जंतर-मंतर पुलिस एक्शन पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा एक्शन, जांच के लिए बनी 5 सदस्यीय हाई लेवल कमेटी

जंतर-मंतर प्रदर्शन और 20 जुलाई के संसद मार्च में पुलिस कार्रवाई के आरोपों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 5 सदस्यीय हाई-पावर्ड कमेटी बनाई। पूर्व जज आर. सुभाष रेड्डी अध्यक्ष होंगे। पैलेट गन, लाठीचार्ज, आंसू गैस, महिला प्रदर्शनकारियों से बदसलूकी और पुलिस की कार्रवाई की जांच होगी।

जंतर-मंतर पुलिस एक्शन पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा एक्शन, जांच के लिए बनी 5 सदस्यीय हाई लेवल कमेटी
छात्र प्रदर्शनकारियों पर दर्ज FIR रद्द करने की संभावना पर भी सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिए।

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  • जंतर-मंतर प्रदर्शन में पुलिस कार्रवाई की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 5 सदस्यीय हाई-पावर्ड कमेटी बनाई
  • पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी होंगे कमेटी के अध्यक्ष
  • पूर्व CBI डायरेक्टर ऋषि कुमार शुक्ला और रिटायर्ड DGP डॉ. एलआर बिश्नोई भी कमेटी में शामिल
  • पैलेट गन, लाठीचार्ज, आंसू गैस और इलेक्ट्रिक बैटन के कथित जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल की होगी जांच

नई दिल्ली (Threesocieties.com Desk): जंतर-मंतर से संसद की ओर हुए प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा कदम उठाया है। प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस, पैरामिलिट्री और अन्य सुरक्षा बलों पर जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग के आरोपों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पांच सदस्यीय हाई-पावर्ड इंक्वायरी कमेटी का गठन किया है। कमेटी का नेतृत्व सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी करेंगे।

सुप्रीम कोर्ट की यह पहल उन आरोपों के बाद सामने आई है, जिनमें प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर लाठीचार्ज, आंसू गैस और कथित तौर पर पैलेट गन के इस्तेमाल के अलावा महिला प्रदर्शनकारियों के साथ बदसलूकी के आरोप लगाए थे। अदालत ने जांच का दायरा केवल पुलिस कार्रवाई तक सीमित नहीं रखा है, बल्कि प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा और सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े दूसरे पहलुओं को भी इसमें शामिल किया है।

पांच सदस्यीय कमेटी में कौन-कौन?

सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित हाई-पावर्ड कमेटी में न्यायपालिका, जांच एजेंसी और पुलिस प्रशासन के अनुभवी अधिकारियों को शामिल किया गया है। कमेटी में शामिल सदस्य हैं—

जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी — सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश और कमेटी के अध्यक्ष।
जस्टिस रवि शंकर झा — पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस।
जस्टिस शलिंदर कौर — दिल्ली हाईकोर्ट की पूर्व न्यायाधीश।
ऋषि कुमार शुक्ला — CBI के पूर्व डायरेक्टर।
डॉ. एलआर बिश्नोई — मेघालय के रिटायर्ड DGP।

कमेटी में अलग-अलग संस्थानों के वरिष्ठ एवं सेवानिवृत्त अधिकारियों को शामिल करने का उद्देश्य जांच को स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से आगे बढ़ाना है।

पैलेट गन से लेकर लाठीचार्ज तक, कई आरोपों की जांच

सुप्रीम कोर्ट की बनाई कमेटी पुलिस और सुरक्षा बलों द्वारा इस्तेमाल किए गए बल की आवश्यकता और अनुपातिकता की जांच करेगी। इसमें पैलेट गन, इलेक्ट्रिक बैटन, लाठीचार्ज और आंसू गैस के कथित अत्यधिक इस्तेमाल जैसे आरोप शामिल हैं। इसके अलावा प्रदर्शन के दौरान महिला प्रदर्शनकारियों के साथ कथित हिंसा या बदसलूकी, पुलिस की निगरानी व्यवस्था और भीड़ को नियंत्रित करने के लिए अपनाए गए तरीकों की उचितता की भी जांच की जाएगी। कमेटी यह भी देखेगी कि घायल प्रदर्शनकारियों को समय पर चिकित्सा सुविधा मिली या नहीं और यदि किसी को नुकसान हुआ है तो मेडिकल सहायता तथा मुआवजे की जरूरत क्या है।

