लोक सेवकों पर आरोप अब हल्के में नहीं! शिकायत से पहले शपथ पत्र जरूरी, सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

लोक सेवकों के खिलाफ शिकायत दर्ज करने से पहले शपथ पत्र अनिवार्य होगा। झूठे आरोपों पर अंकुश लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, जानिए पूरी जानकारी।

लोक सेवकों पर आरोप अब हल्के में नहीं! शिकायत से पहले शपथ पत्र जरूरी, सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
मजिस्ट्रेट को शिकायतें खारिज करने का अधिकार।

नई दिल्ली । (Threesocieties.com Desk) : सुप्रीम कोर्ट ने लोक सेवकों के खिलाफ झूठे और दुर्भावनापूर्ण आरोपों पर लगाम लगाने के उद्देश्य से एक अहम फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि अब किसी भी लोक सेवक के खिलाफ उसके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान अपराध का आरोप लगाने के लिए शिकायतकर्ता को शपथ पत्र (Affidavit) देना अनिवार्य होगा।

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यह महत्वपूर्ण निर्णय जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने सुनाया। कोर्ट ने कहा कि शपथ पत्र की अनिवार्यता का उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकना और लोक सेवकों को बेबुनियाद शिकायतों से बचाना है।

 न्यायिक अधिकारियों और लोक सेवकों पर समान मानक

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में चीफ जस्टिस द्वारा पूर्व में सभी हाईकोर्ट को भेजे गए एक संचार का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ शिकायत तभी स्वीकार की जाए जब वह शपथ पत्र द्वारा समर्थित हो। पीठ ने कहा कि जब न्यायिक अधिकारियों के लिए यह शर्त लागू है, तो लोक सेवकों के मामलों में इससे अलग रवैया अपनाने का कोई तर्कसंगत आधार नहीं है।

कोर्ट ने टिप्पणी की— “शपथ पत्र की मांग का उद्देश्य समान है— झूठी, उत्पीड़नकारी और निराधार शिकायतों को छांटना तथा कानून के दायरे में जवाबदेही और संरक्षण के बीच संतुलन बनाना।”

 झूठे आरोपों पर कसेगा शिकंजा

इस फैसले को भ्रष्टाचार और फर्जी शिकायतों के खिलाफ एक बड़ा कदम माना जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बिना ठोस आधार के लगाए गए आरोप न केवल प्रशासनिक व्यवस्था को प्रभावित करते हैं, बल्कि न्यायिक समय और संसाधनों की भी बर्बादी करते हैं।

 मजिस्ट्रेट को मिली बड़ी शक्ति

सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 175(3) का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि मजिस्ट्रेट के पास यह अधिकार होगा कि वह—

पूरी तरह निराधार

स्पष्ट रूप से बेतुके

या अत्यंत असंभव आरोपों वाली

शिकायतों को प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज कर सके।

हालांकि, कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी कि ऐसी शक्ति का प्रयोग मनमाने ढंग से नहीं, बल्कि ठोस और वैध कारणों के आधार पर ही किया जाना चाहिए।

 केरल हाईकोर्ट के आदेश से जुड़ा मामला

यह फैसला केरल हाईकोर्ट के एक आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान आया। मामला तीन पुलिस अधिकारियों के खिलाफ एक महिला द्वारा लगाए गए कथित यौन शोषण के आरोप से जुड़ा था, जिसमें प्राथमिकी दर्ज करने का प्रश्न था।

 अब आरोप लगाने से पहले जिम्मेदारी तय

इस फैसले के बाद अब किसी भी सरकारी अधिकारी या लोक सेवक पर आरोप लगाने से पहले शिकायतकर्ता को शपथ पत्र के जरिए अपने आरोपों की कानूनी जिम्मेदारी लेनी होगी। विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला ईमानदार अधिकारियों को राहत देगा, वहीं झूठे आरोप लगाने वालों के लिए कड़ा संदेश है।