सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: फांसी से ही होगी सजा-ए-मौत, ‘कम दर्दनाक’ विकल्प वाली याचिका खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने फांसी के बजाय जहरीले इंजेक्शन और अन्य कम दर्दनाक तरीकों से मृत्युदंड देने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि फिलहाल फांसी की व्यवस्था जारी रहेगी, हालांकि नए वैज्ञानिक और मेडिकल सबूत मिलने पर भविष्य में समीक्षा संभव है।
HighLights:
- सुप्रीम कोर्ट ने फांसी के जरिए मृत्युदंड देने की मौजूदा व्यवस्था को बरकरार रखा
- जहरीले इंजेक्शन, गोली या अन्य कम दर्दनाक तरीकों की मांग वाली याचिका खारिज
- कोर्ट ने कहा- नए वैज्ञानिक और मेडिकल सबूत मिलने पर भविष्य में समीक्षा संभव
- केंद्र चाहे तो फांसी के विकल्पों पर विशेषज्ञ समिति गठित कर सकता है
नई दिल्ली (Threesocieties.com Desk): सजा-ए-मौत देने के तरीके को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने फांसी के बजाय जहरीले इंजेक्शन, गोली मारने, इलेक्ट्रोक्यूशन या अन्य कथित कम दर्दनाक तरीकों से मृत्युदंड देने की मांग वाली जनहित याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने साफ किया कि फिलहाल भारत में मृत्युदंड को अमल में लाने के लिए फांसी का तरीका ही संवैधानिक रूप से वैध व्यवस्था रहेगा।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने याचिका पर सुनवाई करते हुए यह भी स्पष्ट किया कि याचिका खारिज होने का मतलब यह नहीं है कि भविष्य में इस मुद्दे पर संवैधानिक समीक्षा का रास्ता हमेशा के लिए बंद हो गया है। यदि आगे ठोस वैज्ञानिक, मेडिकल या अनुभव-आधारित प्रमाण सामने आते हैं, तो अदालत इस विषय पर दोबारा विचार कर सकती है।
फांसी की जगह लीथल इंजेक्शन की थी मांग
सीनियर वकील ऋषि मल्होत्रा की ओर से दायर जनहित याचिका में मृत्युदंड देने के मौजूदा तरीके को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ता का तर्क था कि फांसी का तरीका क्रूर, दर्दनाक और अमानवीय हो सकता है। याचिका में फांसी के विकल्प के तौर पर लीथल इंजेक्शन, गोली मारना, इलेक्ट्रोक्यूशन और गैस चैंबर जैसे तरीकों पर विचार करने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि मृत्युदंड भी ऐसी प्रक्रिया से दिया जाना चाहिए, जिसमें दोषी को कम से कम शारीरिक पीड़ा हो और उसकी गरिमा बनी रहे। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 22 जनवरी 2026 को सुनवाई पूरी करने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रखा था।
अनुच्छेद 21 और सम्मानजनक मृत्यु का तर्क
याचिका में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 354(5), जिसे अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 393(5) के तहत देखा जाता है, की संवैधानिकता को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि संविधान का अनुच्छेद 21 व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। इसी आधार पर दलील दी गई कि यदि राज्य किसी व्यक्ति को मृत्युदंड देता है, तो उसे ऐसी प्रक्रिया अपनानी चाहिए जिससे अनावश्यक पीड़ा न हो और व्यक्ति की गरिमा भी बनी रहे। याचिका में यह भी दावा किया गया था कि फांसी के बाद मौत की पुष्टि में काफी समय लग सकता है, जबकि कुछ वैकल्पिक तरीकों में मौत अपेक्षाकृत कम समय में हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने पुराने फैसलों को बड़ी बेंच में भेजने से भी किया इनकार
याचिकाकर्ता ने इस विषय से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के पहले के तीन फैसलों को बड़ी बेंच के पास भेजने की मांग भी की थी। अदालत ने इस मांग को भी स्वीकार नहीं किया। पीठ ने कहा कि मौजूदा फैसलों की समीक्षा के लिए ऐसा कोई ठोस आधार नहीं है, जिसके कारण मामले को बड़ी बेंच के पास भेजना जरूरी हो। इस तरह अदालत ने फिलहाल देश में मृत्युदंड को अमल में लाने के लिए फांसी की व्यवस्था को बरकरार रखा है।
भविष्य में बदल सकता है फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि इस मुद्दे पर भविष्य के लिए दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं किया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि वैज्ञानिक और मेडिकल क्षेत्र में नई जानकारी सामने आती है और उससे यह साबित होता है कि फांसी के मुकाबले कोई दूसरा तरीका ज्यादा मानवीय और कम पीड़ादायक है, तो भविष्य में इस मुद्दे की संवैधानिक समीक्षा की जा सकती है। यानी अदालत का मौजूदा फैसला भविष्य में वैज्ञानिक प्रगति या नए ठोस प्रमाणों के आधार पर वैकल्पिक तरीकों पर विचार करने से रोक नहीं लगाता।
केंद्र सरकार बना सकती है विशेषज्ञ समिति
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि केंद्र सरकार चाहे तो मृत्युदंड देने के वैकल्पिक तरीकों की व्यापक समीक्षा के लिए विशेषज्ञ समिति गठित कर सकती है। इस समिति में कानून, फॉरेंसिक मेडिसिन, न्यूरोसाइंस और अन्य संबंधित क्षेत्रों के विशेषज्ञों को शामिल किया जा सकता है। समिति फांसी के साथ-साथ संभावित वैकल्पिक तरीकों के वैज्ञानिक, चिकित्सकीय और व्यावहारिक पहलुओं का अध्ययन कर सकती है।
सुनवाई के दौरान केंद्र की भूमिका पर हुई थी चर्चा
इस मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने अदालत को बताया था कि सरकार इस विषय पर विचार कर रही है और इसके लिए समिति गठित किए जाने की बात भी सामने आई थी। अक्टूबर 2025 में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र के रुख पर सवाल उठाते हुए कहा था कि सरकार इस पुरानी प्रक्रिया को बदलने के लिए तैयार नहीं दिख रही है। अदालत में यह सुझाव भी सामने आया था कि मृत्युदंड पाए दोषियों को फांसी और लीथल इंजेक्शन जैसे विकल्पों में से चुनाव का अवसर दिया जा सकता है। हालांकि, केंद्र ने इसे व्यावहारिक रूप से संभव नहीं बताया था।
फिलहाल फांसी की व्यवस्था जारी रहेगी
सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के बाद भारत में मृत्युदंड को अमल में लाने का मौजूदा कानूनी तरीका नहीं बदला है। यानी जब तक कानून में बदलाव या अदालत की ओर से भविष्य में कोई अलग व्यवस्था नहीं होती, सजा-ए-मौत पाए दोषियों को फांसी के जरिए ही मृत्युदंड दिया जाएगा।
हालांकि, अदालत ने वैज्ञानिक और मेडिकल शोध के लिए रास्ता खुला रखा है। भविष्य में यदि कोई ऐसा ठोस प्रमाण सामने आता है, जिससे फांसी की तुलना में कोई दूसरा तरीका अधिक मानवीय और कम पीड़ादायक साबित होता है, तो इस मुद्दे पर फिर से न्यायिक समीक्षा संभव होगी।




