हाथी पर आएंगी मां दुर्गा, मुर्गे पर विदाई; 11 अक्टूबर से नवरात्र, जानें मुहूर्त
Shardiya Navratri 2026: 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्र शुरू होंगे। जानें घटस्थापना का शुभ मुहूर्त, मां दुर्गा के आगमन-विदाई के वाहन, महाअष्टमी, नवमी और विजयादशमी की तिथियां।
HighLights:
- 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्र शुरू, सुबह 6:13 से 10:12 बजे तक घटस्थापना का उत्तम मुहूर्त
- रविवार को नवरात्र शुरू होने से गज यानी हाथी पर होगा मां दुर्गा का आगमन, जिसे अच्छी वर्षा और समृद्धि का संकेत
- 18 अक्टूबर को महाअष्टमी, 19 को नवमी-पूर्णाहुति और 20 अक्टूबर को विजयादशमी
- विजयादशमी मंगलवार को होने के कारण मुर्गे यानी कुक्कुट वाहन से मां की विदाई की मान्यता
पटना (Threesocieties.com Desk): शक्ति की आराधना का महापर्व शारदीय नवरात्र इस वर्ष 11 अक्टूबर, रविवार से शुरू होगा। नौ दिनों तक चलने वाले इस पावन पर्व में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाएगी। नवरात्र के पहले दिन प्रतिपदा तिथि में कलश स्थापना और मां शैलपुत्री की पूजा के साथ देवी आराधना का शुभारंभ होगा।
वाराणसी पंचांग के अनुसार, प्रतिपदा तिथि 10 अक्टूबर की रात 8:32 बजे से शुरू होकर 11 अक्टूबर की रात 10:49 बजे तक रहेगी। उदया तिथि के कारण नवरात्र की शुरुआत 11 अक्टूबर को ही मानी जाएगी।
सुबह 6:13 से 10:12 बजे तक घटस्थापना का उत्तम मुहूर्त
नवरात्र के पहले दिन घर, मंदिर और पूजा पंडालों में कलश स्थापना की जाएगी। घटस्थापना का उत्तम मुहूर्त सुबह 6:13 बजे से 10:12 बजे तक बताया गया है। श्रद्धालु इस अवधि में विधि-विधान के साथ कलश स्थापित कर मां दुर्गा का आह्वान कर सकते हैं। वहीं, जो श्रद्धालु अभिजित मुहूर्त में घटस्थापना करना चाहते हैं, वे सुबह 11:36 बजे से दोपहर 12:24 बजे के बीच यह अनुष्ठान कर सकते हैं। मान्यता के अनुसार कलश को सुख-समृद्धि, ऊर्जा और मंगल का प्रतीक माना जाता है। नवरात्र के दौरान कलश स्थापना के बाद नौ दिनों तक अखंड ज्योत, दुर्गा सप्तशती पाठ और देवी की आराधना करने की परंपरा है।
रविवार को शुरुआत, हाथी पर होगा मां दुर्गा का आगमन
आचार्यों के अनुसार, इस बार रविवार को नवरात्र शुरू होने के कारण मां दुर्गा का आगमन गज यानी हाथी पर होगा। देवी भागवत में इसे 'शशि सूर्ये गजारूढ़ा' कहा गया है। धार्मिक मान्यताओं में हाथी को शक्ति, स्थिरता, धैर्य, ऐश्वर्य और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि जब मां दुर्गा का आगमन हाथी पर होता है तो यह अच्छी वर्षा, बेहतर कृषि उत्पादन, धन-धान्य और सुख-समृद्धि का संकेत होता है। इसी वजह से इस वर्ष देवी के गज पर आगमन को शुभ माना जा रहा है।
20 अक्टूबर को विजयादशमी, मुर्गे पर मां की विदाई
नवरात्र के समापन के साथ 20 अक्टूबर, मंगलवार को विजयादशमी मनाई जाएगी। मंगलवार को विजयादशमी पड़ने के कारण धार्मिक मान्यता के अनुसार मां दुर्गा का प्रस्थान वाहन 'चरणायुध' यानी मुर्गा माना गया है। शास्त्रों में इसे कुक्कुट वाहन भी कहा जाता है। लोक मान्यताओं में मुर्गे को सतर्कता और परिस्थितियों में बदलाव का संकेत माना जाता है। इसलिए देवी की विदाई के बाद शांति, संयम और सकारात्मक ऊर्जा के लिए पूजा-पाठ करने की परंपरा बताई जाती है।
कब होगी महाअष्टमी और नवमी?
