22 साल बाद सुप्रीम कोर्ट से खरीदार को मिला इंसाफ, कब्जा लेने के बाद भी बिल्डर पर ठोक सकते हैं मुआवजे का दावा
सुप्रीम कोर्ट ने घर खरीदारों को बड़ी राहत देते हुए कहा है कि फ्लैट का कब्जा लेने के बाद भी बिल्डर द्वारा हुई देरी के लिए मुआवजे की मांग की जा सकती है। अदालत ने NCDRC का आदेश रद्द करते हुए कहा कि आर्बिट्रेशन क्लॉज भी खरीदारों को कंज्यूमर फोरम जाने से नहीं रोक सकता।
HighLights:
- सुप्रीम कोर्ट ने घर खरीदारों को बड़ी राहत देते हुए महत्वपूर्ण फैसला सुनाया
- फ्लैट का कब्जा लेने के बाद भी खरीदार बिल्डर से देरी का मुआवजा मांग सकते हैं
- अदालत ने NCDRC के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें खरीदार को कब्जे के बाद उपभोक्ता नहीं माना गया था
- आर्बिट्रेशन क्लॉज के बावजूद खरीदार कंज्यूमर फोरम में शिकायत दर्ज करा सकते हैं
- 22 साल पुराने द्वारका हाउसिंग प्रोजेक्ट मामले में सुप्रीम कोर्ट ने खरीदार के पक्ष में फैसला दिया
नई दिल्ली (Threesocieties.com Desk): देशभर के लाखों घर खरीदारों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और राहत भरा फैसला सुनाया है। सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि किसी बिल्डर या रियल एस्टेट कंपनी ने फ्लैट या मकान का कब्जा देने में देरी की है, तो खरीदार कब्जा प्राप्त करने के बाद भी उस देरी के लिए मुआवजे की मांग कर सकता है।
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सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में नेशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमीशन (NCDRC) के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें कहा गया था कि एक बार फ्लैट का कब्जा मिलने के बाद खरीदार उपभोक्ता नहीं रह जाता और वह मुआवजे का दावा नहीं कर सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने खरीदारों के अधिकारों को किया मजबूत
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि फ्लैट का कब्जा मिल जाना, कब्जा मिलने में हुई देरी के लिए मुआवजे के अधिकार को समाप्त नहीं करता। यदि बिल्डर ने तय समयसीमा के भीतर फ्लैट नहीं सौंपा है तो खरीदार को हुए आर्थिक और मानसिक नुकसान के लिए वह मुआवजे का हकदार रहेगा।
अदालत ने कहा कि खरीदार की शिकायत सिर्फ फ्लैट का कब्जा पाने तक सीमित नहीं होती, बल्कि समय पर कब्जा न मिलने से हुए नुकसान की भरपाई भी उसका अधिकार है।
NCDRC का आदेश हुआ रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने NCDRC की उस व्याख्या को गलत ठहराया जिसमें कहा गया था कि कब्जा मिलते ही खरीदार की उपभोक्ता की स्थिति समाप्त हो जाती है। अदालत ने कहा कि देरी से कब्जा देना एक अलग विवाद है और उसका निपटारा कब्जा मिलने के बाद भी किया जा सकता है।
आर्बिट्रेशन क्लॉज नहीं बनेगा बाधा
सर्वोच्च अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि बिल्डर और खरीदार के बीच हुए समझौते में यदि आर्बिट्रेशन (मध्यस्थता) का प्रावधान है, तब भी खरीदार को उपभोक्ता आयोग या कंज्यूमर फोरम में जाने से नहीं रोका जा सकता। इस फैसले से उन बिल्डरों को बड़ा झटका लग सकता है जो एग्रीमेंट में आर्बिट्रेशन क्लॉज का हवाला देकर उपभोक्ता मंचों से बचने की कोशिश करते रहे हैं।
22 साल पुराने मामले में मिला इंसाफ
यह मामला राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के द्वारका स्थित एक हाउसिंग प्रोजेक्ट से जुड़ा था। फ्लैट खरीदार ने वर्ष 2005 में जिला उपभोक्ता फोरम में शिकायत दर्ज कराई थी कि उसे फ्लैट का कब्जा तय समय से काफी देरी से दिया गया। हालांकि बाद में फ्लैट का कब्जा मिल गया, लेकिन मुआवजे की मांग को यह कहकर खारिज कर दिया गया कि अब वह उपभोक्ता नहीं रहा। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को अस्वीकार करते हुए खरीदार की शिकायत को फिर से बहाल कर दिया।
एक साल के भीतर फैसला देने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने जिला उपभोक्ता फोरम को निर्देश दिया है कि वह एक वर्ष के भीतर यह तय करे कि फ्लैट सौंपने में कितनी देरी हुई और क्या खरीदार मुआवजे का पात्र है।
रियल एस्टेट सेक्टर पर पड़ेगा असर
विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से रियल एस्टेट सेक्टर में जवाबदेही बढ़ेगी और बिल्डरों पर समय पर परियोजनाएं पूरी करने का दबाव बढ़ेगा। वहीं, वर्षों से देरी का सामना कर रहे लाखों घर खरीदारों को अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ने के लिए नया कानूनी आधार मिलेगा।
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
लाखों होमबायर्स को मिलेगा कानूनी संरक्षण।
बिल्डरों की मनमानी पर लगेगी रोक।
देरी से कब्जा मिलने पर भी मुआवजे का रास्ता खुला रहेगा।
उपभोक्ता आयोगों में शिकायत दर्ज कराने का अधिकार सुरक्षित रहेगा।
रियल एस्टेट सेक्टर में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ेगी।
यह फैसला देश के रियल एस्टेट क्षेत्र में उपभोक्ताओं के अधिकारों को मजबूत करने वाला एक महत्वपूर्ण न्यायिक कदम माना जा रहा है।






