भागलपुर: जलेबी बेचने वाला कैसे बना सुल्तानगंज का सबसे बड़ा डॉन, रामधनी यादव की पूरी क्राइम कुंडली

भागलपुर के सुल्तानगंज में कभी दहशत का दूसरा नाम रहे रामधनी यादव की कहानी जलेबी बेचने से शुरू होकर हत्या, रंगदारी, राजनीति और पुलिस मुठभेड़ तक पहुंची। जानिए कैसे एक साधारण व्यक्ति अपराध और सत्ता का बड़ा चेहरा बन गया।

भागलपुर: जलेबी बेचने वाला कैसे बना सुल्तानगंज का सबसे बड़ा डॉन, रामधनी यादव की पूरी क्राइम कुंडली
रामधनी यादव (फाइल फोटो)।

भागलपुर (Threesocieties.com Desk): भागलपुर के सुल्तानगंज और आसपास के इलाकों में कभी खौफ का दूसरा नाम रहे रामधनी यादव की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। एक समय दिलगौरी मोड़ पर जलेबी बेचकर परिवार चलाने वाला यह व्यक्ति बाद में हत्या, रंगदारी, चौथ वसूली, ठेकेदारी और नगर परिषद की राजनीति का सबसे प्रभावशाली चेहरा बन गया। पुलिस मुठभेड़ में उसकी मौत के बाद एक बार फिर उसकी पूरी अपराध गाथा चर्चा में है।

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रामधनी यादव की जिंदगी गरीबी, संघर्ष, अपमान, अपराध, सत्ता और खूनी संघर्षों से भरी रही। उसकी कहानी यह भी बताती है कि कैसे गलत दिशा में उठाया गया एक कदम पूरे जीवन की दिशा बदल देता है।

जलेबी की दुकान से शुरू हुआ सफर

रामधनी यादव की शुरुआती जिंदगी बेहद साधारण थी। वह सुल्तानगंज के दिलगौरी मोड़ पर जलेबी बेचकर अपने परिवार का भरण-पोषण करता था। उसकी पत्नी नीलम देवी भी दुकान में उसका हाथ बंटाती थीं। कहा जाता है कि परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर थी। कभी कुट्टी बेचकर और छोटे-मोटे काम करके जीवन चलाने वाला रामधनी मेहनत के दम पर आगे बढ़ना चाहता था। लेकिन हालात और आसपास का माहौल धीरे-धीरे उसे दूसरी दिशा में ले गया। बाद में यही नीलम देवी नगर परिषद की उप सभापति बनीं और परिवार का राजनीतिक प्रभाव भी तेजी से बढ़ा।

पहली चोरी, सार्वजनिक अपमान और अपराध की शुरुआत

स्थानीय लोगों के अनुसार, घाट, बस स्टैंड, जमीन कारोबार और वसूली की दुनिया को देखकर रामधनी का भरोसा मेहनत की कमाई से उठने लगा। इसी दौरान उसने पहली बड़ी चोरी की, लेकिन वह पकड़ लिया गया। उस समय उसे ‘चोर’ लिखी तख्ती पहनाकर पूरे सुल्तानगंज में घुमाया गया। यह सार्वजनिक अपमान उसके जीवन का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ। बताया जाता है कि इसी घटना के बाद उसने तय कर लिया कि अब वह डरकर नहीं, बल्कि डर पैदा करके जिएगा। यहीं से उसकी एंट्री अपराध की दुनिया में हुई।

हत्या, रंगदारी और चौथ वसूली से बना दबदबा

पहली घटना के बाद रामधनी ने तेजी से अपराध की दुनिया में अपनी पहचान बनानी शुरू की। हत्या, रंगदारी, चौथ वसूली और जमीन कब्जे जैसे मामलों में उसका नाम लगातार सामने आने लगा। धीरे-धीरे उसने इतना प्रभाव बना लिया कि सुल्तानगंज के शहरी क्षेत्र, घाटों, बस स्टैंड, सैरात, पार्किंग और ठेकेदारी व्यवस्था पर उसकी मजबूत पकड़ बन गई। उस दौर में रंजीत यादव उर्फ कनबुच्चा, मांगन यादव, बैरागी यादव और प्रदीप यादव जैसे कई दबंग अलग-अलग इलाकों में सक्रिय थे, लेकिन रामधनी ने धीरे-धीरे अपना अलग वर्चस्व कायम कर लिया।

