पश्चिम बंगाल: TMC के बागी गुट ने पार्टी मुख्यालय पर किया कब्जा, ताले बदले और पोस्टरों से गायब हुईं ममता

कोलकाता में तृणमूल कांग्रेस के मुख्यालय पर ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट ने कब्जा कर लिया है। ताले बदलने और नए पोस्टर लगाने के साथ ही गुट ने पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह पर भी दावा ठोक दिया है, जिससे बंगाल की राजनीति में बड़ा भूचाल आ गया है।

पश्चिम बंगाल: TMC के बागी गुट ने पार्टी मुख्यालय पर किया कब्जा, ताले बदले और पोस्टरों से गायब हुईं ममता

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   HighLights:

  • कोलकाता स्थित TMC मुख्यालय पर ऋतब्रत बनर्जी गुट का कब्जा
  • कार्यालय के ताले बदले गए और नए पोस्टर लगाए गए
  • नए पोस्टरों में ममता बनर्जी की तस्वीर नहीं दिखाई दी
  • बागी गुट ने एक दिन पहले चुनाव आयोग में पार्टी सिंबल और नाम पर दावा पेश किया था
  • ममता समर्थक कुनाल घोष कार्यालय में प्रवेश नहीं कर सके
  • विधानसभा चुनाव के बाद TMC में बड़े पैमाने पर टूट की स्थिति बनी हुई है

कोलकाता (Threesocieties.com Desk): पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा भूचाल आ गया है। तृणमूल कांग्रेस के भीतर जारी सत्ता संघर्ष अब पार्टी कार्यालयों तक पहुंच गया है। शुक्रवार को कोलकाता स्थित तृणमूल कांग्रेस के मुख्यालय पर ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट ने कब्जा कर लिया और साफ संदेश दिया कि अब पार्टी की कमान उनके हाथों में है।

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बागी नेताओं और समर्थकों के साथ पहुंचे ऋतब्रत बनर्जी गुट ने कार्यालय के ताले बदल दिए और बाहर लगे पोस्टरों को भी बदल दिया। नए पोस्टरों में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तस्वीर नहीं दिखाई दी, हालांकि कार्यालय के भीतर लगी उनकी तस्वीरों और कटआउट्स को नहीं हटाया गया। इससे साफ संकेत मिला कि बागी गुट ममता बनर्जी को पूरी तरह खारिज करने के बजाय उन्हें एक मार्गदर्शक की भूमिका में देखना चाहता है।

पार्टी सिंबल पर दावा, अब मुख्यालय पर भी कब्जा

इस घटनाक्रम से एक दिन पहले ही बागी गुट ने चुनाव आयोग में पार्टी के नाम, चुनाव चिन्ह और संगठन पर दावा पेश किया था। अब मुख्यालय पर कब्जा कर उन्होंने अपनी दावेदारी को और मजबूत करने की कोशिश की है। मुख्यालय में हुई बैठक के दौरान ऋतब्रत बनर्जी ने खुद को "असली तृणमूल कांग्रेस" का प्रतिनिधि बताया और घोषणा की कि पार्टी की गतिविधियां अब इसी कार्यालय से संचालित होंगी। बागी खेमे का दावा है कि पार्टी के अधिकांश विधायक, पूर्व मंत्री, पार्षद और जिला परिषद सदस्य उनके साथ हैं।

अरूप राय बने नए चेयरमैन

कार्यालय के बाहर लगाए गए नए बोर्ड और पोस्टरों में हावड़ा मध्य के विधायक अरूप राय को पार्टी का नया चेयरमैन घोषित किया गया। इससे साफ हो गया कि बागी गुट अब संगठनात्मक ढांचे को भी नए सिरे से तैयार करने में जुट गया है। सूत्रों के मुताबिक, कार्यालय के भवन मालिक से बातचीत कर किराये और संचालन से जुड़े मामलों को भी बागी गुट ने अपने पक्ष में कर लिया है। यही वजह रही कि बिना किसी बड़े विरोध के कार्यालय का नियंत्रण उनके हाथों में चला गया।

कुनाल घोष को नहीं मिला प्रवेश

ममता बनर्जी समर्थक खेमे के वरिष्ठ नेता कुनाल घोष जब पार्टी कार्यालय पहुंचे तो गेट पर ताला लगा मिला और उन्हें अंदर प्रवेश नहीं करने दिया गया। इसके बाद उन्होंने राज्य प्रशासन और पुलिस पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि यह पूरी कार्रवाई सरकारी मशीनरी की मदद से कराई गई है। उन्होंने कहा कि जो नेता खुद को असली तृणमूल बता रहे हैं, वे जनता के बीच ममता बनर्जी के नाम पर चुनाव जीतकर आए थे और अब उन्हीं के खिलाफ खड़े हो गए हैं।

चुनावी हार के बाद शुरू हुई बगावत

बंगाल विधानसभा चुनाव में अपेक्षा से खराब प्रदर्शन के बाद तृणमूल कांग्रेस में असंतोष की शुरुआत हुई थी। 3 जून को पहली बार पार्टी में खुली बगावत सामने आई, जब बड़ी संख्या में विधायकों ने ममता बनर्जी के नेतृत्व पर सवाल उठाए और ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता चुन लिया। इसके बाद 22 जून को आयोजित प्रतिनिधि बैठक में नए अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और 30 सदस्यीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी के गठन का ऐलान किया गया। बागी गुट का दावा है कि पार्टी के दो-तिहाई से अधिक विधायक उनके साथ हैं।

ममता खेमा लगातार कमजोर पड़ने का दावा

बागी नेताओं का दावा है कि लोकसभा और विधानसभा दोनों स्तरों पर ममता बनर्जी का समर्थन तेजी से घटा है। उनका कहना है कि बड़ी संख्या में सांसद और विधायक अलग गुट के साथ खड़े हैं, जिसके कारण अब संगठन और पार्टी कार्यालयों पर उनका अधिकार बनता है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव आयोग में दावेदारी पेश करने और उसके तुरंत बाद मुख्यालय पर कब्जा करने की रणनीति बेहद सुनियोजित है। यदि यह विवाद लंबा खिंचता है तो आने वाले दिनों में पश्चिम बंगाल की राजनीति में और बड़े घटनाक्रम देखने को मिल सकते हैं।

फिलहाल, तृणमूल कांग्रेस के भीतर की यह लड़ाई सिर्फ नेतृत्व की नहीं, बल्कि पार्टी के नाम, चुनाव चिन्ह और राजनीतिक विरासत पर नियंत्रण की जंग बन चुकी है।