NTPC विरोध केस में योगेंद्र साव को बड़ी राहत, हाईकोर्ट ने किया बरी; निचली अदालत का फैसला पलटा

NTPC विरोध केस में पूर्व कांग्रेस मंत्री योगेंद्र साव को झारखंड हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। कोर्ट ने निचली अदालत का दोषसिद्धि फैसला रद्द करते हुए उन्हें बरी कर दिया। जानिए पूरा मामला।

NTPC विरोध केस में योगेंद्र साव को बड़ी राहत, हाईकोर्ट ने किया बरी; निचली अदालत का फैसला पलटा
NTPC विरोध केस में पूर्व मंत्री योगेंद्र साव बरी।

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  • NTPC विरोध केस में पूर्व कांग्रेस मंत्री योगेंद्र साव को झारखंड हाईकोर्ट से बड़ी राहत
  • हाईकोर्ट ने निचली अदालतों के दोषी ठहराने के फैसले को किया रद्द
  • अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका
  • गवाहों के बयानों में नहीं मिला कोई ठोस और विशिष्ट साक्ष्य

रांची (Threesocieties.com Desk): झारखंड हाईकोर्ट ने वर्ष 2010-11 में हजारीबाग में NTPC के परियोजना कार्यालय के उद्घाटन के दौरान हुए विरोध प्रदर्शन से जुड़े आपराधिक मामले में पूर्व कांग्रेस मंत्री एवं विधायक योगेंद्र साव को बड़ी राहत दी है। हाईकोर्ट ने निचली अदालतों द्वारा उन्हें दोषी ठहराए जाने के फैसले को रद्द करते हुए मामले में बरी कर दिया।

जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि अभियोजन पक्ष योगेंद्र साव के खिलाफ लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। अदालत को ऐसा कोई ठोस और विशिष्ट साक्ष्य नहीं मिला, जिससे यह साबित हो सके कि साव ने किसी अधिकारी पर हमला किया था या प्रदर्शनकारियों की भीड़ को हिंसा के लिए उकसाया था।

NTPC कार्यालय के उद्घाटन को लेकर हुआ था जोरदार विरोध

मामला हजारीबाग में NTPC के नए परियोजना कार्यालय के उद्घाटन से जुड़ा है। उस समय स्थानीय ग्रामीणों और समर्थकों की ओर से NTPC की नीतियों तथा विस्थापन से जुड़े मुद्दों को लेकर विरोध प्रदर्शन किया गया था। प्रदर्शनकारी अस्पताल की इमारत में NTPC का कार्यालय खोले जाने का विरोध कर रहे थे। विरोध के दौरान स्थिति तनावपूर्ण हो गई और पुलिस तथा प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प की स्थिति उत्पन्न हुई थी। इसी घटना को लेकर पुलिस ने योगेंद्र साव समेत अन्य लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया था।

भीड़ को उकसाने और सरकारी काम में बाधा डालने का आरोप

अभियोजन पक्ष की ओर से योगेंद्र साव पर गैरकानूनी जनसमूह का नेतृत्व करने, प्रदर्शनकारियों को हिंसक गतिविधियों के लिए उकसाने तथा सरकारी कार्य में बाधा डालने जैसे आरोप लगाए गए थे। मामले की सुनवाई के बाद निचली अदालत ने साव को दोषी करार देते हुए सजा सुनाई थी। इस फैसले के खिलाफ योगेंद्र साव ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और निचली अदालत के निर्णय को चुनौती दी।

गवाहों के बयान पर हाईकोर्ट ने उठाए सवाल

हाईकोर्ट ने मामले के गवाहों के बयानों और उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण किया। अदालत ने पाया कि गवाहों के बयान सामान्य और अस्पष्ट आरोपों तक सीमित रहे। ऐसा कोई प्रत्यक्ष एवं ठोस साक्ष्य सामने नहीं आया, जिससे यह साबित हो कि योगेंद्र साव ने स्वयं किसी पुलिस अधिकारी या सरकारी कर्मचारी पर हमला किया था अथवा हिंसा की कोई कार्रवाई की थी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन में किसी व्यक्ति की मौजूदगी या राजनीतिक नेतृत्व अपने आप में आपराधिक उकसावे या हिंसा का प्रमाण नहीं माना जा सकता। इसके लिए अभियोजन को आरोपी के भाषण, कृत्य या भूमिका के संबंध में ठोस साक्ष्य प्रस्तुत करना जरूरी है।

अभियोजन आरोप साबित करने में रहा विफल

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह सफल नहीं रहा। उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर योगेंद्र साव को दोषी ठहराने के लिए आवश्यक कानूनी आधार नहीं बनता है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने निचली अदालतों के दोषसिद्धि संबंधी निष्कर्षों को रद्द कर दिया और योगेंद्र साव को मामले में बरी कर दिया।

हाईकोर्ट के फैसले से मिली बड़ी कानूनी राहत

हाईकोर्ट का यह फैसला योगेंद्र साव के लिए महत्वपूर्ण कानूनी राहत माना जा रहा है। लंबे समय से चले आ रहे इस मामले में अब हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए अभियोजन के साक्ष्यों को पर्याप्त नहीं माना है। फैसले का मुख्य आधार यही रहा कि केवल विरोध प्रदर्शन में मौजूदगी अथवा राजनीतिक नेतृत्व के आधार पर किसी व्यक्ति को हिंसा या आपराधिक उकसावे का दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक उसके खिलाफ ठोस और विशिष्ट साक्ष्य उपलब्ध न हों।