नेपाल में ग्लेशियल झीलों का बढ़ा खतरा,47 झीलों पर प्रशासन की नजर, बाढ़ से 389 की मौत, 290 लापता
नेपाल में ग्लेशियल झीलों से बाढ़ का खतरा बढ़ा। ICIMOD और नेपाल सरकार ने 47 संभावित खतरनाक ग्लेशियल झीलों की पहचान की है। जानिए किन जिलों पर GLOF का खतरा और क्यों बढ़ी प्रशासन की चिंता।
Highlights:
- नेपाल में भोटेकोसी नदी में बाढ़ के बाद संभावित ग्लेशियल झील फटने का खतरा बढ़ा
- करीब 17,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित ग्लेशियल झील के टूटने को लेकर चिंता
- ICIMOD और नेपाल सरकार के आकलन में 47 ग्लेशियल झीलों को संभावित रूप से खतरनाक माना गया
- 21 खतरनाक झीलें नेपाल और 25 तिब्बत में सीमा-पार स्थित बताई गई हैं
काठमांडू (Threesocieties.com Desk): नेपाल में एक बार फिर पहाड़ों से आने वाली जल प्रलय का खतरा गहरा गया है। भोटेकोसी नदी में आई बाढ़ के बाद सीमा-पार स्थित ग्लेशियल झीलों को लेकर चिंता बढ़ गई है। चीन की ओर से संभावित अवरोधक झील के टूटने की चेतावनी के बीच प्रशासन को हाई अलर्ट पर रखा गया है। उपलब्ध आकलनों के मुताबिक, ऐसी स्थिति में आने वाले घंटों और दिनों में निचले इलाकों में अचानक बाढ़ का खतरा पैदा हो सकता है।
नेपाल में बुधवार को आई भीषण बाढ़ के पीछे करीब 17,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित ग्लेशियल झील के टूटने की आशंका जताई जा रही है। इस घटना ने हिमालयी क्षेत्र में मौजूद दूसरी खतरनाक झीलों को लेकर भी चिंता बढ़ा दी है। इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट यानी ICIMOD और नेपाल सरकार के वैज्ञानिक आकलन में नेपाल और उसके आसपास कुल 47 संभावित रूप से खतरनाक ग्लेशियल झीलों की पहचान की गई है। इनमें 21 झीलें नेपाल में और 25 झीलें तिब्बत में सीमा-पार क्षेत्र में स्थित बताई गई हैं।
47 ग्लेशियल झीलों पर बढ़ रहा दबाव
हिमालय में ग्लेशियर तेजी से पिघलने के कारण कई जगहों पर ग्लेशियल झीलों का आकार लगातार बढ़ रहा है। इन झीलों के आसपास जमा बर्फ, चट्टान और मलबे की प्राकृतिक दीवार किसी समय कमजोर पड़ सकती है। ऐसी झील के अचानक टूटने को Glacial Lake Outburst Flood यानी GLOF कहा जाता है। इसमें कुछ ही समय में भारी मात्रा में पानी नीचे की ओर तेजी से बहता है। इसका असर नदी घाटियों में बसे गांवों, सड़कों, पुलों, बिजली परियोजनाओं और अन्य बुनियादी ढांचे पर पड़ सकता है। सबसे बड़ी चिंता उन झीलों को लेकर है जो ऐसी नदियों के उद्गम क्षेत्रों में स्थित हैं, जिनका पानी दक्षिण की ओर नेपाल के आबादी वाले इलाकों में पहुंचता है।
इन झीलों को माना गया है ज्यादा संवेदनशील
संभावित रूप से अधिक जोखिम वाली झीलों में लोअर बारुन (टैलोपोखरी), थुलागी (डोना), लुमडिंग त्सो, होंगु-2/चामलांग साउथ, त्सो रोल्पा और इमजा त्सो प्रमुख हैं। आपदा प्रबंधन अधिकारियों और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) से जुड़े आकलनों में तेजी से फैल रही तथा मोरेन यानी बर्फ, चट्टान और मलबे से बनी झीलों पर विशेष निगरानी की जरूरत बताई गई है। इन झीलों में पानी का स्तर बढ़ने या प्राकृतिक बांध कमजोर होने की स्थिति में नीचे बसे इलाकों के लिए अचानक बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है।
कोशी और बागमती बेसिन पर विशेष नजर
पूर्वी और मध्य नेपाल में कोशी और बागमती बेसिन को लेकर चिंता अधिक है। उपलब्ध आकलन के मुताबिक क्षेत्रीय जोखिम का 85 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा संवेदनशील इलाकों में केंद्रित है। सोलुखुम्बु में दूध कोशी और इमजा बेसिन, संखुवासभा में बारुन और अरुण नदी के रास्ते तथा दोलखा में तामा कोशी और त्सो रोल्पा से जुड़े क्षेत्र संभावित प्रभाव वाले इलाकों में शामिल हैं। इसी तरह सिंधुपालचोक में भोटेकोशी और सुनकोशी नदी के रास्तों पर स्थित बस्तियां भी सीमा-पार ग्लेशियल झीलों के संभावित प्रभाव को लेकर संवेदनशील मानी जा रही हैं।
