पैसे मांगे, प्रताड़ित किया तो भी 498A! झारखंड हाई कोर्ट ने कहा- ‘दहेज’ शब्द जरूरी नहीं

Jharkhand High Court ने अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि 498A के तहत महिला को पैसे या संपत्ति की गैरकानूनी मांग के लिए प्रताड़ित करना भी क्रूरता है। ‘दहेज’ शब्द का इस्तेमाल जरूरी नहीं। हाई कोर्ट ने तीन आरोपितों की दोषसिद्धि बहाल कर दो महीने में सरेंडर का आदेश दिया।

पैसे मांगे, प्रताड़ित किया तो भी 498A! झारखंड हाई कोर्ट ने कहा- ‘दहेज’ शब्द जरूरी नहीं
पैसे के लिए प्रताड़ना भी क्रूरता; झारखंड हाई कोर्ट।

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   HighLights:

  • पैसे या संपत्ति की गैरकानूनी मांग के लिए महिला को प्रताड़ित करना भी क्रूरता 
  • 498A के तहत अपराध साबित करने के लिए मांग को ‘दहेज’ कहना जरूरी नहीं
  • झारखंड हाई कोर्ट ने तीन आरोपितों को बरी करने का आदेश रद किया
  • पति सहित तीनों आरोपितों को दो महीने के भीतर सरेंडर करने का निर्देश

रांची (Threesocieties.com Desk): झारखंड हाई कोर्ट ने दहेज प्रताड़ना से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में साफ किया है कि किसी महिला को प्रताड़ित करने के लिए की गई गैरकानूनी आर्थिक या संपत्ति संबंधी मांग को सिर्फ इसलिए दहेज की मांग नहीं माना जा सकता कि उसमें ‘दहेज’ शब्द का इस्तेमाल नहीं हुआ है। अदालत ने कहा कि यदि किसी महिला पर पैसे या संपत्ति की गैरकानूनी मांग पूरी करने के लिए मानसिक या शारीरिक दबाव बनाया जाता है और उसे प्रताड़ित किया जाता है, तो ऐसी हरकत भारतीय दंड कानून की धारा 498A के तहत क्रूरता के दायरे में आ सकती है।

जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की अदालत ने पूर्वी सिंहभूम की अनीता भकत की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की। हाई कोर्ट ने अपीलीय अदालत के उस फैसले को रद कर दिया, जिसमें पति समेत ससुराल पक्ष के तीन लोगों को बरी कर दिया गया था।

हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई दोषसिद्धि को बहाल करते हुए तीनों आरोपितों को संबंधित अदालत के समक्ष दो महीने के भीतर सरेंडर करने का निर्देश दिया है। निर्धारित अवधि में सरेंडर नहीं करने पर ट्रायल कोर्ट को गिरफ्तारी और जेल भेजने की कानूनी कार्रवाई करने का आदेश दिया गया है।

शादी के बाद शुरू हुआ पैसे की मांग का सिलसिला

मामला अनीता भकत की शादी से जुड़ा है। अनीता की शादी 25 जून 2008 को गौरांग भकत के साथ हुई थी। आरोप के मुताबिक शादी के समय उसके मायके वालों की ओर से एक लाख रुपये नकद, सोने के आभूषण और लगभग तीन लाख रुपये मूल्य का घरेलू सामान दिया गया था। शादी के कुछ समय बाद ही अनीता से मायके से एक लाख रुपये लाने की मांग की जाने लगी। आरोप था कि पति ने चावल का कारोबार बढ़ाने के लिए हॉलर मशीन खरीदने के नाम पर यह रकम मांगी थी। अनीता के मुताबिक जब उसने अपने मायके से रकम लाने में असमर्थता जताई तो उसके साथ मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ना शुरू कर दी गई। आरोप यह भी था कि गर्भावस्था के दौरान उसके साथ मारपीट की गई और इलाज तक की समुचित सुविधा उपलब्ध नहीं कराई गई।

