सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: सिविल जज बनने का रास्ता बदला: अब 3 नहीं, 1 साल की वकालत जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने सिविल जज (जूनियर डिवीजन) बनने के लिए वकालत के अनुभव की शर्त 3 साल से घटाकर 1 साल कर दी है। 2027 से प्रैक्टिस सर्टिफिकेट, एक साल ट्रेनिंग और एक साल क्लर्कशिप अनिवार्य होगी।
HighLights:
- 1 अप्रैल 2027 के बाद होने वाली भर्ती में एक साल की प्रैक्टिस जरूरी होगी।
- प्रैक्टिस को सर्टिफिकेट और कोर्ट में उपस्थिति के रिकॉर्ड से सत्यापित किया जाएगा।
- चयनित उम्मीदवारों को एक साल का अनिवार्य न्यायिक प्रशिक्षण लेना होगा।
- इसके बाद एक साल की स्ट्रक्चर्ड लॉ क्लर्कशिप करनी होगी।
नई दिल्ली (Threesocieties.com Desk): सिविल जज (जूनियर डिवीजन) बनने की तैयारी कर रहे लॉ ग्रेजुएट्स के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा बदलाव किया है। सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक सेवा की शुरुआती भर्ती में शामिल होने के लिए अनिवार्य वकालत के अनुभव की अवधि को तीन साल से घटाकर एक साल कर दिया है। यह बदलाव 1 अप्रैल 2027 के बाद होने वाली सिविल जज (जूनियर डिवीजन) भर्ती परीक्षाओं पर लागू होगा।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से उन कानून स्नातकों को बड़ी राहत मिलेगी, जिनके लिए तीन साल की अनिवार्य प्रैक्टिस की शर्त न्यायिक सेवा में प्रवेश की राह को लंबा कर रही थी। हालांकि कोर्ट ने व्यावहारिक न्यायिक अनुभव की जरूरत को खत्म नहीं किया है। चयनित उम्मीदवारों के लिए प्रशिक्षण और संरचित क्लर्कशिप की व्यवस्था भी की गई है। क्लर्कशिप के दौरान छह महीने जिला एवं सत्र न्यायाधीश/उच्च न्यायिक सेवा के न्यायाधीश और छह महीने हाईकोर्ट के कार्यरत न्यायाधीश के अधीन काम करना होगा। व्यवस्था को पांच साल बाद समीक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट के सामने रखा जाएगा। जस्टिस के. विनोद चंद्रन ने तीन साल की प्रैक्टिस वाली व्यवस्था को बरकरार रखने के पक्ष में असहमति जताई।
तीन साल की जगह अब एक साल का अनुभव
सुप्रीम कोर्ट ने मई 2025 में दिए अपने फैसले में सिविल जज (जूनियर डिवीजन) की प्रारंभिक न्यायिक सेवा परीक्षा में शामिल होने के लिए तीन साल की वकालत अनिवार्य की थी। इस फैसले के खिलाफ कई पुनर्विचार और संशोधन याचिकाएं दायर हुई थीं। इन याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने अपने पुराने फैसले में बदलाव किया। बहुमत के फैसले के तहत अब भविष्य की भर्ती में तीन साल के बजाय कम से कम एक साल की वकालत का अनुभव जरूरी होगा। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायिक सेवा में आने वाले उम्मीदवारों को अदालत की वास्तविक कार्यप्रणाली की पर्याप्त समझ होना जरूरी है। इसी वजह से प्रैक्टिस के साथ प्रशिक्षण और क्लर्कशिप की व्यवस्था की गई है।
1 अप्रैल 2027 के बाद लागू होगा नया नियम
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि 1 अप्रैल 2027 के बाद होने वाली सिविल जज (जूनियर डिवीजन) भर्ती परीक्षाओं में शामिल होने वाले उम्मीदवारों के पास कम से कम एक साल की वकालत का अनुभव होना चाहिए। राज्य सरकारों को संबंधित हाईकोर्ट से सलाह लेकर अपने न्यायिक सेवा नियमों में जरूरी संशोधन करने और उन्हें अधिसूचित करने का निर्देश दिया गया है। यह प्रक्रिया तीन महीने के भीतर पूरी करनी होगी।
