झारखंड का 45 साल पुराना डबल मर्डर केस: सुप्रीम कोर्ट ने जतायी नाराजगी, 70 साल के दोषी को दी जमानत
झारखंड के 45 साल पुराने डबल मर्डर केस पर सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक देरी पर गंभीर नाराजगी जताई। अदालत ने इसे न्यायिक विफलता बताते हुए 70 वर्षीय साइमन सोरेन की उम्रकैद की सजा निलंबित कर रिहाई का आदेश दिया।
HighLights:
- झारखंड के 45 साल पुराने डबल मर्डर केस पर सुप्रीम कोर्ट ने जताई गंभीर नाराजगी
- अदालत ने मामले को न्यायिक तंत्र की विफलता का उदाहरण बताया
- 70 वर्षीय साइमन सोरेन इस मामले के एकमात्र जीवित आरोपी हैं
- खराब स्वास्थ्य और लंबी न्यायिक प्रक्रिया को देखते हुए उम्रकैद की सजा निलंबित कर रिहाई का आदेश
नई दिल्ली (Threesocieties.com Desk): झारखंड के दुमका जिले से जुड़े करीब 45 साल पुराने दोहरे हत्याकांड की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक प्रक्रिया में हुई असाधारण देरी पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने मामले को न्यायिक तंत्र की विफलता का उदाहरण बताते हुए कहा कि एक गंभीर आपराधिक मामले में न्याय मिलने में इतनी लंबी देरी बेहद चिंताजनक है।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले के एकमात्र जीवित दोषी 70 वर्षीय साइमन सोरेन की उम्र, खराब स्वास्थ्य और पिछले 45 वर्षों के दौरान झेली गई लंबी कानूनी प्रक्रिया को देखते हुए उनकी उम्रकैद की सजा निलंबित कर रिहाई का आदेश दिया है। अदालत ने उन्हें निजी मुचलके पर रिहा करने का निर्देश दिया है।
सुप्रीम कोर्ट की दो टूक- 45 साल तक मुकदमा चलना न्यायिक विफलता
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए न्यायिक प्रक्रिया में हुई देरी पर गंभीर चिंता जताई। अदालत ने विशेष रूप से इस बात पर सवाल उठाया कि मामला निचली अदालत से लेकर हाई कोर्ट तक पहुंचने और अपील पर निर्णय होने में दशकों लग गए।
अदालत के मुताबिक, आरोपियों को पहले लंबे समय तक ट्रायल का सामना करना पड़ा और इसके बाद सजा के खिलाफ अपील के निपटारे में भी करीब दो दशक से अधिक समय लग गया। इस दौरान कई आरोपी और दोषी अपनी जिंदगी पूरी किए बिना ही दुनिया से चले गए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह मामला इस बात का गंभीर उदाहरण है कि किस तरह न्यायिक प्रक्रिया में अत्यधिक देरी किसी आपराधिक मुकदमे के पूरे उद्देश्य को प्रभावित कर सकती है।
1981 में हुई थी दो लोगों की हत्या
यह मामला 18 अक्टूबर 1981 का है। घटना झारखंड के तत्कालीन दुमका जिले के भुरुंडिया गांव की बताई गई है। मामले के अनुसार, विभूति मंडल, बनारसी मंडल और उनके परिवार के सदस्य धान की कटाई के लिए गए थे। इसी दौरान तीर-कमान और कुल्हाड़ी जैसे हथियारों से लैस लोगों की भीड़ ने उन पर हमला कर दिया। हमले में विभूति मंडल और बनारसी मंडल की हत्या कर दी गई। घटना के बाद पुलिस ने छह लोगों को आरोपी बनाया था। इनमें साइमन सोरेन भी शामिल थे। लेकिन इस मामले की न्यायिक यात्रा इतनी लंबी चली कि आरोपियों की संख्या समय के साथ घटती चली गई।
आरोप तय होने से पहले ही दो आरोपियों की मौत
मामले की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट के सामने यह तथ्य भी आया कि आरोप तय होने से पहले ही दो आरोपियों की मौत हो गई थी। इसके बाद मुकदमा चलता रहा। जब मामला हाई कोर्ट में अपील के स्तर पर पहुंचा तो तीन अन्य दोषियों की भी मौत हो गई। अब इस पूरे मामले में साइमन सोरेन एकमात्र जीवित आरोपी रह गए हैं। इस तरह 1981 में हुई घटना के करीब साढ़े चार दशक बाद भी मामला पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाया है।
1991 में आरोप तय, ट्रायल पूरा होने में लग गए 12 साल
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान न्यायिक प्रक्रिया में हुई देरी के आंकड़ों पर भी गौर किया। बताया गया कि 1991 में आरोप तय किए गए, लेकिन ट्रायल पूरा होने में ही करीब 12 साल लग गए। ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 2002 में साइमन सोरेन को उम्रकैद की सजा सुनाई। इसके बाद मामला अपील के लिए हाई कोर्ट पहुंचा। यहां भी सुनवाई में लंबा वक्त लग गया। सुप्रीम कोर्ट ने यह जानकर हैरानी जताई कि अपील के निपटारे में भी करीब दो दशक से अधिक समय लग गया। वर्ष 2024 में झारखंड हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा। इसके बाद साइमन सोरेन ने सरेंडर किया।
