POCSO केस में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: अभियोजन की बात आंख मूंदकर सच नहीं मानें कोर्ट

POCSO केस में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला। SC ने कहा कि कानूनी अनुमान के आधार पर अभियोजन की कहानी को आंख मूंदकर सच नहीं माना जा सकता। जानिए 42 पन्नों के फैसले की अहम बातें।

POCSO केस में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: अभियोजन की बात आंख मूंदकर सच नहीं मानें कोर्ट
SC बोला- अभियोजन की कहानी को परम सत्य न मानें कोर्ट।

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  • POCSO एक्ट में आरोपी के खिलाफ कानूनी अनुमान पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
  • अभियोजन पक्ष के मामले को हर स्थिति में 'परम सत्य' नहीं माना जा सकता
  • आरोपी के पक्ष में मौजूद साक्ष्यों और जिरह में सामने आई कमियों की अनदेखी नहीं हो सकती
  • सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट के दोषसिद्धि वाले फैसले रद किए

नई दिल्ली (Threesocieties.com Desk):  सुप्रीम कोर्ट ने POCSO (Protection of Children from Sexual Offences) Act से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि कानून में आरोपी के खिलाफ दोष का अनुमान लगाने वाले प्रावधानों का अर्थ यह नहीं है कि अदालत अभियोजन पक्ष की कहानी को बिना जांचे-परखे स्वीकार कर ले।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानूनी अनुमान अदालतों को मामले में सामने आए तथ्यों और साक्ष्यों का स्वतंत्र रूप से विश्लेषण करने की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करते। अभियोजन पक्ष के दावों की जांच करना और आरोपी की ओर से पेश किए गए साक्ष्यों पर विचार करना भी न्यायिक प्रक्रिया का जरूरी हिस्सा है।

'अभियोजन की बात को आंख मूंदकर स्वीकार नहीं कर सकते'

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने अपने 42 पन्नों के फैसले में कहा कि दोष का अनुमान लगाने वाले प्रावधानों के आधार पर अदालतें अभियोजन पक्ष के दावों को आंख बंद करके स्वीकार नहीं कर सकतीं। कोर्ट के मुताबिक, यदि अभियोजन की कहानी में महत्वपूर्ण कमियां या विरोधाभास सामने आते हैं तो अदालत को उनका परीक्षण करना होगा। केवल इस वजह से कि संबंधित कानून में आरोपी के खिलाफ कानूनी अनुमान का प्रावधान है, अभियोजन के हर दावे को स्वत: सही नहीं माना जा सकता।

POCSO मामले में आरोपी को मिली राहत

यह मामला वर्ष 2015 में दक्षिण दिल्ली के कालकाजी क्षेत्र की एक झुग्गी बस्ती से जुड़ा था। एक महिला ने आरोप लगाया था कि आरोपी ने उसकी नाबालिग बेटी का यौन उत्पीड़न किया। मामले में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दोषी ठहराया था। इसके बाद दिल्ली हाई कोर्ट ने भी दोषसिद्धि को बरकरार रखा। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां पीठ ने निचली अदालतों के फैसलों की समीक्षा की। सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि मामले में अभियोजन पक्ष के प्रमुख बयान में मौजूद महत्वपूर्ण कमियों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया था। आरोपी की ओर से जिरह के दौरान इन पहलुओं को सामने रखा गया था।

पानी को लेकर विवाद का भी किया गया उल्लेख

फैसले में कोर्ट ने मामले की पृष्ठभूमि का भी उल्लेख किया। कोर्ट के अनुसार, शिकायतकर्ता महिला और आरोपी के बीच पानी को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा था। सुप्रीम कोर्ट ने इस पहलू को मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के संदर्भ में देखा। पीठ ने कहा कि किसी आपराधिक मामले में अदालत को उपलब्ध पूरे साक्ष्य और परिस्थितियों का समग्र मूल्यांकन करना चाहिए। किसी एक कानूनी अनुमान के कारण दूसरे प्रासंगिक साक्ष्यों की अनदेखी नहीं की जा सकती।

आरोपी के पक्ष के सबूत भी महत्वपूर्ण

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि POCSO एक्ट में आरोपी के खिलाफ कानूनी अनुमान का प्रावधान होने के बावजूद आरोपी के पक्ष में मौजूद साक्ष्यों को अप्रासंगिक नहीं माना जा सकता। अदालत को यह देखना होगा कि अभियोजन पक्ष ने अपने मामले को उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किस तरह स्थापित किया है और आरोपी की ओर से उठाए गए बचाव तथा जिरह में सामने आए तथ्यों का क्या प्रभाव है। यानी कानूनी अनुमान को अभियोजन के हर दावे को अंतिम सत्य मानने का आधार नहीं बनाया जा सकता।

POCSO के साथ 8 अन्य कानूनों पर भी असर

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का महत्व केवल POCSO एक्ट तक सीमित नहीं माना जा रहा है। 42 पन्नों के फैसले में उन अन्य कानूनों का भी उल्लेख किया गया है, जिनमें आरोपी के खिलाफ कानूनी अनुमान या 'रिवर्स बर्डन' यानी कुछ परिस्थितियों में बचाव पक्ष पर प्रमाण प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी से जुड़े प्रावधान हैं।

इनमें प्रमुख रूप से—

नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस (NDPS) एक्ट
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम
वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम
आवश्यक वस्तु अधिनियम
खाद्य अपमिश्रण निवारण से जुड़ा कानून
सीमा शुल्क अधिनियम
विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA)
परक्राम्य लिखत अधिनियम (Negotiable Instruments Act)

का उल्लेख किया गया है।

अदालतों के लिए क्या है संदेश?

इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह रेखांकित किया है कि कानूनी अनुमान का इस्तेमाल करते समय भी अदालत को मामले के वास्तविक तथ्यों, उपलब्ध साक्ष्यों, गवाहों के बयानों और जिरह में सामने आए विरोधाभासों का परीक्षण करना होगा। POCSO जैसे कानूनों में बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देने के लिए कड़े प्रावधान हैं। लेकिन दोषसिद्धि तय करते समय अदालत को उपलब्ध पूरे रिकॉर्ड का न्यायिक मूल्यांकन करना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले में इसी संतुलन पर जोर दिया गया है कि कानूनी अनुमान अपनी जगह है, लेकिन वह अदालत की साक्ष्यों का स्वतंत्र और निष्पक्ष मूल्यांकन करने की जिम्मेदारी को खत्म नहीं करता।