पुलिस पर आरोपों के साथ प्रदर्शनकारियों की भूमिका भी जांचेगी कमेटी

सुप्रीम कोर्ट ने जांच को एकतरफा नहीं रखा है। कमेटी पुलिस और सुरक्षा बलों पर लगे आरोपों के साथ-साथ प्रदर्शनकारियों द्वारा पुलिसकर्मियों के खिलाफ हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के अधिकारियों के आरोपों की भी जांच करेगी। इससे यह स्पष्ट है कि जांच का उद्देश्य पूरे घटनाक्रम की परिस्थितियों और दोनों पक्षों की भूमिका का तथ्यात्मक आकलन करना है।

20 जुलाई को क्या हुआ था?

20 जुलाई को राजधानी दिल्ली में हजारों प्रदर्शनकारियों ने संसद की ओर मार्च करने की कोशिश की थी। प्रदर्शनकारी परीक्षा में कथित पेपर लीक और परीक्षा व्यवस्था में गड़बड़ी के खिलाफ विरोध कर रहे थे। उनकी प्रमुख मांगों में केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे और परीक्षा प्रणाली में सुधार की मांग शामिल थी।

प्रदर्शनकारियों के संसद की ओर बढ़ने और पुलिस बैरिकेड्स पार करने की कोशिश के बाद पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव की स्थिति बनी। इसके बाद सुरक्षाकर्मियों ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए आंसू गैस और लाठीचार्ज का इस्तेमाल किया।इस दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिसकर्मियों के घायल होने की बात सामने आई थी। पुलिस की ओर से बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों के घायल होने का भी दावा किया गया।

दिल्ली पुलिस ने कोर्ट में क्या कहा?

18 अगस्त की सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट के सामने अपना पक्ष रखा था। पुलिस का कहना था कि 20 जुलाई का संसद मार्च गैरकानूनी था और इसके लिए अनुमति नहीं ली गई थी। पुलिस के मुताबिक प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड तोड़ने और पुलिसकर्मियों से मारपीट की कोशिश की, जिसके कारण स्थिति शांतिपूर्ण प्रदर्शन की सीमा से बाहर चली गई। पुलिस ने यह भी कहा कि हालात को नियंत्रित करने के लिए बल प्रयोग किया गया, लेकिन प्रदर्शनकारियों के खिलाफ जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग नहीं किया गया। डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस सचिन शर्मा की ओर से हलफनामा दाखिल कर पुलिस का पक्ष कोर्ट के सामने रखा गया था।

फेस रिकग्निशन और निजता का मुद्दा भी अहम

सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे मामले में केवल पुलिस कार्रवाई पर ही ध्यान नहीं दिया है। अदालत ने फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी, निगरानी, निजता और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार से जुड़े सवालों को भी महत्वपूर्ण माना है। इसका मतलब है कि प्रदर्शन के दौरान इस्तेमाल की गई तकनीक और निगरानी व्यवस्था की वैधानिकता पर भी आगे गंभीर चर्चा हो सकती है।

प्रदर्शनकारियों पर दर्ज FIR पर भी विचार

सुप्रीम कोर्ट ने छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज FIR को लेकर भी महत्वपूर्ण संकेत दिए हैं। अदालत ने कहा है कि वह इन मामलों को खत्म करने की संभावना पर विचार कर सकती है। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों के इस्तेमाल पर विचार कर सकता है। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि गंभीर आपराधिक रिकॉर्ड वाले लोगों से जुड़े मामलों को अलग तरीके से देखा जा सकता है।

अब कमेटी की जांच पर टिकी नजर

हाई-पावर्ड कमेटी के गठन के बाद अब जंतर-मंतर और संसद मार्च के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई की स्वतंत्र जांच का रास्ता साफ हो गया है। कमेटी पुलिस की कार्रवाई, प्रदर्शनकारियों के आरोप, सुरक्षा व्यवस्था, हिंसा, मेडिकल सहायता और निगरानी जैसे सभी पहलुओं की पड़ताल करेगी। सुप्रीम कोर्ट के इस कदम से यह मामला अब केवल पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि बल प्रयोग की सीमा, प्रदर्शन के अधिकार, निजता और मौलिक अधिकारों जैसे संवैधानिक सवालों से भी जुड़ गया है।