झारखंड: 6 CM के साथ मंत्री, अब सांसद… फिर भी जमीन पर बैठ सखुआ पत्तल में दाल-भात खाती दिखीं जोबा माझी
पश्चिमी सिंहभूम के लिगिर गांव में सांसद जोबा माझी और विधायक जगत माझी ग्रामीणों के साथ जमीन पर बैठकर सखुआ पत्तल में भोजन करते नजर आए। छह मुख्यमंत्रियों के साथ मंत्री रह चुकीं जोबा माझी की सादगी और जनता से जुड़ाव ने लोगों का दिल जीत लिया।
चाईबासा (Threesocieties.com Desk): राजनीति में ऊंचे पद पर पहुंचने के बाद अक्सर नेताओं की जीवनशैली बदल जाती है। भारी सुरक्षा, प्रोटोकॉल, वीआईपी संस्कृति और लोगों से दूरी आम बात मानी जाती है। लेकिन पश्चिमी सिंहभूम के सुदूरवर्ती लिगिर गांव से सामने आई एक तस्वीर इस धारणा को तोड़ती नजर आई। यहां सिंहभूम की सांसद जोबा माझी अपने विधायक बेटे जगत माझी के साथ ग्रामीणों के बीच जमीन पर बैठकर सखुआ पत्तल में दाल-भात खाते दिखीं। उनकी यह सादगी अब पूरे इलाके में चर्चा का विषय बनी हुई है।
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ग्रामीणों के साथ जमीन पर बैठकर किया भोजन
मामला पश्चिमी सिंहभूम जिले के गुदड़ी प्रखंड अंतर्गत लिगिर गांव का है। गांव में आयोजित दुलसुनुम कार्यक्रम में शामिल होने सांसद जोबा माझी अपने पुत्र और मनोहरपुर विधायक जगत माझी के साथ पहुंची थीं। कार्यक्रम समाप्त होने के बाद ग्रामीणों और अतिथियों के लिए सामूहिक भोजन की व्यवस्था की गई थी। गांव की परंपरा के अनुसार दरी बिछाकर जमीन पर बैठने और सखुआ पत्तल में भोजन परोसने की व्यवस्था थी। इसी दौरान सांसद और विधायक बिना किसी विशेष व्यवस्था की मांग किए सीधे ग्रामीणों के बीच जाकर बैठ गए। आयोजकों ने सखुआ पत्तल में दाल-भात और सब्जी परोसी और दोनों नेताओं ने ग्रामीणों के साथ बैठकर भोजन किया।
ग्रामीण हुए भावुक, सांसद ने दूर की झिझक
जब ग्रामीणों ने सांसद और विधायक को जमीन पर बैठकर भोजन करते देखा तो कई लोग असहज महसूस करने लगे। लोगों को लगा कि इतने बड़े पद पर बैठे नेता जमीन पर बैठकर भोजन कैसे कर सकते हैं। इस दौरान सांसद जोबा माझी ने खुद ग्रामीणों की झिझक दूर करते हुए कहा कि वे आंदोलनकारी और शहीद परिवार से आती हैं।
उन्होंने कहा कि राजनीति में चाहे व्यक्ति कितना भी बड़ा क्यों न बन जाए, अपनी मिट्टी और लोगों से जुड़ाव खत्म नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि जल, जंगल और जमीन की लड़ाई लड़ने वाले लोगों की वजह से ही वे आज इस मुकाम तक पहुंची हैं और जनता के बीच रहना ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है।
छह मुख्यमंत्रियों के साथ मंत्री रहीं, लेकिन नहीं बदली सादगी
जोबा माझी का राजनीतिक सफर संघर्षों से भरा रहा है। वे झारखंड की उन चुनिंदा नेताओं में गिनी जाती हैं जिन्होंने अलग-अलग छह मुख्यमंत्रियों के साथ मंत्री के रूप में काम किया। वर्ष 1995 से 2024 तक वे लगातार पांच बार मनोहरपुर विधानसभा सीट से विधायक चुनी गईं। पिछली सरकार में उन्होंने महिला, बाल विकास एवं सामाजिक सुरक्षा विभाग की जिम्मेदारी संभाली और 2024 में सिंहभूम लोकसभा सीट से सांसद बनीं। इतना लंबा राजनीतिक सफर तय करने के बावजूद उनकी जीवनशैली में बड़ा बदलाव नहीं आया।
सब्जी बेचने से सांसद बनने तक का संघर्ष
जोबा माझी के जीवन की कहानी संघर्षों से भरी हुई है। उनके पति देवेंद्र माझी आदिवासी और ग्रामीण समाज के अधिकारों के लिए संघर्ष करते रहे। सारंडा-पोड़ाहाट क्षेत्र में जल, जंगल और जमीन की लड़ाई लड़ते हुए वे शहीद हो गए। उस दौर में जब उनके पति विधायक थे, तब भी जोबा माझी चक्रधरपुर के इतवारी बाजार में सब्जी बेचकर परिवार चलाने में योगदान देती थीं। आज सांसद बनने के बाद भी वे खेती-बाड़ी से जुड़ी हुई हैं और घरेलू कामकाज में सक्रिय रहती हैं।
सोशल मीडिया की चमक से दूर
आज के दौर में अधिकांश नेता छोटी-बड़ी गतिविधियों को सोशल मीडिया पर साझा कर सुर्खियां बटोरने की कोशिश करते हैं। लेकिन जोबा माझी इससे बिल्कुल अलग नजर आती हैं। ग्रामीणों और स्थानीय लोगों का कहना है कि यह कोई पीआर स्टंट नहीं था। उन्हें शायद यह भी अंदाजा नहीं था कि कोई उनका वीडियो रिकॉर्ड कर रहा है। यही वजह है कि यह दृश्य लोगों को और ज्यादा प्रभावित कर रहा है।
ग्रामीणों ने कहा— ऐसे नेता अब कम दिखते हैं
ग्रामीणों ने सांसद और विधायक के व्यवहार की खुलकर सराहना की। लोगों ने कहा कि आज ज्यादातर नेता जनता से दूरी बनाकर रखते हैं, लेकिन जोबा माझी और जगत माझी लगातार गांवों में जाकर लोगों के बीच बैठते हैं और उनकी समस्याएं सुनते हैं।ग्रामीणों का कहना है कि जमीन पर बैठकर भोजन करना सिर्फ सादगी नहीं, बल्कि लोगों के प्रति सम्मान और अपनापन भी दर्शाता है। यही वजह है कि लिगिर गांव की यह तस्वीर अब पूरे इलाके में चर्चा का विषय बनी हुई है।
सादगी ही बनी पहचान
जोबा माझी की पहचान एक ऐसी जनप्रतिनिधि के रूप में बनी है जो आज भी गांव, खेत और लोगों से जुड़ी हुई हैं। लिगिर गांव में जमीन पर बैठकर भोजन करने की घटना ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि राजनीति में बड़ा पद मिलने के बाद भी जमीन से जुड़े रहना संभव है— और शायद यही वजह है कि लोग उन्हें सिर्फ नेता नहीं, बल्कि अपना मानते हैं।






