Nepal Flood: 1356 मौतें, 5500 लापता; सुरंगों में फंसी जिंदगियों के लिए अब भी उम्मीद

नेपाल में बाढ़ और भूस्खलन की त्रासदी के 12 दिन बाद भी 5,500 लोग लापता हैं। 1,356 मौतों की पुष्टि हो चुकी है, जबकि हाइड्रोपावर सुरंगों में फंसे 121 लोगों के लिए रेस्क्यू ऑपरेशन जारी है।

Nepal Flood: 1356 मौतें, 5500 लापता; सुरंगों में फंसी जिंदगियों के लिए अब भी उम्मीद
नेपाल में तबाही के 12 दिन बाद भी हजारों का पता नहीं।

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     HighLights:

  • नेपाल में बाढ़-भूस्खलन की तबाही के 12 दिन बाद भी करीब 5,500 लोग लापता
  • आपदा में अब तक 1,356 लोगों की मौत की पुष्टि, हजारों परिवारों पर टूटा दुखों का पहाड़
  • हाइड्रोपावर परियोजनाओं की सुरंगों में 121 लोगों के फंसे होने की आशंका
  • सुरंगों में फंसे लोगों को निकालने के लिए भारतीय और विदेशी विशेषज्ञ भी जुटे

नई दिल्ली (Threesocieties.com Desk): नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन ने भारी तबाही मचाई है। प्राकृतिक आपदा के 12 दिन बीत जाने के बाद भी करीब 5,500 लोग लापता हैं। वहीं, अब तक 1,356 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है। राहत और बचाव एजेंसियां लगातार प्रभावित इलाकों में अभियान चला रही हैं, लेकिन समय बीतने के साथ लापता लोगों के सुरक्षित मिलने की चुनौती बढ़ती जा रही है।

सबसे बड़ी चिंता उन लोगों को लेकर है, जिनके हाइड्रोपावर परियोजनाओं की भूमिगत सुरंगों में फंसे होने की आशंका है। बचाव दल मलबे और पानी से भरी सुरंगों के भीतर जिंदगी की तलाश में जुटे हैं। इन सुरंगों में फंसे लोगों के लिए हर गुजरता घंटा बेहद अहम माना जा रहा है।

सुरंगों में 121 लोगों के फंसे होने की आशंका

रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, नेपाल के नौ जिलों में आई अचानक बाढ़ के कारण हाइड्रोपावर परियोजनाओं की सुरंगों में करीब 121 लोगों के फंसे होने की आशंका है। रसुवा जिले की चिलिमे हाइड्रोपावर परियोजना में छह कर्मचारी लापता बताए जा रहे हैं। स्थानीय सांसद श्रीराम नेउपाने के अनुसार, इनमें से चार कर्मचारियों के अभी भी जीवित होने की उम्मीद है। बचाव अभियान में सबसे बड़ी उम्मीद इन सुरंगों की संरचना को लेकर है। कई भूमिगत सुरंगों में वेंटिलेशन सिस्टम, कर्मचारियों के आराम करने के लिए कमरे और कुछ स्थानों पर रसोई जैसी सुविधाएं भी मौजूद होती हैं। ऐसे में बचाव दल मानकर चल रहा है कि कुछ लोग सुरक्षित स्थानों पर टिके हो सकते हैं।

भारतीय सुरंग विशेषज्ञ भी रेस्क्यू ऑपरेशन में शामिल

सुरंगों में फंसे लोगों को निकालने के अभियान में भारतीय विशेषज्ञों की टीम भी मदद कर रही है। ऑस्ट्रेलियाई सुरंग विशेषज्ञ अर्नोल्ड डिक्स भी बचाव अभियान में शामिल हैं। डिक्स को भारत के उत्तराखंड में सिलक्यारा सुरंग हादसे के दौरान 41 मजदूरों को सुरक्षित बाहर निकालने के अभियान में निभाई गई भूमिका के लिए जाना जाता है। नेपाल में मौजूदा अभियान में उनके अनुभव से बचाव टीम को काफी मदद मिलने की उम्मीद है। मलबे, पानी और अस्थिर जमीन के बीच सुरंगों तक पहुंचना बचाव दल के लिए बेहद जोखिम भरा है। इसके बावजूद विशेषज्ञ अत्याधुनिक उपकरणों और तकनीक की मदद से अंदर फंसे लोगों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं।

पृथ्वी हाईवे को अस्थायी ट्रैक से बहाल करने की कोशिश

बाढ़ और भूस्खलन ने नेपाल के सड़क नेटवर्क को भी भारी नुकसान पहुंचाया है। धादिंग जिले में क्षतिग्रस्त पृथ्वी हाईवे के एक हिस्से को बहाल करने के लिए करीब 252 मीटर लंबा अस्थायी ट्रैक तैयार किया गया है। पृथ्वी हाईवे काठमांडू को पश्चिमी नेपाल के कई हिस्सों से जोड़ने वाला महत्वपूर्ण मार्ग है। इसके क्षतिग्रस्त होने से राहत सामग्री पहुंचाने और प्रभावित इलाकों से लोगों को निकालने में भी मुश्किलें पैदा हुईं। अस्थायी मार्ग के तैयार होने से राहत एवं बचाव कार्यों को गति मिलने की उम्मीद है।