प्रैक्टिस सर्टिफिकेट से होगा अनुभव का सत्यापन
सिर्फ एक साल तक बार में पंजीकृत रहना पर्याप्त नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट ने प्रैक्टिस के वास्तविक अनुभव को प्रमाणित करने पर जोर दिया है। उम्मीदवार के पास सर्टिफिकेट ऑफ प्रैक्टिस होना जरूरी होगा। यह प्रमाणपत्र तभी जारी किया जाएगा, जब अदालत में उसकी उपस्थिति और न्यायिक कार्यवाही में भागीदारी का रिकॉर्ड निर्धारित व्यवस्था के तहत दर्ज हो। यानी कोर्ट ने यह सुनिश्चित करने की कोशिश की है कि प्रैक्टिस की शर्त केवल कागजी औपचारिकता बनकर न रह जाए और उम्मीदवार को वास्तव में अदालत में काम करने का अनुभव मिले।
ट्रांजिशन पीरियड में लॉ ग्रेजुएट्स को राहत
सुप्रीम कोर्ट ने पुराने तीन साल के नियम और नई व्यवस्था के बीच संक्रमण को लेकर भी राहत दी है। 25 मई 2025 से 31 मार्च 2027 के बीच घोषित न्यायिक परीक्षाओं के लिए एक विशेष ट्रांजिशन व्यवस्था लागू होगी। इस अवधि में परीक्षा में शामिल होने वाले पात्र लॉ ग्रेजुएट्स को पुराने तीन साल के अनुभव की शर्त के कारण बाहर नहीं किया जाएगा। ऐसे उम्मीदवारों के चयन के बाद उन्हें सीधे नियमित न्यायिक अधिकारी बनाने के बजाय प्रशिक्षु न्यायिक अधिकारी के रूप में प्रशिक्षण दिया जाएगा।
एक साल की ट्रेनिंग, फिर एक साल की क्लर्कशिप
नई व्यवस्था में चयनित प्रशिक्षु न्यायिक अधिकारियों को संबंधित राज्य की न्यायिक अकादमी में एक साल का अनिवार्य गहन प्रशिक्षण लेना होगा। इसके बाद उन्हें एक साल की स्ट्रक्चर्ड क्लर्कशिप करनी होगी।
क्लर्कशिप को दो हिस्सों में बांटा गया है:
पहले छह महीने: जिला एवं सत्र न्यायाधीश या उच्च न्यायिक सेवा के न्यायाधीशों के पर्यवेक्षण में लॉ क्लर्क के रूप में काम करना होगा।
अगले छह महीने: संबंधित हाईकोर्ट के किसी कार्यरत न्यायाधीश के अधीन क्लर्कशिप करनी होगी।
इस दौरान प्रशिक्षु को अदालत की कार्यवाही, केस फाइल, न्यायिक प्रक्रिया, ड्राफ्टिंग और फैसले की प्रक्रिया को नजदीक से समझने का मौका मिलेगा।
क्लर्कशिप के दौरान मिलेगा पारिश्रमिक
सुप्रीम कोर्ट ने प्रशिक्षु न्यायिक अधिकारियों के आर्थिक हितों का भी ध्यान रखा है। क्लर्कशिप के दौरान उन्हें न्यायिक अकादमी में प्रशिक्षण के समय मिलने वाले पारिश्रमिक के बराबर भुगतान किया जाएगा।
हालांकि, इसके अलावा कोई अतिरिक्त भत्ता नहीं मिलेगा।
क्लर्कशिप पूरी होने के बाद जिस हाईकोर्ट के न्यायाधीश के अधीन प्रशिक्षु ने काम किया होगा, वह उसके प्रदर्शन और उपयुक्तता को लेकर कारणयुक्त मूल्यांकन रिपोर्ट देगा। यदि रिपोर्ट संतोषजनक होती है, तो प्रशिक्षु न्यायिक अधिकारी को नियमित पद पर नियुक्त किया जाएगा। इसके बाद उसे नियमित वेतनमान और सेवा से जुड़े अन्य लाभ मिलेंगे।
जस्टिस चंद्रन ने फैसले से जताई असहमति
