झारखंड HC का बड़ा फैसला: पुलिस-जेल कस्टडी में मौत या रेप पर अब ज्यूडिशियल जांच अनिवार्य
झारखंड हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए पुलिस और जेल कस्टडी में मौत या रेप के हर मामले में ज्यूडिशियल इंक्वायरी अनिवार्य कर दी है। कोर्ट ने 250 मामलों में जांच नहीं होने पर जिला जजों से रिपोर्ट मांगी और झालसा को NHRC गाइडलाइन के तहत SOP तैयार करने का निर्देश दिया।
- हिरासत मौत मामलों में NHRC गाइडलाइन लागू करने का निर्देश
- 500 हिरासत मौतों पर हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी
- 250 मामलों में नहीं हुई Judicial Inquiry
- HC ने SOP बनाने का दिया आदेश
रांची (Threesocieties.com Desk): झारखंड हाईकोर्ट ने पुलिस और जेल हिरासत में होने वाली मौतों (Custodial Death) और रेप मामलों को लेकर ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने स्पष्ट कर दिया है कि अब राज्य में पुलिस कस्टडी या जेल कस्टडी में मौत अथवा रेप के हर मामले में न्यायिक जांच (Judicial Inquiry) कराना अनिवार्य होगा।
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चीफ जस्टिस एमएस सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने यह आदेश जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। कोर्ट ने कहा कि यह प्रक्रिया CRPC की धारा 176(1-A) और BNSS की धारा 196(2) के तहत अनिवार्य है।
250 मामलों में नहीं हुई न्यायिक जांच, HC ने मांगी रिपोर्ट
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने कोर्ट को बताया कि वर्ष 2018 से 2025 के बीच पुलिस और जेल हिरासत में करीब 500 मौतें हुईं। इनमें लगभग आधे मामलों में ज्यूडिशियल इंक्वायरी नहीं कराई गई। इस पर हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए उन करीब 250 मामलों में जिला जजों को कारण बताते हुए हाईकोर्ट में रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है, जिनमें न्यायिक जांच नहीं हुई।
पहले एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट करते थे जांच
अब तक झारखंड में हिरासत में मौत या रेप मामलों की जांच अक्सर एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट से कराई जाती थी। सरकार इसे पर्याप्त मानती थी। लेकिन हाईकोर्ट ने साफ कहा कि ऐसे मामलों में केवल न्यायिक जांच ही मान्य होगी। कोर्ट के इस आदेश के बाद अब पुलिस या जेल प्रशासन के लिए ऐसे मामलों में औपचारिक जांच से बचना आसान नहीं होगा।
NHRC गाइडलाइन के तहत SOP बनाने का निर्देश
हाईकोर्ट ने झारखंड लीगल सर्विस अथॉरिटी (झालसा) को निर्देश दिया है कि वह राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) की गाइडलाइन के अनुसार स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) तैयार करे। इस SOP का उद्देश्य हिरासत में मौत या रेप मामलों की जांच को पारदर्शी, निष्पक्ष और जवाबदेह बनाना है। कोर्ट ने कहा कि जांच प्रक्रिया में NHRC की गाइडलाइन का सख्ती से पालन होना चाहिए।
गृह सचिव से कोर्ट ने मांगा था जवाब
इस मामले में पूर्व में गृह सचिव ने शपथ पत्र दाखिल कर बताया था कि 2018 से 2025 के बीच सैकड़ों कस्टोडियल डेथ हुई हैं। इसके बाद हाईकोर्ट ने सरकार से पूछा था कि क्या हर मामले में न्यायिक जांच कराई गई थी और क्या NHRC के दिशा-निर्देशों का पालन हुआ था। कोर्ट ने सरकार को विस्तृत जानकारी शपथ पत्र के माध्यम से देने का निर्देश दिया था।
अधिवक्ता शादाब अंसारी ने रखा पक्ष
जनहित याचिका में प्रार्थी मोहम्मद मुमताज अंसारी की ओर से अधिवक्ता शादाब अंसारी ने पक्ष रखा। उन्होंने कोर्ट के समक्ष सुप्रीम कोर्ट के कई फैसले, NHRC गाइडलाइन और BNSS की धारा 196(2) का हवाला देते हुए न्यायिक जांच अनिवार्य करने की मांग की थी।
मानवाधिकार और जवाबदेही की दिशा में बड़ा कदम
कानूनी जानकारों के मुताबिक झारखंड हाईकोर्ट का यह फैसला मानवाधिकार संरक्षण और पुलिस-जेल प्रशासन की जवाबदेही तय करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। इससे भविष्य में हिरासत में होने वाली संदिग्ध मौतों और अत्याचार के मामलों में पारदर्शिता बढ़ने की उम्मीद है।






