डार्क वेब पर लीक हुईं कुडनकुलम न्यूक्लियर प्लांट की 19 हजार फाइलें! भारत की साइबर सुरक्षा पर बड़ा सवाल

भारत के सबसे बड़े कुडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्लांट से जुड़ी 19,000 से अधिक संवेदनशील फाइलें डार्क वेब पर लीक होने का दावा किया गया है। CERT-In और NPCIL जांच में जुटे हैं, जबकि विशेषज्ञों ने भारत की साइबर सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता जताई है।

डार्क वेब पर लीक हुईं कुडनकुलम न्यूक्लियर प्लांट की 19 हजार फाइलें! भारत की साइबर सुरक्षा पर बड़ा सवाल
भारत के सबसे बड़े परमाणु संयंत्र पर साइबर हमला?

Advertisement

      HighLights:

  • रैंसमवेयर ग्रुप 'World Leaks' ने 19,000 से अधिक फाइलें डार्क वेब पर डालने का दावा किया
  • डेटा कथित तौर पर परियोजना से जुड़े कॉन्ट्रैक्टर रिलायंस ग्रुप के सर्वर से चोरी हुआ
  • लीक दस्तावेजों में इंजीनियरिंग ब्लूप्रिंट, कंट्रोल रूम लेआउट और सप्लायर जानकारी होने का दावा
  • CERT-In और NPCIL पूरे मामले की जांच में जुटे
  • विशेषज्ञों ने महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर की साइबर सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता जताई
  • अब तक रिएक्टर के ऑपरेशनल सिस्टम से छेड़छाड़ का कोई प्रमाण नहीं मिला है

नई दिल्ली (Threesocieties.com Desk):  भारत के सबसे बड़े परमाणु ऊर्जा संयंत्रों में शामिल तमिलनाडु स्थित कुडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्लांट (KKNPP) से जुड़े हजारों संवेदनशील दस्तावेज कथित तौर पर डार्क वेब पर लीक होने का मामला सामने आया है। रैंसमवेयर ग्रुप 'World Leaks' ने दावा किया है कि उसने प्लांट से संबंधित 19,000 से अधिक फाइलें सार्वजनिक कर दी हैं। इस दावे ने देश के महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे (Critical Infrastructure) की साइबर सुरक्षा को लेकर नई चिंताएं खड़ी कर दी हैं। हालांकि, अभी तक इन दस्तावेजों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है और जांच एजेंसियां पूरे मामले की गंभीरता से पड़ताल कर रही हैं।

यह भी पढ़ें: ढुल्लू महतो का बड़ा हमला: 'कमीशन के लिए अरूप चटर्जी ने रुकवाया निरसा एलिवेटेड रोड', हेमंत सरकार पर भी उठाए सवाल

न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, हैकर्स ग्रुप ‘वर्ल्ड लीक्स’ ने डार्क वेब पर इन दस्तावेजों को अपलोड करने का दावा किया है। इनमें पावर प्लांट के कुछ हिस्सों के ब्लूप्रिंट, सप्लायर्स की लिस्ट, कंट्रोल रूम और अन्य रिकॉर्ड सार्वजनिक किए गए। सर्वर मई में हैक हुआ था, जून में दस्तावेज लीक का दावा किया गया। इसकी जानकारी अब सामने आई है। तमिलनाडु के कुडनकुलम प्रोजेक्ट पर काम कर रहे अनिल अंबानी के रिलायंस ग्रुप ने माना है कि थर्ड-पार्टी डेटा सेंटर कंपनी योट्टा का सर्वर हैक किया गया। इसकी जानकारी सरकार को दे दी गई है।

रिलायंस ग्रुप के सर्वर से डेटा चोरी का दावा

रिपोर्ट के अनुसार, लीक हुआ डेटा करीब 8.58 लाख फाइलों के बड़े संग्रह का हिस्सा बताया जा रहा है, जिसे कथित तौर पर परियोजना से जुड़े एक कॉन्ट्रैक्टर रिलायंस ग्रुप के सर्वर से चुराया गया। रिलायंस ग्रुप ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स से बातचीत में पुष्टि की कि तीसरे पक्ष के डेटा सेंटर सेवा प्रदाता योटा (Yotta) के सर्वर पर उनके डेटा में आंशिक सेंध लगी थी। कंपनी ने बताया कि मामले की जानकारी सरकार को दे दी गई है, लेकिन प्रभावित दस्तावेजों की प्रकृति पर विस्तृत जानकारी साझा नहीं की।

किन दस्तावेजों के लीक होने का दावा?