11 साल में पांच अलग-अलग अदालतों में ट्रांसफर हुआ केस
मामले में देरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट के सामने एक और महत्वपूर्ण तथ्य आया। डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज की रिपोर्ट के मुताबिक, आरोप तय होने के बाद करीब 11 वर्षों के भीतर यह मामला पांच अलग-अलग अदालतों में ट्रांसफर हुआ। अदालत ने माना कि किसी गंभीर आपराधिक मुकदमे का इस तरह लंबे समय तक अलग-अलग अदालतों में घूमते रहना न्यायिक प्रक्रिया की गति पर गंभीर सवाल खड़े करता है। सुप्रीम कोर्ट ने इसी वजह से मामले के रिकॉर्ड और पूरी न्यायिक प्रक्रिया की स्थिति को गंभीरता से लेने का निर्देश दिया है।
70 साल की उम्र, कई गंभीर बीमारियां और अस्पताल में भर्ती
साइमन सोरेन की वर्तमान उम्र करीब 70 वर्ष है। बताया गया कि वह कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं और हिरासत के दौरान अस्पताल में भर्ती हैं। बचाव पक्ष की अधिवक्ता फौजिया शकील ने अदालत के समक्ष उनकी उम्र, खराब स्वास्थ्य और लंबे समय से चले आ रहे मुकदमे का हवाला देते हुए राहत की मांग की। सुप्रीम कोर्ट ने इन परिस्थितियों को ध्यान में रखा। अदालत ने माना कि अपराध की गंभीरता अपनी जगह है, लेकिन आरोपी ने पिछले 45 वर्षों में जिस लंबी न्यायिक प्रक्रिया और पीड़ा का सामना किया है, उसे भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
45 साल में सिर्फ 2 साल 4 महीने 12 दिन हिरासत
सुप्रीम कोर्ट के सामने एक अहम तथ्य यह भी आया कि साइमन सोरेन ने पिछले करीब 45 वर्षों की अवधि में कुल मिलाकर 2 साल, 4 महीने और 12 दिन हिरासत में बिताए हैं। अदालत ने उनकी उम्र और स्वास्थ्य को देखते हुए उनकी सजा को निलंबित करने का फैसला किया। उन्हें निजी मुचलके पर रिहा करने का आदेश दिया गया है। साथ ही यह शर्त रखी गई है कि वह रिहाई के बाद कोई नया अपराध नहीं करेंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट की कार्यप्रणाली पर भी उठाए सवाल
सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी सिर्फ मुकदमे की लंबी अवधि तक सीमित नहीं रही। पीठ ने झारखंड हाई कोर्ट में आपराधिक अपीलों के लंबित रहने की स्थिति पर भी सवाल उठाए। हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल की ओर से दाखिल हलफनामे में आपराधिक अपीलों के लंबित मामलों से जुड़े आंकड़े भी अदालत के सामने रखे गए। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को देश में आपराधिक अपीलों के बढ़ते बैकलॉग और न्यायिक प्रक्रिया में होने वाली देरी से जोड़कर देखा है।
चार हफ्ते में मूल रिकॉर्ड मांगा
सुप्रीम कोर्ट ने मामले से जुड़े मूल रिकॉर्ड चार सप्ताह के भीतर उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है। इसमें भौतिक रिकॉर्ड के साथ-साथ डिजिटल रिकॉर्ड भी शामिल हैं। अदालत इस बात को भी देखना चाहती है कि मामले की सुनवाई और अपील की प्रक्रिया में इतनी लंबी देरी आखिर किन परिस्थितियों में हुई।
आपराधिक अपीलों के बैकलॉग पर केंद्र सरकार भी पक्षकार
मामले में आपराधिक अपीलों के भारी बैकलॉग को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को भी पक्षकार बनाया है। अदालत ने निर्देश दिया है कि मामले से संबंधित रिपोर्ट की प्रति अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी या सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को उपलब्ध कराई जाए। मामले की अगली सुनवाई 18 सितंबर को निर्धारित की गई है।
सिर्फ एक केस नहीं, पूरी न्यायिक व्यवस्था के लिए सवाल
45 साल पुराने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को केवल एक आरोपी की रिहाई के फैसले के तौर पर नहीं देखा जा रहा है। अदालत की चिंता का बड़ा मुद्दा न्याय मिलने में होने वाली असाधारण देरी है। एक हत्या जैसे गंभीर अपराध के मामले में घटना के करीब 45 साल बाद भी न्यायिक प्रक्रिया का जारी रहना यह सवाल खड़ा करता है कि लंबित आपराधिक मामलों का निपटारा समय पर कैसे सुनिश्चित किया जाए।
इस मामले में कई आरोपी ट्रायल और अपील के अंतिम परिणाम का इंतजार करते-करते दुनिया से चले गए। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी न्यायिक व्यवस्था में लंबित आपराधिक मामलों के तेजी से निपटारे की जरूरत को एक बार फिर सामने लाती है।
Anjala Kumar 



