तलाक के बाद भी पत्नी की आर्थिक सुरक्षा जरूरी, पटना हाई कोर्ट ने पति को 1 कट्ठा जमीन देने का दिया आदेश
पटना हाई कोर्ट ने तलाक के मामले में अहम फैसला सुनाते हुए पति को पत्नी के लिए 1 कट्ठा जमीन और ₹10 हजार मासिक भरण-पोषण देने का आदेश दिया। जानिए कोर्ट की पूरी टिप्पणी।
HighLights:
- तलाक के बाद भी पति पत्नी की आर्थिक सुरक्षा की जिम्मेदारी से पूरी तरह मुक्त नहीं होता
- कानूनी रूप से हस्तांतरण योग्य कृषि भूमि में से पत्नी को स्थायी भरण-पोषण के लिए जमीन देनी होगी
- हर महीने ₹10 हजार भरण-पोषण: पहले से मिल रहे ₹5 हजार को नई राशि में समायोजित किया जाएगा
- 3 महीने में जमीन ट्रांसफर: कोर्ट ने जमीन हस्तांतरण के लिए तीन महीने की समयसीमा तय की
पटना (Threesocieties.com Desk): तलाक के बाद पत्नी की आर्थिक सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन-यापन को लेकर पटना हाई कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विवाह विच्छेद के बाद भी पति अपनी पत्नी की आर्थिक सुरक्षा की जिम्मेदारी से पूरी तरह मुक्त नहीं हो जाता। इसी आधार पर कोर्ट ने पति को अपनी कानूनी रूप से हस्तांतरण योग्य कृषि भूमि में से एक कट्ठा जमीन पत्नी को स्थायी भरण-पोषण के तौर पर देने का आदेश दिया है। इसके अलावा पत्नी को हर महीने 10 हजार रुपये भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया है।
यह फैसला शिवहर जिले से जुड़े एक वैवाहिक विवाद में पटना हाई कोर्ट की खंडपीठ ने सुनाया। न्यायाधीश बिबेक चौधुरी और न्यायाधीश राणा विक्रम सिंह की खंडपीठ ने सोमवार को पूनम कुमारी की अपील पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। कोर्ट ने शिवहर फैमिली कोर्ट के 30 जून 2022 के फैसले को बरकरार रखा।
तलाक की डिक्री में हाई कोर्ट ने नहीं किया हस्तक्षेप
मामले में पति रमेश प्रसाद को हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(आईए) के तहत पत्नी के साथ क्रूरता के आधार पर तलाक दिया गया था। दोनों की शादी 13 मई 2002 को हुई थी। इस दंपती की कोई संतान नहीं है। पति-पत्नी के बीच लंबे समय से विवाद चल रहा था और दोनों दिसंबर 2014 से अलग रह रहे थे। पति का आरोप था कि पत्नी उस पर माता-पिता और भाई से अलग रहने का दबाव डालती थी। इसके बावजूद वैवाहिक विवाद खत्म नहीं हुआ। वहीं पत्नी ने पति और ससुरालवालों पर दहेज के लिए प्रताड़ित करने और मारपीट करने का आरोप लगाया था। पत्नी का कहना था कि वह अब भी पति के साथ रहने के लिए तैयार है।
मानसिक क्रूरता पर कोर्ट की अहम टिप्पणी
हाई कोर्ट ने मानसिक क्रूरता के सवाल पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी वैवाहिक रिश्ते में मानसिक क्रूरता का फैसला सिर्फ एक घटना या आरोप के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके लिए पूरे वैवाहिक जीवन, पति-पत्नी के व्यवहार, विवाद की परिस्थितियों और लंबे समय से चले आ रहे अलगाव को समग्र रूप से देखना जरूरी है।
कोर्ट ने मामले की परिस्थितियों को देखते हुए पाया कि वर्ष 2014 से पति-पत्नी अलग रह रहे हैं और उनके बीच वैवाहिक संबंध इस स्तर तक खराब हो चुके हैं कि सामान्य वैवाहिक जीवन दोबारा शुरू होने की उम्मीद नहीं है। ऐसे में फैमिली कोर्ट की ओर से दी गई तलाक की डिक्री में हस्तक्षेप करने का कोई पर्याप्त आधार नहीं है।
पत्नी की आर्थिक स्थिति को भी कोर्ट ने माना अहम
भरण-पोषण की राशि तय करते समय कोर्ट ने दोनों पक्षों की आर्थिक स्थिति को भी ध्यान में रखा। पति की ओर से दावा किया गया था कि पत्नी निजी शिक्षक के रूप में काम करती है और करीब 10 हजार रुपये प्रतिमाह कमाती है। हालांकि, इस दावे के समर्थन में पति कोई दस्तावेज पेश नहीं कर सका। दूसरी ओर, रिकॉर्ड में पति के पास कृषि भूमि और कारोबार होने की बात सामने आई। कोर्ट ने इन्हीं परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए पत्नी के स्थायी आर्थिक हित को सुरक्षित करने के लिए एक कट्ठा जमीन देने का आदेश दिया।
तीन महीने में जमीन का करना होगा हस्तांतरण
पटना हाई कोर्ट ने पति को निर्देश दिया कि वह अपनी कानूनी रूप से हस्तांतरण योग्य कृषि भूमि में से एक कट्ठा जमीन पत्नी के नाम तीन महीने के भीतर हस्तांतरित करे। इसके साथ ही पत्नी को हर महीने 10 हजार रुपये भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया है। हालांकि, पहले से पत्नी को मिल रहे 5 हजार रुपये प्रतिमाह का नई निर्धारित राशि में समायोजन किया जाएगा।
तलाक के बाद भी आर्थिक सुरक्षा पर जोर
इस फैसले में पटना हाई कोर्ट ने एक ओर जहां लंबे समय से बिगड़े वैवाहिक संबंधों और मानसिक क्रूरता के आधार पर तलाक को बरकरार रखा, वहीं दूसरी ओर पत्नी की आर्थिक सुरक्षा को भी महत्वपूर्ण माना। कोर्ट का आदेश बताता है कि विवाह समाप्त होने के बाद भी भरण-पोषण और सम्मानजनक जीवन-यापन से जुड़े कानूनी अधिकार परिस्थितियों के अनुसार बने रह सकते हैं। इस तरह यह फैसला तलाक, मानसिक क्रूरता और स्थायी भरण-पोषण से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण न्यायिक टिप्पणी के रूप में देखा जा सकता है।