रिपोर्ट के मुताबिक, डार्क वेब पर उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों में कई संवेदनशील तकनीकी और प्रशासनिक रिकॉर्ड शामिल होने का दावा किया गया है। इनमें— वेंटिलेशन और कूलिंग सिस्टम के इंजीनियरिंग ब्लूप्रिंट, कॉमन कंट्रोल रूम का फ्लोर लेआउट,  उपकरणों की निरीक्षण रिपोर्ट, सप्लायर और वेंडर की सूची, मीटिंग रिकॉर्ड, बीमा दस्तावेज व परियोजना से जुड़े तकनीकी प्रस्ताव जैसे रिकॉर्ड शामिल बताए जा रहे हैं। हालांकि इन दस्तावेजों की प्रामाणिकता की स्वतंत्र पुष्टि अब तक नहीं हो सकी है।

यूनिट-3 और यूनिट-4 से जुड़े हैं अधिकांश दस्तावेज

बताया जा रहा है कि अधिकांश फाइलें कुडनकुलम परियोजना की यूनिट-3 और यूनिट-4 से संबंधित हैं, जिनका निर्माण कार्य जारी है और जिनके 2027 तक चालू होने की संभावना है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि परमाणु रिएक्टर के कोर सिस्टम की डिजाइन इस कथित लीक का हिस्सा नहीं दिखती, क्योंकि उसे रूस की सरकारी कंपनी Rosatom उपलब्ध कराती है।

विशेषज्ञों ने जताई गंभीर चिंता

परमाणु सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि भले ही ऑपरेशनल सिस्टम प्रभावित होने का कोई प्रमाण नहीं मिला हो, लेकिन इस प्रकार के दस्तावेज किसी भी दुश्मन देश, साइबर अपराधी या संगठित हमलावर के लिए महत्वपूर्ण जानकारी साबित हो सकते हैं। न्यूक्लियर थ्रेट इनिशिएटिव के वरिष्ठ अधिकारी निकोलस रोथ के अनुसार, ऐसे दस्तावेजों से यह पता लगाया जा सकता है कि परियोजना तक किन लोगों की पहुंच है, कौन-कौन से सिस्टम जुड़े हुए हैं और सप्लाई चेन किस तरह काम करती है।

रिएक्टर सिस्टम सुरक्षित, लेकिन खतरा खत्म नहीं

साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि अभी तक ऐसा कोई प्रमाण सामने नहीं आया है जिससे यह साबित हो कि परमाणु रिएक्टर के संचालन से जुड़े सिस्टम से किसी तरह की छेड़छाड़ हुई है। इसके बावजूद, लीक हुई जानकारी का इस्तेमाल भविष्य में सप्लाई चेन, कॉन्ट्रैक्टर नेटवर्क, डेटा सेंटर या अन्य सहायक इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाने के लिए किया जा सकता है।

CERT-In और NPCIL कर रहे जांच

सूत्रों के अनुसार, पूरे मामले की जांच भारतीय कंप्यूटर आपातकालीन प्रतिक्रिया दल (CERT-In) और न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (NPCIL) संयुक्त रूप से कर रहे हैं। योटा ने बताया कि 29 मई को एक सर्वर पर संदिग्ध गतिविधि का पता चला था और संभावित रैंसमवेयर हमले को रोक दिया गया था। बाद में रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर ने डेटा लीक के दावे की जानकारी साझा की। अब जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि वास्तव में कौन-सा डेटा प्रभावित हुआ, लीक हुए दस्तावेज कितने प्रामाणिक हैं और इससे राष्ट्रीय सुरक्षा पर क्या असर पड़ सकता है।

सरकार की ओर से आधिकारिक बयान का इंतजार

अब तक परमाणु ऊर्जा विभाग (Department of Atomic Energy) और प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) की ओर से इस मामले पर कोई सार्वजनिक बयान जारी नहीं किया गया है। वहीं, रैंसमवेयर ग्रुप World Leaks, जिसने पहले भी कई बड़ी कंपनियों को निशाना बनाने का दावा किया था, उसने इस मामले पर कोई अतिरिक्त जानकारी सार्वजनिक नहीं की है।

भारत में बढ़ रहे साइबर हमले

यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब भारत में महत्वपूर्ण सरकारी और औद्योगिक संस्थानों पर साइबर हमलों की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। साइबर सुरक्षा कंपनी Surfshark के आंकड़ों के अनुसार, पिछले वर्ष भारत में 2.89 करोड़ (28.9 मिलियन) अकाउंट डेटा उल्लंघन का शिकार हुए। वहीं एक हालिया उद्योग सर्वेक्षण में पाया गया कि 73% भारतीय संगठनों को यह तक पता नहीं होता कि उन पर कभी साइबर हमला हुआ है, जबकि 57% संस्थानों में बुनियादी साइबर सुरक्षा मानकों का पर्याप्त पालन नहीं किया जाता।

क्या है सबसे अहम बात?

फिलहाल इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि डार्क वेब पर दस्तावेज लीक होने का दावा किया गया है, लेकिन उनकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। साथ ही, अब तक ऐसा कोई प्रमाण सार्वजनिक नहीं है कि कुडनकुलम के चालू परमाणु रिएक्टरों के ऑपरेशनल सिस्टम से समझौता हुआ हो। जांच पूरी होने के बाद ही इस घटना की वास्तविक गंभीरता और प्रभाव स्पष्ट हो सकेगा।