1 दिन की सर्विस बाकी थी, फिर भी बनीं DGP! तदाशा मिश्रा की नियुक्ति पर SC में सवाल
झारखंड DGP तदाशा मिश्रा की रिटायरमेंट से एक दिन पहले हुई नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट में सवाल उठे हैं। एमिकस क्यूरी ने इसे प्रकाश सिंह फैसले के निर्देशों का उल्लंघन बताया। मामले की अगली सुनवाई 7 सितंबर को होगी।
HighLights:
- रिटायरमेंट से सिर्फ एक दिन पहले तदाशा मिश्रा को मिली थी DGP की जिम्मेदारी
- एमिकस क्यूरी ने नियुक्ति को सुप्रीम कोर्ट के पुराने निर्देशों के विपरीत बताया
- प्रकाश सिंह फैसले के अनुसार DGP पद के लिए 6 महीने की सेवा शेष रहने का मुद्दा
- राज्य सरकार के DGP नियुक्ति नियम भी निशाने पर, मामले की अगली सुनवाई 7 सितंबर को
नई दिल्ली/रांची (Threesocieties.com Desk): झारखंड की पुलिस व्यवस्था से जुड़े बेहद महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट में राज्य सरकार की ओर से की गई DGP नियुक्ति को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं। वर्तमान झारखंड DGP तदाशा मिश्रा की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एमिकस क्यूरी की रिपोर्ट ने राज्य सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
वरिष्ठ अधिवक्ता एवं न्यायमित्र (Amicus Curiae) राजू रामचंद्रन ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि तदाशा मिश्रा की नियुक्ति उनके रिटायरमेंट से महज एक दिन पहले करना सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश सिंह से जुड़े पुराने फैसलों और आदेशों में निर्धारित सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है। मामले की अगली सुनवाई 7 सितंबर को होनी है। ऐसे में अब सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं।
रिटायरमेंट से 24 घंटे पहले DGP की कुर्सी
1994 बैच की झारखंड कैडर की IPS अधिकारी तदाशा मिश्रा को 30 दिसंबर 2025 को झारखंड का पुलिस महानिदेशक नियुक्त किया गया था। खास बात यह है कि उनकी सेवानिवृत्ति की तारीख इसके ठीक अगले दिन यानी 31 दिसंबर 2025 थी। यानी जिस समय उन्हें राज्य का DGP बनाया गया, उस समय उनकी सेवा में लगभग 24 घंटे ही बाकी थे। नियुक्ति के बाद उन्हें दो साल का कार्यकाल मिलने का रास्ता बना, जिसको लेकर अब कानूनी सवाल उठ रहे हैं। एमिकस क्यूरी ने अपनी रिपोर्ट में इसी बिंदु को प्रमुखता से उठाते हुए कहा है कि DGP पद पर नियुक्ति के लिए अधिकारी की शेष सेवा अवधि से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन किया जाना जरूरी है।
प्रकाश सिंह केस का छह महीने वाला नियम क्या है?
DGP की नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक प्रकाश सिंह फैसले में पुलिस प्रमुख के पद पर स्थिरता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए कई महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश दिए गए हैं। इसी संदर्भ में यह मुद्दा सामने आया है कि DGP पद के लिए विचार किए जाने वाले अधिकारी की नियुक्ति के समय कम से कम छह महीने की सेवा शेष होनी चाहिए। एमिकस क्यूरी के मुताबिक, यदि किसी अधिकारी की सेवानिवृत्ति में महज एक दिन बचा है और उसे DGP नियुक्त किया जाता है, तो यह उस व्यवस्था के उद्देश्य पर सवाल खड़ा करता है जिसका मकसद DGP के पद पर स्थिर और सक्षम नेतृत्व सुनिश्चित करना है।
एमिकस क्यूरी ने क्या कहा?
वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने नोट में तदाशा मिश्रा की नियुक्ति को प्रकाश सिंह से जुड़े फैसलों और आदेशों में तय सिद्धांतों के विपरीत बताया है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि राज्य सरकार के नए नियमों के कई प्रावधान सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की भावना का उल्लंघन नहीं करते, लेकिन कुछ प्रावधानों में स्पष्टता और पर्याप्त सुरक्षा उपायों की जरूरत है, ताकि DGP की नियुक्ति में मनमानी या राजनीतिक हस्तक्षेप की गुंजाइश न रहे।
झारखंड सरकार के नए नियमों से शुरू हुआ विवाद
DGP नियुक्ति को लेकर विवाद की शुरुआत झारखंड सरकार द्वारा 8 जनवरी 2025 को DGP के चयन और नियुक्ति से जुड़े नए नियम अधिसूचित किए जाने के बाद हुई। इन नियमों को चुनौती देते हुए झारखंड हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि नए नियम सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश सिंह फैसले में निर्धारित दिशा-निर्देशों को प्रभावित करते हैं। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। अदालत ने 18 अगस्त 2025 को मामले में आदेश पारित किया। इसके बाद राज्य सरकार ने नियम 5(सी) में संशोधन किया। संशोधन के कुछ ही समय बाद, 30 दिसंबर 2025 को तदाशा मिश्रा को DGP नियुक्त कर दिया गया। यही नियुक्ति अब सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवालों में से एक है।
UPSC की भूमिका को लेकर भी सवाल
मामले में DGP नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर भी आपत्ति सामने आई है। एमिकस क्यूरी की रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य सरकार ने संशोधित नियमों के आधार पर DGP की नियुक्ति की और नामों का पैनल UPSC को भेजे जाने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठे हैं। DGP नियुक्ति की पारंपरिक प्रक्रिया में UPSC की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के पुराने निर्देशों और झारखंड सरकार के संशोधित नियमों के बीच सामंजस्य को लेकर अदालत में बहस होने की संभावना है।
बाबूलाल मरांडी की याचिका से जुड़ा है मामला
यह मामला झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी की ओर से दायर याचिका से भी जुड़ा है। मरांडी ने राज्य सरकार के संशोधित DGP नियुक्ति नियमों को सुप्रीम कोर्ट के पूर्व के दिशा-निर्देशों के विपरीत बताते हुए चुनौती दी है। मरांडी की ओर से अधिवक्ता अभिषेक राय और ज्ञानंत सिंह अदालत में पक्ष रख रहे हैं। 18 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने एमिकस क्यूरी से इस मामले के विभिन्न पहलुओं पर अपनी रिपोर्ट देने को कहा था। इसके बाद राजू रामचंद्रन ने अदालत के समक्ष अपना नोट प्रस्तुत किया।
अब 7 सितंबर को होगी अहम सुनवाई
मामले की पिछली सुनवाई 2 सितंबर को हुई थी। उस समय एमिकस क्यूरी की रिपोर्ट उपलब्ध नहीं होने के कारण सुनवाई को आगे बढ़ाते हुए 7 सितंबर की तारीख तय की गई। अब सुप्रीम कोर्ट में एमिकस क्यूरी की रिपोर्ट के आधार पर DGP नियुक्ति प्रक्रिया, छह महीने की शेष सेवा के नियम, राज्य सरकार के संशोधित प्रावधान और UPSC की भूमिका जैसे मुद्दों पर सुनवाई हो सकती है। तदाशा मिश्रा की नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख झारखंड में DGP नियुक्ति की मौजूदा व्यवस्था और राज्य सरकार के नियमों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
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