रामेछाप, कावरेपालानचोक और रसुवा में भी खतरा
नदी के निचले इलाकों में बसी बस्तियों को भी अचानक आने वाली बाढ़ से खतरा हो सकता है। रामेछाप, कावरेपालानचोक और रसुवा के निचले इलाकों, खासकर त्रिशूली बेसिन के आसपास रहने वाले लोगों पर भी निगरानी की जरूरत बताई गई है। GLOF की स्थिति में पानी के साथ बड़ी मात्रा में चट्टान, बर्फ और मलबा नीचे की ओर आ सकता है। इससे नदी घाटियों में नुकसान सामान्य बाढ़ की तुलना में कहीं ज्यादा हो सकता है।
पश्चिमी नेपाल भी जोखिम से बाहर नहीं
पश्चिमी और सुदूर-पश्चिमी नेपाल में गंडकी और करनाली बेसिन के कई इलाके भी संभावित रूप से संवेदनशील हैं। मनांग और लमजुंग थुलागी झील के नीचे मार्स्यांगडी बेसिन में आते हैं। वहीं गोरखा बूढ़ी गंडकी बेसिन, जबकि मुस्तांग और म्याग्दी काली गंडकी बेसिन से जुड़े हैं। हुमला की दूर-दराज घाटियां, जिनमें लिमी घाटी और हुमला करनाली का क्षेत्र शामिल है, भी संभावित जोखिम वाले इलाकों में गिनी जाती हैं।
क्यों खतरनाक है GLOF?
ग्लेशियल झील फटने की घटना सामान्य बाढ़ से अलग होती है। इसमें पानी बहुत तेजी से और भारी मात्रा में नीचे की ओर आता है। रास्ते में यह अपने साथ चट्टान, मिट्टी, पेड़ और बर्फ का मलबा भी बहा सकता है। ऐसी स्थिति में नदी किनारे बने पुल, सड़कें, बिजली परियोजनाएं और बस्तियां कुछ ही समय में प्रभावित हो सकती हैं। पहाड़ी इलाकों में चेतावनी और निकासी के लिए समय भी बेहद कम मिल सकता है।
चीन की चेतावनी के बाद बढ़ी सतर्कता
भोटेकोसी नदी में बाढ़ और सीमा-पार क्षेत्र में संभावित अवरोधक झील को लेकर चीन की चेतावनी ने खतरे को और गंभीर बना दिया है। प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती नदी के निचले इलाकों में रहने वाली आबादी को समय रहते अलर्ट करना और जरूरत पड़ने पर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाना है।
हालांकि, किसी विशेष झील के ठीक 72 घंटे में टूटने की निश्चित भविष्यवाणी को वैज्ञानिक तथ्य के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए। ग्लेशियल झीलों का व्यवहार मौसम, तापमान, पानी के दबाव और प्राकृतिक बांध की स्थिति समेत कई कारकों पर निर्भर करता है। इसलिए स्थानीय प्रशासन और वैज्ञानिक एजेंसियों की ताजा चेतावनियों को ही निर्णायक माना जाना चाहिए।
नेपाल में 389 की मौत, 84 भारतीयों का रेस्क्यू, 290 लापता
नेपाल में बुधवार की भीषण बाढ़ के बाद एक और बड़ी बाढ़ का खतरा पैदा हो गया है। चीन ने बताया है कि रसुवागढ़ी बॉर्डर से 18 किमी ऊपर ल्हेंदे नदी में पानी रुकने से झील बनी है। पानी बढ़ रहा है और झील टूटने का खतरा है। नेपाल के जल तथा मौसम विज्ञान विभाग ने भोटेकोशी के निचले इलाकों में लोगों को नदी किनारे से दूर रहने और सुरक्षित जगह जाने की सलाह दी है। झील करीब 0.11 वर्ग किमी में फैली है। इसके टूटने पर भोटेकोशी में फिर तेज बाढ़ आ सकती है।
बाढ़ में अब तक 389 लोगों की मौत हो चुकी है। करीब 1500 लोग लापता बताए जा रहे हैं। भारत के विदेश मंत्रालय के मुताबिक, 290 भारतीय नागरिकों से संपर्क नहीं हो पा रहा है। वहीं, अब तक 84 भारतीयों को सुरक्षित बचाया गया है। इनमें त्रिशूली-1 हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट के 63 कर्मचारी और तमिलनाडु के 21 लोग शामिल हैं।




