झारखंड में ‘बैकफुट’ पर भाजपा! हजारीबाग कांड में फंसी नई टीम, पहला आंदोलन ही पड़ा भारी
झारखंड भाजपा की नई टीम को हजारीबाग हत्याकांड पर बड़ा झटका लगा। आरोपी के भाजपा कार्यकर्ता होने के आरोप के बाद पार्टी को अपना आंदोलन वापस लेना पड़ा, जिससे नई रणनीति पर सवाल उठ रहे हैं।
रांची (Threesocieties.com Desk): झारखंड में भाजपा की नई प्रदेश कमेटी को अपने पहले ही बड़े राजनीतिक इम्तिहान में करारा झटका लगा है। हजारीबाग में बच्ची की हत्या के विरोध में जोर-शोर से शुरू किया गया आंदोलन अचानक वापस लेना पड़ा, जिससे पार्टी की रणनीति और नेतृत्व पर गंभीर सवाल खड़े हो गये हैं।
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हजारीबाग कांड: मुद्दा उठाया, फिर खुद ही घिर गई भाजपा
हजारीबाग के कुसुंबा गांव में मासूम बच्ची की हत्या के मामले को भाजपा ने आक्रामक तरीके से उठाया। प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू ने रांची से लेकर दिल्ली तक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सरकार पर निशाना साधा और बड़े आंदोलन का ऐलान किया। लेकिन जैसे ही मामले की जांच आगे बढ़ी, घटनाक्रम ने राजनीतिक मोड़ ले लिया। पुलिस जांच में सामने आया कि मुख्य आरोपी भीम राम का संबंध भाजपा से जुड़ा बताया जा रहा है। सोशल मीडिया पर उसकी भाजपा नेताओं के साथ तस्वीरें वायरल होने लगीं।
झामुमो और कांग्रेस के हमले से बिगड़ा खेल
झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर आरोपी की भाजपा नेताओं के साथ तस्वीरें साझा कर भाजपा को घेर लिया। इसके बाद कांग्रेस भी मैदान में उतर गई और विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। राजनीतिक दबाव बढ़ता देख भाजपा को 9 अप्रैल को प्रस्तावित झारखंड बंद का आह्वान वापस लेना पड़ा। इस फैसले ने पार्टी की स्थिति को और असहज बना दिया।
जमीनी रिपोर्ट की कमी ने बिगाड़ी रणनीति
बताया जा रहा है कि प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू को जमीनी स्तर की सही जानकारी नहीं मिल पाई। स्थानीय नेताओं ने आरोपी के राजनीतिक जुड़ाव की जानकारी समय रहते साझा नहीं की, जिससे पूरी रणनीति गलत दिशा में चली गई। रामनवमी के दिन घटनास्थल पर पहुंचकर साहू ने पीड़ित परिवार से मुलाकात की और न्याय दिलाने का भरोसा दिया था। लेकिन बाद में हालात पलट गए और पार्टी को बैकफुट पर आना पड़ा।
बजट सत्र में भी फीका रहा प्रदर्शन
हाल ही में खत्म हुए झारखंड विधानसभा के बजट सत्र में भी भाजपा का प्रदर्शन अपेक्षाकृत कमजोर रहा। विपक्ष के तौर पर पार्टी सरकार को घेरने में प्रभावी नहीं दिखी। वहीं, निर्दलीय विधायक जयराम महतो और सरयू राय जैसे नेताओं ने सीमित संसाधनों के बावजूद सरकार को आक्रामक तरीके से चुनौती दी। आरोप है कि कई जिलो में चल रहे इलिगल माइनिंग व काम पर भी बीजेपी एमएलए चुप्पी साधे रहे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा आर्थिक और नीतिगत मुद्दों पर सरकार को घेरने में विफल रही।
नई टीम पर उठ रहे बड़े सवाल
हजारीबाग कांड ने भाजपा की नई प्रदेश कमेटी की रणनीति, समन्वय और जमीनी पकड़ पर सवाल खड़े कर दिए हैं। पहला ही आंदोलन वापस लेने की नौबत आने से पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचा है। अब देखना होगा कि भाजपा इस झटके से कैसे उबरती है और भविष्य में अपनी राजनीतिक रणनीति को किस तरह मजबूत करती है।






