महाराष्ट्र के माउंटेन मैन तुलसीराम गेडम: पत्नी को खोया तो उठाया फावड़ा, 1.5 KM सड़क बनाने में जुटा गांव

पत्नी की मौत के बाद महाराष्ट्र के चंद्रपुर के तुलसीराम गेडम ने गांव तक सड़क बनाने का संकल्प लिया। एम्बुलेंस नहीं पहुंचने से पत्नी की जान गई थी। अब 1.5 KM सड़क बनाने में पूरा गांव जुटा है।

महाराष्ट्र के माउंटेन मैन तुलसीराम गेडम: पत्नी को खोया तो उठाया फावड़ा, 1.5 KM सड़क बनाने में जुटा गांव
ग्रामीणों ने प्रशासन का इंतजार छोड़कर खुद श्रमदान शुरू किया।

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       Highlights:

  • पत्नी की मौत के बाद तुलसीराम गेडम ने सड़क बनाने का संकल्प लिया
  • सड़क नहीं होने के कारण एम्बुलेंस गांव तक नहीं पहुंच सकी थी
  • घोडांकप्पी गांव को मुख्य सड़क से जोड़ने के लिए करीब 1.5 KM रास्ता बनाया जा रहा है
  • तुलसीराम के प्रयास की तुलना बिहार के ‘माउंटेन मैन’ दशरथ मांझी से की जा रही है

मुंबई (Threesocieties.com Desk): बिहार के ‘माउंटेन मैन’ दशरथ मांझी की कहानी देश ही नहीं, दुनिया के लिए मिसाल है। पत्नी की मौत के बाद उन्होंने पहाड़ काटकर रास्ता बनाया था। अब महाराष्ट्र से भी कुछ ऐसी ही जिद और जुनून की कहानी सामने आई है। चंद्रपुर जिले के जिवती तालुका के घोडांकप्पी गांव के तुलसीराम गेडम ने अपनी पत्नी को खोने के बाद गांव तक सड़क पहुंचाने का बीड़ा उठाया है। खास बात यह है कि इस मुहिम में अब पूरा गांव उनके साथ खड़ा हो गया है।

पत्नी की मौत ने बदल दी जिंदगी

घोडांकप्पी गांव में रहने वाली संगीता ने 14 जून को एक बच्ची को जन्म दिया था। प्रसव के बाद उनकी तबीयत बिगड़ गई और उन्हें तत्काल इलाज की जरूरत पड़ी। लेकिन गांव तक पक्की सड़क नहीं होने के कारण एम्बुलेंस वहां तक नहीं पहुंच सकी। समय पर इलाज नहीं मिलने की वजह से संगीता की मौत हो गई। पत्नी को खोने का दर्द तुलसीराम के लिए बेहद गहरा था। लेकिन उन्होंने इस दर्द को अपनी ताकत बना लिया। उन्होंने तय किया कि जिस सड़क की कमी ने उनके परिवार से एक जिंदगी छीन ली, उसकी वजह से अब किसी और परिवार को ऐसी त्रासदी का सामना नहीं करना पड़ेगा।

प्रशासन का इंतजार छोड़ ग्रामीणों ने उठाए औजार

तुलसीराम का कहना है कि सड़क के लिए ग्रामीण कई बार प्रशासन से गुहार लगा चुके थे, लेकिन कोई ठोस समाधान नहीं निकला। आखिरकार उन्होंने खुद सड़क बनाने का फैसला किया। विश्व आदिवासी दिवस के मौके पर घोडांकप्पी में बड़ी संख्या में ग्रामीण जुटे और गांव को मुख्य सड़क से जोड़ने वाले करीब 1.5 किलोमीटर लंबे रास्ते को दुरुस्त करने का काम शुरू किया। ग्रामीणों की मेहनत से अब तक रास्ते का लगभग आधा हिस्सा तैयार किया जा चुका है। तुलसीराम का कहना है कि वह नहीं चाहते कि भविष्य में किसी मरीज, गर्भवती महिला या किसी अन्य जरूरतमंद को सड़क के अभाव में अपनी जान गंवानी पड़े।

