AITUC से BJP तक! ढुलू महतो के सहारे अशोक मंडल की सियासी वापसी, धनबाद में तेज हुई नई राजनीतिक हलचल
धनबाद की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। निरसा के पूर्व JLKM प्रत्याशी अशोक मंडल 3 मई को सांसद ढुलू महतो की मौजूदगी में AITUC से संबद्ध यूनाइटेड कोल वर्कर्स यूनियन में शामिल होंगे। इसे भाजपा में उनकी संभावित वापसी की रणनीति माना जा रहा है।
- निरसा के पूर्व JLKM प्रत्याशी 3 मई को यूनाइटेड कोल वर्कर्स यूनियन में होंगे शामिल
- सांसद ढुलू महतो की मौजूदगी ने बढ़ाई सियासी अटकलें
- ढुलू महतो के साथ अशोक मंडल की BJP वापसी की चर्चा तेज
धनबाद (Threesocieties.com Desk) : कोयलांचल की राजनीति में एक नई सियासी बिसात बिछती नजर आ रही है। निरसा के चर्चित नेता और पूर्व JLKM प्रत्याशी अशोक मंडल 3 मई को धनबाद के भाजपा सांसद ढुलू महतो की उपस्थिति में All India Trade Union Congress (AITUC) से संबद्ध यूनाइटेड कोल वर्कर्स यूनियन (UCWU) में शामिल होने जा रहे हैं। इस घटनाक्रम ने धनबाद और खासकर निरसा की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है।
राजनीतिक गलियारों में इसे केवल यूनियन की सदस्यता नहीं, बल्कि भाजपा में संभावित वापसी की रणनीतिक शुरुआत माना जा रहा है। सांसद ढुलू महतो की सक्रिय भूमिका ने इस चर्चा को और भी तेज कर दिया है।
गुरुद्वारा का कार्यक्रम बना राजनीतिक संदेश
निरसा के गुरुद्वारा में 3 मई को आयोजित होने वाला यह कार्यक्रम सामान्य संगठनात्मक गतिविधि से कहीं अधिक महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यूनाइटेड कोल वर्कर्स यूनियन में अशोक मंडल का शामिल होना मजदूर राजनीति के जरिए मुख्यधारा की राजनीति में पुनः मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि कोयलांचल क्षेत्र में यूनियन की राजनीति हमेशा से विधानसभा और लोकसभा चुनावों पर प्रभाव डालती रही है। ऐसे में यह कदम आने वाले चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकता है।
ढुलू महतो की रणनीति के गहरे मायने
2024 के लोकसभा चुनाव में जीत दर्ज करने के बाद सांसद ढुलू महतो लगातार अपने राजनीतिक प्रभाव को मजबूत करने में लगे हैं। क्षेत्र में संगठनात्मक मजबूती और नए प्रभावशाली चेहरों को साथ जोड़ना उनकी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। अशोक मंडल जैसे पुराने और जमीनी नेता को साथ लाना भाजपा के लिए निरसा और आसपास के क्षेत्रों में राजनीतिक संतुलन मजबूत करने वाला कदम हो सकता है। यही वजह है कि इस पूरे घटनाक्रम को ढुलू महतो की बड़ी राजनीतिक चाल के रूप में देखा जा रहा है।
भाजपा से झामुमो, फिर JLKM तक का सफर
अशोक मंडल का राजनीतिक सफर काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है। वर्ष 2000 से 2011 तक वे भाजपा में सक्रिय रहे और संगठन को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने जिलाध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पद भी संभाले। इसके बाद उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) का दामन थामा और निरसा विधानसभा की राजनीति में अपनी मजबूत मौजूदगी बनाए रखी। हालांकि चुनावी सफलता स्थायी रूप से उनके पक्ष में नहीं रही, लेकिन क्षेत्र में उनका जनाधार लगातार प्रभावशाली बना रहा। 2024 के विधानसभा चुनाव में जब झामुमो ने निरसा सीट भाकपा माले के लिए छोड़ी, तब अशोक मंडल ने JLKM के टिकट पर चुनाव लड़ा। हालांकि उन्हें हार का सामना करना पड़ा, लेकिन उनकी सक्रियता कम नहीं हुई।
मजदूर राजनीति से मुख्यधारा की वापसी की तैयारी
अब AITUC से जुड़ी यूनियन में शामिल होने के फैसले को अशोक मंडल की नई राजनीतिक रणनीति माना जा रहा है। मजदूर राजनीति के जरिए जनाधार मजबूत करना और फिर मुख्यधारा की राजनीति में वापसी करना झारखंड की राजनीति में कोई नई बात नहीं है।विश्लेषकों का मानना है कि यूनियन की ताकत के सहारे वे निरसा और कोयलांचल क्षेत्र में फिर से अपनी पकड़ मजबूत करना चाहते हैं। यह भविष्य में भाजपा में औपचारिक वापसी का रास्ता भी खोल सकता है।
बैकडोर एंट्री की चर्चा तेज
राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि यह जुड़ाव केवल यूनियन तक सीमित नहीं रहेगा। सांसद ढुलू महतो की मौजूदगी और उनकी सक्रिय भूमिका ने यह संकेत दिया है कि आने वाले समय में अशोक मंडल भाजपा के और करीब आ सकते हैं।यानी AITUC के मंच से शुरू हुई यह राजनीतिक यात्रा भाजपा में बैकडोर एंट्री की तैयारी भी हो सकती है। यदि ऐसा होता है, तो धनबाद और निरसा की राजनीति में नए समीकरण बनना तय माना जा रहा है।
आने वाले दिनों में बदल सकते हैं समीकरण
कोयलांचल की राजनीति में यूनियन, जातीय समीकरण, स्थानीय नेतृत्व और संगठनात्मक पकड़—इन सभी का गहरा प्रभाव रहता है। अशोक मंडल का यह कदम सिर्फ व्यक्तिगत राजनीतिक पुनर्स्थापना नहीं, बल्कि क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को प्रभावित करने वाला निर्णय साबित हो सकता है। अब सबकी नजर 3 मई के कार्यक्रम पर टिकी है, जहां से धनबाद की राजनीति को नई दिशा मिल सकती है।