एक लाख रुपये के लिए प्रताड़ना का आरोप

मामले में आरोप लगाया गया कि 1 मार्च 2009 को एक बार फिर अनीता पर मायके से एक लाख रुपये लाने का दबाव बनाया गया। रकम नहीं देने पर उसे गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी गई। आरोप के अनुसार इसके बाद उसके साथ मारपीट की गई और उसे घर से निकाल दिया गया। अनीता ने मामले की शिकायत पुलिस से की। बाद में उसने अदालत में शिकायतवाद भी दाखिल किया। मामला अदालत पहुंचने के बाद निचली अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर पति और ससुराल पक्ष के तीन आरोपितों को भारतीय दंड संहिता की धारा 498A और 323 के तहत दोषी माना था।

अपीलीय अदालत ने किस आधार पर किया था बरी?

ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ आरोपितों ने अपील की थी। अपीलीय अदालत ने यह कहते हुए आरोपितों को राहत दे दी थी कि एक लाख रुपये की मांग दहेज के लिए नहीं बल्कि कारोबार बढ़ाने के लिए की गई थी। अपीलीय अदालत के अनुसार चावल के कारोबार के लिए मशीन खरीदने के उद्देश्य से मांगी गई रकम को दहेज की मांग नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर आरोपितों को बरी कर दिया गया था। इसके बाद मामला झारखंड हाई कोर्ट पहुंचा।

हाई कोर्ट ने खारिज किया ‘दहेज शब्द’ वाला तर्क

हाई कोर्ट ने अपीलीय अदालत के इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि धारा 498A का दायरा केवल ऐसी मांग तक सीमित नहीं है जिसे स्पष्ट रूप से ‘दहेज’ कहा गया हो। यदि महिला के पति या उसके रिश्तेदार किसी गैरकानूनी संपत्ति या मूल्यवान वस्तु की मांग को पूरा कराने के लिए महिला पर दबाव डालते हैं और उसके साथ मानसिक या शारीरिक क्रूरता करते हैं, तो वह भी धारा 498A के तहत अपराध की श्रेणी में आ सकता है।

अदालत ने इस मामले में माना कि एक लाख रुपये की मांग गैरकानूनी थी और उस मांग को पूरा कराने के लिए महिला को शारीरिक एवं मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया। यानी किसी मांग को दहेज साबित करने के लिए केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि आरोपी ने अपनी मांग के लिए ‘दहेज’ शब्द का इस्तेमाल किया था या नहीं। मांग की प्रकृति और उसे पूरा कराने के लिए महिला के साथ किए गए व्यवहार भी महत्वपूर्ण हैं।

ट्रायल कोर्ट की दोषसिद्धि बहाल

झारखंड हाई कोर्ट ने अपीलीय अदालत के बरी करने के आदेश को रद कर दिया। इसके साथ ही ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई दोषसिद्धि को बहाल कर दिया गया। अदालत ने पति सहित तीनों आरोपितों को दो महीने के भीतर ट्रायल कोर्ट में सरेंडर करने का निर्देश दिया है। उन्हें वहां सजा प्राप्त करनी होगी। अगर आरोपित निर्धारित अवधि में अदालत के समक्ष सरेंडर नहीं करते हैं तो ट्रायल कोर्ट को उनकी गिरफ्तारी और जेल भेजने के लिए कानून के अनुसार आवश्यक कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया है।

महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े मामलों में अहम टिप्पणी

झारखंड हाई कोर्ट का यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि अदालत ने धारा 498A के तहत ‘क्रूरता’ की व्याख्या करते हुए यह स्पष्ट किया है कि महिला को प्रताड़ित करने वाली हर गैरकानूनी आर्थिक मांग को केवल इस आधार पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि उसे दहेज की मांग नहीं कहा गया।

मामले में अदालत ने मांग के उद्देश्य और महिला के साथ किए गए कथित व्यवहार, दोनों को महत्वपूर्ण माना। इससे यह संदेश भी जाता है कि शादी के बाद किसी महिला पर मायके से रकम या संपत्ति लाने के लिए दबाव बनाना और मांग पूरी नहीं होने पर उसके साथ हिंसा या मानसिक प्रताड़ना करना कानूनी रूप से गंभीर परिणाम पैदा कर सकता है।