13वें दिन नेपाल ने याद किए आपदा में मारे गए लोग

आपदा में जान गंवाने वाले लोगों की स्मृति में नेपाल में सोमवार को 13वें दिन का शोक मनाया गया। हिंदू परंपरा में मृत्यु के 13वें दिन को शोक अवधि के अंतिम दिन के तौर पर देखा जाता है। इस अवसर पर नेपाल के विभिन्न हिस्सों के साथ विदेशों में स्थित नेपाली दूतावासों में भी शोक मनाया गया। राष्ट्रीय ध्वज आधा झुका रहा और मृतकों को श्रद्धांजलि दी गई। आपदा ने हजारों परिवारों को प्रभावित किया है। कई परिवार अभी भी अपने परिजनों के बारे में जानकारी मिलने का इंतजार कर रहे हैं।

नेपाल ने दुनिया से मांगी तत्काल मदद

बढ़ते मानवीय संकट के बीच नेपाल के विदेश मंत्रालय ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से तत्काल राहत और बचाव सामग्री उपलब्ध कराने की अपील की है। नेपाल को विशेष रूप से बड़े ड्रोन, बेली ब्रिज, डीएनए जांच किट, सुरंग बचाव सूट और महामारी से बचाव के लिए आवश्यक उपकरणों की जरूरत बताई गई है। भूस्खलन और बाढ़ से प्रभावित इलाकों में बड़ी संख्या में लोग अपने घरों से विस्थापित हुए हैं। करीब 3,500 प्रभावित लोगों को रसुवा, नुवाकोट और धादिंग के अलग-अलग आश्रय केंद्रों में रखा गया है। इन शिविरों में भोजन, साफ पानी, स्वास्थ्य सुविधाओं और अन्य जरूरी सामान की व्यवस्था बड़ी चुनौती बनी हुई है।

तिब्बत में भी सैकड़ों लोग लापता

नेपाल से लगे तिब्बत के इलाकों में भी प्राकृतिक आपदा का व्यापक असर हुआ है। वहां भी सैकड़ों लोगों के लापता होने की खबर है। प्रभावित लोगों में भारतीय तीर्थयात्रियों के शामिल होने की जानकारी ने चिंता और बढ़ा दी है। सीमा से जुड़े पर्वतीय क्षेत्रों में खराब मौसम, भूस्खलन और क्षतिग्रस्त सड़कों के कारण राहत एवं बचाव कार्य मुश्किल बना हुआ है।

राष्ट्रपति पौडेल ने उठाया ‘जलवायु न्याय’ का मुद्दा

नेपाल के राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने आपदा प्रभावित रसुवा और नुवाकोट का दौरा किया। उन्होंने कहा कि नेपाल जैसे पर्वतीय और जलवायु-संवेदनशील देश को जलवायु परिवर्तन की भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। राष्ट्रपति ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से नेपाल जैसे देशों के लिए ‘जलवायु न्याय’ सुनिश्चित करने की अपील की। उन्होंने जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार देशों से प्रभावित देशों को मुआवजा उपलब्ध कराने की व्यवस्था की मांग की। उन्होंने कहा कि नेपाल की भौगोलिक और आर्थिक सीमाओं के कारण इस तरह की बड़ी आपदाओं से निपटना आसान नहीं है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय सहयोग और तकनीकी सहायता बेहद जरूरी है।

हर गुजरते घंटे के साथ बढ़ रही चुनौती

नेपाल में राहत और बचाव अभियान अब बेहद महत्वपूर्ण दौर में पहुंच गया है। एक तरफ हजारों लापता लोगों की तलाश जारी है, तो दूसरी ओर सुरंगों में फंसे लोगों को सुरक्षित बाहर निकालना सबसे बड़ी प्राथमिकता बनी हुई है। बचाव दलों के लिए चुनौती सिर्फ मलबे और पानी को हटाने की नहीं है, बल्कि अस्थिर पहाड़ी इलाकों में काम करते हुए खुद की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी है। इसके बावजूद सुरंगों में फंसे लोगों को लेकर बचाव एजेंसियां उम्मीद नहीं छोड़ रही हैं। वेंटिलेशन सिस्टम और भूमिगत सुरक्षित स्थानों की मौजूदगी के कारण ‘ऑपरेशन उम्मीद’ जारी है। नेपाल की इस त्रासदी ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि तेजी से बदलते मौसम और जलवायु परिवर्तन के दौर में हिमालयी देशों को प्राकृतिक आपदाओं से बचाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कितनी तैयारी की जरूरत है।