तीन दशक से पहाड़ियों के बीच बसा है गांव

घोडांकप्पी में करीब 20 घर हैं और ग्रामीण लगभग तीन दशकों से यहां रह रहे हैं। पहाड़ियों के बीच बसे इस गांव में बुनियादी सुविधाओं की स्थिति लंबे समय से चुनौतीपूर्ण रही है। गांव में सीमेंट की सड़क और आंगनवाड़ी जैसी सुविधाएं मौजूद हैं, लेकिन मुख्य सड़क से गांव को जोड़ने वाला रास्ता अब भी बेहद खराब है। बरसात के दिनों में स्थिति और खराब हो जाती है। पथरीले और ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर चलना मुश्किल हो जाता है और कई बार मोटरसाइकिल तक गांव के भीतर नहीं पहुंच पाती।

बच्चों को भी झेलनी पड़ती है परेशानी

सड़क की समस्या सिर्फ मरीजों या आपात स्थिति तक सीमित नहीं है। गांव के बाहर जिला परिषद का स्कूल है। ऐसे में बच्चों को भी रोजाना इसी कठिन रास्ते से होकर स्कूल जाना पड़ता है। ग्रामीणों का कहना है कि अगर सड़क का निर्माण पूरा हो जाता है तो बच्चों की पढ़ाई, मरीजों की आवाजाही और रोजमर्रा की जिंदगी में बड़ी राहत मिलेगी।

2021 में बनी सड़क, लेकिन गांव तक नहीं पहुंची

बताया जाता है कि वर्ष 2021 में मुख्यमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के तहत घोडांकप्पी से करीब 1.5 किलोमीटर की दूरी तक सड़क बनाई गई थी। लेकिन पहाड़ी के नीचे बसे गांव तक पहुंचने वाला आखिरी हिस्सा अधूरा रह गया। यही अधूरा हिस्सा आज ग्रामीणों के लिए सबसे बड़ी परेशानी बना हुआ है। अब ग्रामीण प्रशासन की राह देखने के बजाय अपने स्तर पर इस दूरी को पाटने में जुटे हैं।

पत्नी की मौत के बाद लिया बड़ा संकल्प

तुलसीराम कहते हैं कि आपातकालीन स्थिति में हर मिनट बेहद महत्वपूर्ण होता है। उनकी पत्नी को समय पर इलाज की जरूरत थी, लेकिन सड़क नहीं होने के कारण एम्बुलेंस गांव तक नहीं पहुंच सकी और उन्होंने अपनी पत्नी को खो दिया। उनकी नवजात बेटी की देखभाल अब उसकी दादी कर रही हैं। वहीं तुलसीराम अपनी पत्नी के निधन के गम के बीच अपने तीन साल के बेटे की भी जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। इसके बावजूद उन्होंने सड़क निर्माण का काम नहीं छोड़ा। उनके साथ ग्रामीण भी लगातार श्रमदान कर रहे हैं।

इसलिए कहा जा रहा ‘महाराष्ट्र का माउंटेन मैन’

तुलसीराम गेडम की कहानी की तुलना दशरथ मांझी से इसलिए की जा रही है क्योंकि दोनों की जिंदगी में सड़क और किसी अपने को खोने का दर्द एक-दूसरे से जुड़ा है। दशरथ मांझी ने पत्नी की मौत के बाद पहाड़ काटकर रास्ता बनाया था। वहीं तुलसीराम ने पत्नी को खोने के बाद गांव तक सड़क बनाने का संकल्प लिया है। फर्क इतना है कि तुलसीराम अकेले नहीं हैं—इस बार पूरा गांव उनके साथ सड़क बनाने में जुटा है।

उनका यह प्रयास सिर्फ सड़क निर्माण नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर भी सवाल है जहां एक गांव तक आपातकालीन वाहन पहुंचने के लिए जरूरी रास्ता तक उपलब्ध नहीं है। तुलसीराम की मुहिम अब ग्रामीणों की उम्मीद बन गई है कि शायद उनकी मेहनत से घोडांकप्पी को आखिरकार एक सुगम और सुरक्षित रास्ता मिल सके।