाई में झारखंड सरकार के रुख, डीजीपी के जवाब और न्यायमित्र की समीक्षा के आधार पर आगे की कानूनी प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी।
Threesocieties News Desk 



