90 लाख गुजारा भत्ता देकर ही तलाक! डॉक्टर को झारखंड हाई कोर्ट का बड़ा झटका, पत्नी-बच्चों के लिए तय रकम

झारखंड हाई कोर्ट ने डॉक्टर के वैवाहिक विवाद में तलाक मंजूर करते हुए पत्नी को 40 लाख और दोनों बच्चों को 25-25 लाख रुपये देने का आदेश दिया। कुल 90 लाख रुपये 12 महीने में चार किस्तों में देने होंगे।

90 लाख गुजारा भत्ता देकर ही तलाक! डॉक्टर को झारखंड हाई कोर्ट का बड़ा झटका, पत्नी-बच्चों के लिए तय रकम
झारखंड हाई कोर्ट का अहम फैसला।

Advertisement

     HighLights:

  • झारखंड हाई कोर्ट ने डॉक्टर और उनकी पत्नी के विवाह-विच्छेद को मंजूरी दी
  • पत्नी को 40 लाख और बेटे-बेटी को 25-25 लाख रुपये मिलेंगे
  • कुल 90 लाख रुपये का भुगतान 12 महीने में चार बराबर किस्तों में करना होगा
  • बच्चों की राशि राष्ट्रीयकृत बैंक में फिक्स्ड डिपॉजिट कराने का निर्देश

रांची (Threesocieties.com Desk): झारखंड हाई कोर्ट ने एक वैवाहिक विवाद में अहम फैसला सुनाते हुए तलाक की मंजूरी के साथ पत्नी और दो बच्चों के आर्थिक भविष्य को सुरक्षित करने के लिए कुल 90 लाख रुपये के स्थायी गुजारा भत्ते का आदेश दिया है। अदालत ने गढ़वा सदर अस्पताल में संविदा पर कार्यरत चिकित्सक डॉ. राकेश कुमार तरुण को पत्नी के लिए 40 लाख रुपये और दोनों बच्चों के लिए 25-25 लाख रुपये देने का निर्देश दिया है।

यह भी पढ़ें: झारखंड में छात्र आंदोलन पर गरमाई सियासत, कांग्रेस बोली- राहुल संवाद चाहते हैं, BJP चर्चा से भागी

जस्टिस एसएन प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि कुल 90 लाख रुपये की राशि का भुगतान 12 महीने के भीतर चार बराबर किस्तों में किया जाएगा। पहली किस्त अदालत के आदेश की तारीख से एक महीने के भीतर देनी होगी।

पत्नी को 40 लाख, बच्चों के लिए 50 लाख

अदालत के आदेश के मुताबिक पत्नी को 40 लाख रुपये स्थायी गुजारा भत्ता के तौर पर दिए जाएंगे। वहीं बेटे और बेटी के नाम 25-25 लाख रुपये राष्ट्रीयकृत बैंक में फिक्स्ड डिपॉजिट कराने का निर्देश दिया गया है। इस तरह पत्नी और दोनों बच्चों के लिए कुल आर्थिक सहायता 90 लाख रुपये तय की गई है। अदालत ने यह भी साफ किया कि बच्चों को मिलने वाली इस राशि से उनके उत्तराधिकार संबंधी अधिकार प्रभावित नहीं होंगे।

तलाक की याचिका फैमिली कोर्ट ने कर दी थी खारिज

मामला डॉ. राकेश कुमार तरुण की प्रथम अपील से जुड़ा है। डॉक्टर ने गढ़वा फैमिली कोर्ट के 19 फरवरी 2025 के फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। फैमिली कोर्ट ने उनकी तलाक याचिका खारिज करते हुए माना था कि पति अपनी पत्नी के खिलाफ लगाए गए क्रूरता के आरोपों को साबित नहीं कर सके। हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने शुरुआती दौर में साथ रहने की इच्छा भी जताई थी। इसके बाद अदालत ने मामले को झारखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकार (झालसा) के पास मध्यस्थता के लिए भेजा। हालांकि मध्यस्थता से विवाद का समाधान नहीं निकल सका।

एकमुश्त 40 लाख देने की पेशकश भी नहीं बनी बात

सुनवाई के दौरान 5 मई 2026 को पति की ओर से पत्नी को एकमुश्त 40 लाख रुपये देने और दोनों बच्चों की शिक्षा के साथ बेटी की शादी का खर्च उठाने की पेशकश की गई। हालांकि पत्नी ने इस प्रस्ताव को पर्याप्त नहीं माना। इसके बाद हाई कोर्ट ने स्थायी गुजारा भत्ता तय करने के लिए दोनों पक्षों से उनकी आय, संपत्ति और आर्थिक स्थिति से संबंधित हलफनामे दाखिल करने को कहा।

डॉक्टर की आय और पत्नी की आर्थिक स्थिति भी बनी आधार

अदालत को बताया गया कि पति गढ़वा सदर अस्पताल में संविदा चिकित्सक के तौर पर कार्यरत हैं। उनका सकल मासिक वेतन करीब 1,61,260 रुपये है। हालांकि ऋण की कटौती के बाद उनके हाथ में करीब 33,008 रुपये आते हैं। दूसरी ओर, पत्नी की ओर से अदालत को बताया गया कि उनकी कोई स्वतंत्र आय नहीं है और दोनों बच्चे पूरी तरह पति पर निर्भर हैं।

गुजारा भत्ता तय करने का कोई तय फॉर्मूला नहीं

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि गुजारा भत्ता निर्धारित करने के लिए कोई निश्चित गणितीय फार्मूला नहीं हो सकता। अदालत को प्रत्येक मामले की परिस्थितियों को देखते हुए फैसला करना होता है। इसके लिए पति-पत्नी की आय, संपत्ति, आर्थिक क्षमता, जरूरत, बच्चों की जिम्मेदारी, शिक्षा, भविष्य की आवश्यकताओं और परिवार के जीवन स्तर जैसे पहलुओं को ध्यान में रखना जरूरी है। अदालत ने माना कि इस मामले में पत्नी की स्वतंत्र आय नहीं है और दोनों बच्चों की पढ़ाई तथा भविष्य की जरूरतों को देखते हुए 90 लाख रुपये की कुल राशि उचित है।

समय पर पैसा नहीं मिला तो कोर्ट जा सकेगी पत्नी

हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि निर्धारित समय के भीतर गुजारा भत्ते की राशि का भुगतान नहीं किया जाता है, तो पत्नी कानून के अनुसार अदालत की शरण ले सकती है। अदालत ने फैमिली कोर्ट के पुराने फैसले को निरस्त करते हुए विवाह-विच्छेद को मंजूरी दे दी। हालांकि तलाक का आदेश तय गुजारा भत्ता के भुगतान की शर्त के अधीन रहेगा।

यह फैसला इस लिहाज से महत्वपूर्ण है कि अदालत ने तलाक के साथ पत्नी और बच्चों के आर्थिक भविष्य को भी ध्यान में रखा और पति की आर्थिक क्षमता तथा परिवार की जरूरतों के आधार पर स्थायी गुजारा भत्ता निर्धारित किया।