खून-खराबे से बढ़ी दहशत

रामधनी यादव का नाम कई चर्चित हत्याओं और हमलों से जुड़ा रहा। बताया जाता है कि वर्ष 2000 के नवंबर महीने में उसने दिनदहाड़े एक व्यवसायी की हत्या कर दी थी। हत्या के बाद वह खून से सनी तलवार लेकर सीधे थाने पहुंच गया था। इस घटना ने पूरे इलाके को हिला दिया था। इसके बाद उसने अपने करीबी माने जाने वाले मुकेश यादव की भी हत्या कर दी। सुल्तानगंज थाने के सामने एक पंजाबी ड्राइवर को गोली मारने की घटना ने उसके आतंक को और बढ़ा दिया। इन घटनाओं के बाद पुलिस और आम लोगों के बीच उसका नाम डर का पर्याय बन गया।

नगर परिषद की सत्ता पर कब्जा

अपराध के साथ-साथ रामधनी ने राजनीति में भी गहरी पैठ बना ली। उसने नगर परिषद की सत्ता पर प्रभाव जमाना शुरू किया। उसने रंजीत यादव उर्फ कनबुच्चा की पत्नी दयावती देवी को सभापति पद से हटवाकर अपने समर्थित वार्ड सदस्यों के जरिए कुर्सी पर कब्जा कर लिया। इसके बाद नगर परिषद के ठेके, घाटों की बंदोबस्ती, पार्किंग व्यवस्था और अन्य आर्थिक स्रोतों पर उसका नियंत्रण मजबूत हो गया। स्थानीय लोग बताते हैं कि बड़े भू-माफिया और कारोबारी भी उसके घर पर हाजिरी लगाने पहुंचते थे।

परिवार की राजनीति में एंट्री

रामधनी यादव ने अपने बेटे को भी राजनीति में आगे बढ़ाया। उसका बेटा बाद में लोजपा (रामविलास) का पदाधिकारी बना। इससे उसका राजनीतिक प्रभाव और मजबूत हुआ, लेकिन इसी दौरान नए राजनीतिक चेहरों की एंट्री ने उसके वर्चस्व को चुनौती देना शुरू कर दिया।राजकुमार साह उर्फ गुड्डू ने कनबुच्चा यादव के साथ मिलकर चुनावी रणनीति बनाई और रामधनी को पराजित कर सभापति पद पर कब्जा कर लिया। यहीं से राजनीतिक संघर्ष खुली दुश्मनी में बदल गया।

हमले, बदला और खूनी संघर्ष

23 फरवरी 2023 को रामधनी यादव पर जानलेवा हमला हुआ। इस हमले में उसने राजकुमार साह और कनबुच्चा यादव पर आरोप लगाए। इसके बाद 5 नवंबर 2023 को कनबुच्चा और उनकी पत्नी पर हमला हुआ, जिसमें आरोप फिर रामधनी यादव पर लगा। इलाके में घात-प्रतिघात, जवाबी हमला और बदले की राजनीति लगातार जारी रही। हर घटना के बाद तनाव और गहरा होता गया।

पुलिस मुठभेड़ में हुआ अंत

लगातार बढ़ते अपराध, राजनीतिक संघर्ष और दुश्मनी ने आखिरकार रामधनी यादव की कहानी को पुलिस मुठभेड़ तक पहुंचा दिया।जिस व्यक्ति ने कभी जलेबी बेचकर जीवन की शुरुआत की थी, वही बाद में सुल्तानगंज और आसपास के इलाकों में दहशत का सबसे बड़ा नाम बन गया। उसकी मौत के बाद भी लोग उसकी कहानी को एक चेतावनी की तरह याद कर रहे हैं—कि मेहनत से शुरू हुई जिंदगी कैसे अपराध, सत्ता की भूख और हिंसा के रास्ते विनाश तक पहुंच सकती है। रामधनी यादव की कहानी सिर्फ एक अपराधी की कहानी नहीं, बल्कि उस सामाजिक विफलता की भी कहानी है जहां एक साधारण इंसान हालात, अपमान और लालच के बीच गलत रास्ता चुन लेता है।