दिशोम गुरु को राष्ट्र का नमन: शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्म भूषण, पत्नी रूपी सोरेन ने ग्रहण किया सम्मान

झारखंड आंदोलन के महानायक और पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्म भूषण सम्मान से नवाजा गया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने राष्ट्रपति भवन में उनकी पत्नी रूपी सोरेन को यह सम्मान प्रदान किया। पढ़ें दिशोम गुरु के संघर्ष, राजनीति और जनसेवा की प्रेरणादायक कहानी।

दिशोम गुरु को राष्ट्र का नमन: शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्म भूषण, पत्नी रूपी सोरेन ने ग्रहण किया सम्मान
शिबू सोरेन की संघर्षगाथा को मिला पद्म भूषण का गौरव।

     HighLights

  • झारखंड आंदोलन के प्रमुख नेता शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्म भूषण सम्मान।
  • राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने पत्नी रूपी सोरेन को प्रदान किया पुरस्कार
  • व्हीलचेयर पर मंच तक पहुंचीं रूपी सोरेन, भावुक हुआ समारोह
  • आदिवासियों, वंचितों और झारखंड की पहचान के लिए दशकों तक किया संघर्ष
  • झामुमो के संस्थापक नेताओं में रहे शिबू सोरेन तीन बार बने झारखंड के मुख्यमंत्री
  • नेमरा गांव से शुरू हुई यात्रा देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान तक पहुंची

नई दिल्ली/रांची(Threesocieties.com Desk): झारखंड की राजनीति, आदिवासी अस्मिता और जनसंघर्ष की पहचान बन चुके ‘दिशोम गुरु’ शिबू सोरेन को मरणोपरांत देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। राष्ट्रपति भवन में आयोजित भव्य समारोह में राष्ट्रपति Droupadi Murmu ने यह सम्मान उनकी पत्नी रूपी सोरेन को प्रदान किया। यह पल न केवल सोरेन परिवार बल्कि पूरे झारखंड के लिए गर्व और भावनाओं से भरा हुआ था।

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व्हीलचेयर पर बैठकर मंच तक पहुंचीं रूपी सोरेन ने राष्ट्रपति से यह प्रतिष्ठित सम्मान ग्रहण किया। समारोह के दौरान झारखंड की विधायक और शिबू सोरेन की बहू Kalpana Soren सहित परिवार के अन्य सदस्य भी मौजूद रहे। सम्मान ग्रहण करते समय पूरे सभागार में तालियों की गूंज सुनाई दी।

आदिवासी अधिकारों की लड़ाई का राष्ट्रीय सम्मान

शिबू सोरेन को यह सम्मान लोक कार्य (Public Affairs) के क्षेत्र में उनके ऐतिहासिक योगदान, आदिवासियों के अधिकारों की लड़ाई और झारखंड राज्य निर्माण आंदोलन में उनकी निर्णायक भूमिका के लिए दिया गया है। उन्होंने अपना पूरा जीवन वंचित, शोषित और आदिवासी समाज की आवाज बुलंद करने में समर्पित कर दिया। उनके समर्थक उन्हें केवल राजनेता नहीं बल्कि “दिशोम गुरु” यानी जनता का मार्गदर्शक मानते रहे हैं। पद्म भूषण सम्मान उनके दशकों लंबे संघर्ष और जनसेवा को राष्ट्र की औपचारिक श्रद्धांजलि माना जा रहा है।

नेमरा गांव से शुरू हुआ संघर्ष

11 जनवरी 1944 को रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में जन्मे शिबू सोरेन का बचपन संघर्षों से भरा रहा। उनके पिता सोबरन सोरेन शिक्षक और गांधीवादी विचारधारा के समर्थक थे। महाजनों और शोषण के खिलाफ आवाज उठाने के कारण 1957 में उनके पिता की हत्या कर दी गई। इस घटना ने किशोर शिबू सोरेन के जीवन की दिशा बदल दी। उन्होंने पढ़ाई छोड़कर अन्याय और शोषण के खिलाफ संघर्ष का रास्ता चुना और आदिवासी समाज को संगठित करने का अभियान शुरू किया।

महाजनों के खिलाफ आंदोलन से बनी पहचान

युवा अवस्था में उन्होंने संताल नवयुवक संघ और सोनोत संताल समाज जैसे संगठनों का निर्माण किया। धनकटनी आंदोलन के जरिए आदिवासियों के अधिकारों की लड़ाई को नई दिशा मिली। इसी दौर में उनकी मुलाकात Vinod Bihari Mahato और A. K. Roy जैसे नेताओं से हुई। टुंडी, गोला और पारसनाथ क्षेत्र उनके आंदोलन के प्रमुख केंद्र बने, जहां उन्होंने सामाजिक जागरूकता और अधिकारों की लड़ाई को जनआंदोलन का स्वरूप दिया।

झारखंड आंदोलन के महानायक

साल 1973 में शिबू सोरेन ने विनोद बिहारी महतो और ए.के. राय के साथ मिलकर Jharkhand Mukti Morcha (झामुमो) की स्थापना की। अलग झारखंड राज्य की मांग को लेकर शुरू हुआ आंदोलन धीरे-धीरे पूरे क्षेत्र की पहचान बन गया।करीब तीन दशक तक चले संघर्ष के बाद 15 नवंबर 2000 को झारखंड राज्य का गठन हुआ। इस उपलब्धि में शिबू सोरेन की भूमिका को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।

सांसद से मुख्यमंत्री तक का सफर

1980 में पहली बार दुमका से लोकसभा सांसद चुने गए शिबू सोरेन कई बार संसद पहुंचे और राष्ट्रीय राजनीति में अपनी मजबूत पहचान बनाई। उन्होंने तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री के रूप में राज्य का नेतृत्व किया।राजनीतिक उतार-चढ़ाव, चुनावी हार-जीत और गठबंधन की चुनौतियों के बावजूद उनकी लोकप्रियता बनी रही। 2014 में देशभर में भाजपा लहर के बावजूद उन्होंने दुमका से जीत दर्ज कर अपनी राजनीतिक ताकत का परिचय दिया।

लंबी बीमारी के बाद हुआ निधन

लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे शिबू सोरेन का 4 अगस्त 2025 को नई दिल्ली के अस्पताल में 81 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनके निधन को झारखंड की राजनीति और आदिवासी आंदोलन के एक युग के अंत के रूप में देखा गया।हालांकि, उनका संघर्ष, विचार और जनसेवा की विरासत आज भी झारखंड की राजनीति और समाज को दिशा दे रही है।

संघर्ष से सम्मान तक की अमर यात्रा

नेमरा गांव के एक साधारण परिवार से निकलकर देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण तक पहुंचने की यात्रा भारतीय लोकतंत्र में जनआंदोलन की ताकत का प्रतीक है। शिबू सोरेन ने साबित किया कि जनता के अधिकारों के लिए किया गया संघर्ष इतिहास में अमर हो जाता है।आज पद्म भूषण सम्मान के साथ राष्ट्र ने उस जननायक को नमन किया है, जिसने अपना पूरा जीवन झारखंड, आदिवासियों और वंचित समाज की आवाज बनने में समर्पित कर दिया। उनके समर्थकों के लिए वह हमेशा “दिशोम गुरु” रहेंगे और आने वाली पीढ़ियों के लिए संघर्ष, साहस और जनसेवा की प्रेरणा बने रहेंगे।