तीन सदस्यीय पीठ में जस्टिस के. विनोद चंद्रन ने बहुमत के फैसले से असहमति जताई। उन्होंने मई 2025 में दिए गए तीन साल की प्रैक्टिस वाले फैसले को बरकरार रखने के पक्ष में अपनी राय दी। उनका कहना था कि न्यायिक सेवा को दूसरी सरकारी सेवाओं के समान नहीं माना जा सकता। न्यायाधीश का काम लोगों के जीवन, स्वतंत्रता, संपत्ति और प्रतिष्ठा से जुड़े गंभीर सवालों पर फैसला करना होता है।जस्टिस चंद्रन के मुताबिक बार में काम करने के दौरान ही युवा वकील मुकदमों की फाइलिंग, ड्राफ्टिंग, रिसर्च, जिरह, बहस और अदालत की कार्यवाही की वास्तविक बारीकियां सीखते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि सिर्फ अकादमिक योग्यता मुकदमेबाजी की वास्तविक परिस्थितियों में काम करने के अनुभव की जगह नहीं ले सकती।
ट्रेनिंग और क्लर्कशिप पर भी उठाई आपत्ति
जस्टिस चंद्रन ने नई ट्रेनिंग व्यवस्था पर भी सवाल उठाए। उनके अनुसार एक साल की प्रैक्टिस के बाद उम्मीदवारों को एक साल की ट्रेनिंग और एक साल की क्लर्कशिप करनी होगी। इससे नियमित न्यायिक सेवा में प्रवेश में देरी हो सकती है और उम्मीदवारों पर आर्थिक असर पड़ सकता है। उन्होंने इस बात पर भी चिंता जताई कि अलग-अलग श्रेणी के उम्मीदवारों के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था कैसे समान रूप से लागू होगी। उनका मत था कि न्यायिक सेवा में नियुक्ति से पहले पर्याप्त बार अनुभव को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
थर्ड ऑल इंडिया जजेस एसोसिएशन केस का भी जिक्र
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में थर्ड ऑल इंडिया जजेस एसोसिएशन केस का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने न्यायिक सेवा में नियुक्ति के लिए व्यावहारिक अनुभव और प्रशिक्षण के महत्व को ध्यान में रखते हुए नई व्यवस्था तैयार की है। कोर्ट का जोर इस बात पर है कि न्यायिक सेवा में आने वाले उम्मीदवारों को स्वतंत्र रूप से न्यायिक जिम्मेदारी सौंपने से पहले अदालत की कार्यप्रणाली, न्यायिक अनुशासन और निर्णय प्रक्रिया का पर्याप्त व्यावहारिक अनुभव मिले।
पांच साल बाद होगी व्यवस्था की समीक्षा
सुप्रीम कोर्ट ने इस नई व्यवस्था को स्थायी और अपरिवर्तनीय नहीं माना है। कोर्ट ने कहा कि इसे पांच साल तक लागू रखने के बाद इसकी समीक्षा की जाएगी। समीक्षा के दौरान न्यायिक भर्ती की गुणवत्ता, प्रशिक्षण की उपयोगिता, क्लर्कशिप से मिलने वाला अनुभव और नियुक्त न्यायिक अधिकारियों के प्रदर्शन सहित विभिन्न आंकड़ों पर विचार किया जाएगा। इसके आधार पर जरूरत पड़ने पर सुप्रीम कोर्ट इस व्यवस्था में दोबारा बदलाव कर सकता है।
लॉ ग्रेजुएट्स के लिए क्या बदला?
इस फैसले का सीधा असर उन युवाओं पर पड़ेगा जो कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद न्यायिक सेवा में जाना चाहते हैं। अब 2027 के बाद होने वाली भर्ती के लिए तीन साल की जगह एक साल का वास्तविक वकालत अनुभव पर्याप्त होगा। लेकिन चयन के बाद प्रशिक्षण और क्लर्कशिप के जरिए व्यावहारिक न्यायिक अनुभव हासिल करना अनिवार्य रहेगा।
इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने बार प्रैक्टिस और न्यायिक प्रशिक्षण के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है। एक ओर तीन साल की अनिवार्य प्रैक्टिस की बाध्यता कम की गई है, वहीं दूसरी ओर उम्मीदवारों को अदालत और न्यायिक प्रक्रिया का वास्तविक अनुभव देने के लिए प्रशिक्षण तथा क्लर्कशिप को व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया है।




