9 साल जेल के बाद रेप केस में आरोपी बरी, SC बोला- ‘सच खोजना कोर्ट की जिम्मेदारी’

सुप्रीम कोर्ट ने पांच वर्षीय बच्ची से दुष्कर्म मामले में दोषी को नौ साल बाद बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा- आपराधिक मुकदमे में सच का पता लगाना और निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित करना अदालत की जिम्मेदारी है।

9 साल जेल के बाद रेप केस में आरोपी बरी, SC बोला- ‘सच खोजना कोर्ट की जिम्मेदारी’
सुप्रीम कोर्ट ने कहा- अदालत की जिम्मेदारी सच का पता लगाना और निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित करना।

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HighLights:

  • सुप्रीम कोर्ट ने रेप केस में दोषी ठहराए गए व्यक्ति को बरी किया
  • आरोपी नौ साल से अधिक समय तक हिरासत में रहा
  • ट्रायल कोर्ट और राजस्थान हाई कोर्ट के फैसले में गंभीर त्रुटियां बताईं
  • अदालत महत्वपूर्ण साक्ष्य की अनदेखी होने पर मूकदर्शक नहीं रह सकती

नई दिल्ली (Threesocieties.com Desk): सुप्रीम कोर्ट ने पांच वर्षीय बच्ची से दुष्कर्म के मामले में दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति को नौ साल से अधिक समय तक हिरासत में रहने के बाद बरी कर दिया। शीर्ष अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान आपराधिक न्याय व्यवस्था में अदालत की भूमिका को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि आपराधिक मुकदमा केवल अभियोजन पक्ष और आरोपित के बीच टकराव नहीं है, बल्कि अदालत की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सच का पता लगाना और निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित करना है।

जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने मामले में ट्रायल कोर्ट के फैसले और राजस्थान हाई कोर्ट द्वारा दोषसिद्धि बरकरार रखने को गंभीर त्रुटिपूर्ण माना। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने का फैसला कानूनी रूप से स्वीकार्य और भरोसेमंद साक्ष्यों पर आधारित होना चाहिए।

‘अदालत मूकदर्शक नहीं रह सकती’

शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायालय की भूमिका केवल अभियोजन और बचाव पक्ष की ओर से पेश किए गए साक्ष्यों को दर्ज करने तक सीमित नहीं है। यदि किसी ऐसे महत्वपूर्ण साक्ष्य पर ध्यान नहीं दिया गया है, जिसका आरोपित के दोषी या निर्दोष होने से सीधा संबंध है, तो अदालत को उसकी जांच सुनिश्चित करनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आपराधिक मुकदमे में अदालत को यह सुनिश्चित करना होता है कि न्यायोचित निर्णय के लिए आवश्यक साक्ष्य उचित तरीके से रिकॉर्ड पर आएं। अदालत केवल पक्षकारों द्वारा पेश सामग्री की निष्क्रिय दर्शक नहीं हो सकती।

पहचान को लेकर सामने आई गंभीर कमी

सुप्रीम कोर्ट ने अभियोजन के मामले में आरोपित की पहचान को लेकर गंभीर कमियों की ओर भी ध्यान दिलाया। पीठ ने मेडिकल साक्ष्यों और अभियोजन पक्ष की कहानी के बीच मौजूद विरोधाभासों को महत्वपूर्ण माना। कोर्ट ने विशेष रूप से चोटों की उम्र से जुड़े मेडिकल साक्ष्य तथा एफआईआर और अभियोजन गवाहों के बयानों में घटना के कथित समय को लेकर भारी अंतर का उल्लेख किया। शीर्ष अदालत के अनुसार, इन परिस्थितियों को नजरअंदाज करते हुए दोषसिद्धि कायम रखना उचित नहीं था।

नौ साल से ज्यादा समय से हिरासत में था आरोपी

मामले में आरोपित व्यक्ति नौ वर्षों से अधिक समय से हिरासत में था। राजस्थान हाई कोर्ट ने पहले ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई सजा को बरकरार रखा था। उसे जीवित रहने तक उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने मामले के उपलब्ध साक्ष्यों का दोबारा मूल्यांकन करते हुए पाया कि निचली अदालत और हाई कोर्ट के निष्कर्ष तथ्यों तथा कानून दोनों के लिहाज से टिकाऊ नहीं थे।

2016 में दर्ज हुई थी एफआईआर

मामले की शुरुआत दिसंबर 2016 में हुई थी। बच्ची के पिता ने 7 दिसंबर 2016 को अजमेर के केकड़ी पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज कराई थी। शिकायत के मुताबिक, उनकी पत्नी अपने दोनों बच्चों के साथ एक रिश्तेदार के घर गई थीं। इनमें 11 वर्षीय बेटा और पांच वर्षीय बेटी शामिल थी। इसी दौरान पत्नी ने अपने पति को फोन कर पूछा कि क्या बेटी उनके साथ है। पिता के इनकार करने पर परिवार को बच्ची के लापता होने की जानकारी हुई। इसके बाद पिता गांव लौटे और बच्ची की तलाश शुरू की। कुछ समय बाद दो लोग बच्ची को लेकर उसके घर पहुंचे। बच्ची घायल अवस्था में थी। परिवार के अनुसार, बच्ची ने अपने साथ यौन उत्पीड़न होने की बात बताई थी।

फरवरी 2017 में हुई थी गिरफ्तारी

मामले में आरोपित व्यक्ति को 5 फरवरी 2017 को गिरफ्तार किया गया था। बाद में ट्रायल कोर्ट ने उसे दोषी ठहराया और राजस्थान हाई कोर्ट ने भी उसकी दोषसिद्धि को बरकरार रखा। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने अभियोजन की कहानी और उपलब्ध साक्ष्यों में मौजूद खामियों को उठाया। आरोपित की ओर से यह भी दलील दी गई कि स्थानीय विधायक से उसकी दुश्मनी थी और विधायक के कहने पर उसे झूठे मामले में फंसाया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का व्यापक महत्व है। पीठ ने स्पष्ट किया कि आपराधिक न्याय प्रक्रिया का अंतिम उद्देश्य किसी पक्ष को जीत दिलाना नहीं, बल्कि सच्चाई तक पहुंचकर न्याय करना है। अदालत ने कहा कि दोषसिद्धि तभी कायम रह सकती है जब वह विश्वसनीय और कानूनी रूप से स्वीकार्य साक्ष्यों पर आधारित हो। यदि महत्वपूर्ण साक्ष्यों की अनदेखी हुई हो या रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री में गंभीर विरोधाभास हों, तो अदालत को मामले की निष्पक्षता से जांच करनी होगी।इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर यह रेखांकित किया कि न्यायालय की जिम्मेदारी केवल मुकदमे में दोनों पक्षों की दलीलें सुनना नहीं, बल्कि उपलब्ध साक्ष्यों का निष्पक्ष मूल्यांकन कर सत्य तक पहुंचना भी है।