इस वर्ष नवरात्र की महत्वपूर्ण तिथियां इस प्रकार रहेंगी—
11 अक्टूबर, रविवार: नवरात्र प्रारंभ, घटस्थापना और मां शैलपुत्री की पूजा।
12 अक्टूबर, सोमवार: मां ब्रह्मचारिणी की पूजा।
13 अक्टूबर, मंगलवार: मां चंद्रघंटा की पूजा।
14 अक्टूबर, बुधवार: मां कूष्मांडा की पूजा।
15 अक्टूबर, गुरुवार: मां स्कंदमाता की पूजा।
16 अक्टूबर, शुक्रवार: मां कात्यायनी की पूजा।
17 अक्टूबर, शनिवार: मां कालरात्रि की पूजा।
18 अक्टूबर, रविवार: महाअष्टमी और मां महागौरी की पूजा।
19 अक्टूबर, सोमवार: महानवमी एवं पूर्णाहुति।
20 अक्टूबर, मंगलवार: विजयादशमी और मां दुर्गा की विदाई।
नौ दिनों में होगी नवदुर्गा की आराधना
शारदीय नवरात्र में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा का विशेष विधान है। प्रत्येक दिन देवी के अलग स्वरूप की आराधना की जाती है।
प्रथम दिन मां शैलपुत्री
नवरात्र के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा होती है। पर्वतराज हिमालय की पुत्री शैलपुत्री वृषभ पर विराजमान होती हैं। उन्हें स्थिरता, शक्ति और मन की दृढ़ता प्रदान करने वाली देवी माना जाता है।
दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी
दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। देवी का यह स्वरूप तपस्या, ज्ञान, वैराग्य और संयम का प्रतीक माना जाता है।
तीसरे दिन मां चंद्रघंटा
तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की आराधना होती है। उनके मस्तक पर सुशोभित अर्धचंद्र के कारण उन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। मान्यता है कि उनकी पूजा से भय और नकारात्मकता दूर होती है।
चौथे दिन मां कूष्मांडा
चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा होगी। धार्मिक मान्यताओं में उन्हें अपनी मंद मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना करने वाली देवी कहा गया है। उनकी आराधना से आयु, यश और आरोग्य की प्राप्ति की मान्यता है।
पांचवें दिन मां स्कंदमाता
पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा होती है। भगवान कार्तिकेय की माता होने के कारण उन्हें स्कंदमाता कहा जाता है। देवी को वात्सल्य और संतान सुख की प्रदायिनी माना जाता है।
छठे दिन मां कात्यायनी
छठे दिन मां कात्यायनी की आराधना की जाती है। महर्षि कात्यायन की पुत्री के रूप में अवतरित देवी कात्यायनी को शक्ति, दांपत्य सुख और शत्रुओं पर विजय प्रदान करने वाली माना जाता है।
सातवें दिन मां कालरात्रि
सप्तमी के दिन मां कालरात्रि की पूजा होती है। माता कालरात्रि को शुभंकरी, महायोगीश्वरी और महायोगिनी भी कहा जाता है। माता कालरात्रि की विधिवत रूप से पूजा अर्चना औ उपवास करने से मां अपने भक्तों को सभी बुरी शक्तियां और काल से बचाती हैं अर्थात माता की पूजा करने के बाद भक्तों को अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता है। माता कालरात्रि को निशा की रात भी कहा जाता है। उन्हें अंधकार और भय का नाश करने वाली देवी माना जाता है।
आठवें दिन मां महागौरी
महाअष्टमी के दिन मां महागौरी की पूजा की जाएगी। गौर वर्ण और श्वेत वस्त्र धारण करने वाली देवी महागौरी को शुद्धता, शांति और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
नौवें दिन मां सिद्धिदात्री
महानवमी के दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा होगी। मान्यता है कि देवी अपने भक्तों को विभिन्न प्रकार की सिद्धियां प्रदान करती हैं। उनकी आराधना से ज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति की धार्मिक मान्यता है।
अष्टमी-नवमी पर कन्या पूजन का विशेष महत्व
नवरात्र में अष्टमी और नवमी के दिन कन्या पूजन की विशेष परंपरा है। पंडितों के अनुसार, शास्त्रीय मान्यताओं में 2 से 10 वर्ष तक की कन्याओं को देवी के विभिन्न स्वरूपों का प्रतीक माना गया है। कन्या पूजन में नौ कन्याओं को नवदुर्गा का प्रतीक मानकर उनका पूजन किया जाता है। इसके साथ एक बालक को भैरव स्वरूप में भोजन कराने की भी परंपरा है। कन्याओं के चरण धोने, तिलक लगाने, चुनरी ओढ़ाने और उन्हें हलवा-पूरी, चने आदि का प्रसाद खिलाने के बाद दक्षिणा देने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता है कि कन्या पूजन से मां भगवती प्रसन्न होती हैं और परिवार में सुख-शांति तथा समृद्धि आती है।
नवरात्र में रखें इन बातों का ध्यान
नवरात्र के दौरान श्रद्धालु अपनी परंपरा और सामर्थ्य के अनुसार देवी की पूजा कर सकते हैं। घर में कलश स्थापना करने वाले श्रद्धालु पूजा स्थल की साफ-सफाई, नियमित दीप प्रज्वलन और सात्विक वातावरण का विशेष ध्यान रखते हैं। अष्टमी या नवमी पर कन्या पूजन करने वाले परिवारों में कन्याओं को सम्मानपूर्वक आमंत्रित कर भोजन कराने और दक्षिणा देने की परंपरा है। धार्मिक अनुष्ठान करते समय अपने परिवार की परंपरा और स्थानीय पंचांग के अनुसार तिथि एवं मुहूर्त का पालन करना उचित माना जाता है।
अस्वीकरण
इस लेख में बताए गए शुभ मुहूर्त, उपाय, लाभ, देवी के आगमन-प्रस्थान के वाहन और अन्य धार्मिक मान्यताएं सामान्य सूचना के लिए हैं। Threesocieties.com इन मान्यताओं की पुष्टि या समर्थन नहीं करता है। यह जानकारी विभिन्न धार्मिक परंपराओं, ज्योतिषीय मान्यताओं, पंचांगों और प्रचलित धारणाओं पर आधारित है। पाठक इसे अंतिम सत्य या वैज्ञानिक दावा न मानें और अपने विवेक का उपयोग करें।
Anjala Kumar 



