झारखंड: हाईकोर्ट में पुलिस को बड़ा झटका, रिटायर्ड SI पर दंडात्मक कार्रवाई रद्द रखने के आदेश पर डबल बेंच की मुहर
झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य पुलिस की अपील खारिज करते हुए रिटायर्ड सब-इंस्पेक्टर उमेश कुमार सिंह के खिलाफ विभागीय दंड को रद्द रखने का फैसला बरकरार रखा। कोर्ट ने जांच प्रक्रिया को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध और गंभीर प्रक्रियागत खामियों से ग्रस्त माना।
HighLights:
- राज्य पुलिस की अपील को झारखंड हाईकोर्ट की खंडपीठ ने किया खारिज।
- रिटायर्ड सब-इंस्पेक्टर उमेश कुमार सिंह को मिली राहत बरकरार।
- अदालत ने विभागीय जांच को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ माना।
- जांच के दौरान किसी भी गवाह का बयान दर्ज नहीं किया गया था।
- शिकायतकर्ता को भी जांच अधिकारी के सामने पेश नहीं किया गया।
रांची (Threesocieties.com Desk): झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य पुलिस को बड़ा झटका देते हुए उसकी ओर से दायर अपील को खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि एक सेवानिवृत्त सब-इंस्पेक्टर के खिलाफ चलायी गई विभागीय कार्यवाही प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत थी और गंभीर प्रक्रियागत खामियों से ग्रस्त थी। इसी आधार पर अदालत ने पहले दिए गए राहत के आदेश को बरकरार रखा।
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मामले की सुनवाई करते हुए एम.एस. सोनाक और राजेश शंकर की खंडपीठ ने एकल पीठ के फैसले को सही ठहराया और राज्य सरकार की अपील को खारिज कर दिया।
एकल पीठ के फैसले पर खंडपीठ की मुहर
खंडपीठ ने उस आदेश को बरकरार रखा जिसमें तत्कालीन सब-इंस्पेक्टर उमेश कुमार सिंह पर लगाए गए अनुशासनात्मक दंड को रद्द कर दिया गया था। उमेश कुमार सिंह वर्ष 1989 में सीधे सब-इंस्पेक्टर के पद पर नियुक्त हुए थे और लंबे समय तक पुलिस सेवा में रहे।
2010 में लगे थे रिश्वत लेने के आरोप
मामला वर्ष 2010 का है, जब उमेश कुमार सिंह चाईबासा के मुफस्सिल थाना प्रभारी के रूप में कार्यरत थे। आरोप था कि एक आपराधिक मामले में जब्त किए गए ट्रकों को छोड़ने के बदले उन्होंने रिश्वत की मांग की थी। शिकायत मिलने के बाद उनके खिलाफ विभागीय जांच शुरू की गई। जांच के बाद विभागीय प्राधिकारी ने उनकी एक वार्षिक वेतन वृद्धि रोकने का आदेश दिया। साथ ही निलंबन अवधि के दौरान उन्हें निर्वाह भत्ते के अतिरिक्त अन्य वेतन लाभ देने से भी इनकार कर दिया गया। विभागीय अपील में भी उन्हें राहत नहीं मिली।
हाईकोर्ट पहुंचा मामला, 2024 में मिला था राहत का आदेश
इसके बाद उमेश कुमार सिंह ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मई 2024 में हाईकोर्ट की एकल पीठ ने विभागीय दंड को रद्द करते हुए जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाए थे। इस फैसले को राज्य सरकार ने खंडपीठ में चुनौती दी थी।सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि संबंधित अधिकारी ने जांच में हिस्सा नहीं लिया था, इसलिए उन्हें किसी प्रकार का नुकसान नहीं हुआ। लेकिन अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
कोर्ट ने बताई जांच की गंभीर खामियां
खंडपीठ ने कहा कि विभागीय जांच की पूरी प्रक्रिया ही मौलिक खामियों से ग्रस्त थी। अदालत ने पाया कि जांच के दौरान किसी भी गवाह से पूछताछ नहीं की गई थी। यहां तक कि शिकायतकर्ता, जिसके आरोपों के आधार पर कार्रवाई शुरू हुई थी, उसे भी जांच अधिकारी के सामने पेश नहीं किया गया।
कोर्ट ने यह भी कहा कि जांच अधिकारी ने केवल दस्तावेजों के आधार पर निष्कर्ष निकाल लिया, जबकि आरोपों की पुष्टि के लिए आवश्यक साक्ष्य और गवाहों की जांच नहीं की गई। यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है और ऐसी स्थिति में विभागीय दंड को न्यायोचित नहीं माना जा सकता।
सेवानिवृत्ति के बाद भी बरकरार रही राहत
अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि उमेश कुमार सिंह वर्ष 2022 में पुलिस सेवा से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। ऐसे में राज्य सरकार की अपील स्वीकार करने का कोई आधार नहीं बनता। अंततः खंडपीठ ने राज्य सरकार की अपील खारिज करते हुए सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी को मिली राहत को बरकरार रखा।
इस फैसले को विभागीय जांच और अनुशासनात्मक कार्रवाई से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है। अदालत ने अपने निर्णय से स्पष्ट संदेश दिया है कि किसी भी कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई करते समय प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन अनिवार्य है।






