70 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने दिया न्याय: जब मुकदमा शुरू हुआ था तब पैदा भी नहीं हुए थे फैसला सुनाने वाले जज
हरिद्वार के नरसीपुर कलां गांव की 15.5 बीघा जमीन को लेकर 1957 में शुरू हुआ विवाद आखिरकार 70 साल बाद सुप्रीम कोर्ट में सुलझ गया। चार पीढ़ियों तक चली कानूनी लड़ाई में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के फैसले पलटते हुए अपीलकर्ताओं को जमीन का असली मालिक माना।
HighLights
- हरिद्वार के नरसीपुर कलां गांव की 15.5 बीघा जमीन का था मामला
- 1957 में हुई खरीदारी पर शुरू हुआ विवाद 70 साल बाद खत्म
- सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसले पलटे
- एक ही परिवार की चार पीढ़ियां मुकदमेबाजी में उलझी रहीं
- फैसला सुनाने वाले जजों का जन्म भी केस शुरू होने के बाद हुआ था
- शीर्ष अदालत ने 1957 की रजिस्टर्ड सेल डीड को पूरी तरह वैध माना
नई दिल्ली (Threesocieties.com Desk): भारत की न्यायिक व्यवस्था में कई ऐसे मामले रहे हैं, जिनकी सुनवाई वर्षों तक चलती रही, लेकिन हाल ही में देश की सर्वोच्च अदालत ने एक ऐसे मामले का निपटारा किया, जिसने समय की लंबाई के सारे रिकॉर्ड लगभग छू लिए। हरिद्वार के नरसीपुर कलां गांव की 15.5 बीघा जमीन को लेकर शुरू हुआ विवाद करीब 70 वर्षों तक अदालतों और राजस्व विभाग के दफ्तरों में घूमता रहा और आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने इस पर अंतिम मुहर लगा दी।
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इस फैसले की सबसे दिलचस्प बात यह रही कि जिस वर्ष यानी 1957 में यह विवाद शुरू हुआ था, उस समय फैसला सुनाने वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ में शामिल जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया का जन्म भी नहीं हुआ था। यही वजह है कि यह मामला देशभर में चर्चा का विषय बना हुआ है।
1957 की सेल डीड से शुरू हुई थी कहानी
मामले की शुरुआत 4 जून 1957 को हुई, जब शराफत अली के पूर्वजों ने हरिद्वार के नरसीपुर कलां गांव में 15.5 बीघा जमीन एक रजिस्टर्ड सेल डीड के जरिए खरीदी थी। उस समय खरीदार नाबालिग थे, इसलिए जमीन की खरीद उनके पिता की ओर से की गई थी।हालांकि जमीन की खरीद के बाद नामांतरण यानी म्यूटेशन की प्रक्रिया के दौरान विक्रेता पक्ष ने आपत्ति दर्ज कराई। बाद में यह आपत्ति वापस ले ली गई और म्यूटेशन की अनुमति दे दी गई, लेकिन विवाद यहीं समाप्त नहीं हुआ।
चकबंदी के दौरान फिर भड़का विवाद
कुछ वर्षों बाद गांव में चकबंदी की प्रक्रिया शुरू हुई। इसी दौरान खरीदार पक्ष को पता चला कि राजस्व रिकॉर्ड में उनके नाम की जगह जमीन अब भी विक्रेता के नाम पर दर्ज है। चकबंदी अधिकारी ने पुराने रिकॉर्ड और म्यूटेशन के आधार पर खरीदार पक्ष के नाम जमीन दर्ज कर दी, लेकिन विक्रेता पक्ष ने फिर से इस फैसले को चुनौती दे दी। इसके बाद मामला फिर से कानूनी उलझनों में फंस गया।
समझौते और आपत्तियों का चलता रहा सिलसिला
वर्षों तक राजस्व विभाग में आपत्तियों और समझौतों का दौर चलता रहा। एक समय ऐसा भी आया जब विक्रेता पक्ष ने समझौते के आधार पर अपनी आपत्तियां वापस ले लीं, लेकिन चूंकि उस समझौते पर सभी पक्षों के हस्ताक्षर नहीं थे, इसलिए बाद में कुछ अन्य लोगों ने फिर से मालिकाना हक पर सवाल उठा दिए। इस तरह मामला राजस्व अधिकारियों से निकलकर सिविल अदालतों तक पहुंच गया और कानूनी लड़ाई लंबी होती चली गई।
चार पीढ़ियां लड़ती रहीं मुकदमा
यह विवाद केवल अदालतों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि एक परिवार की चार पीढ़ियों को प्रभावित करता रहा। जमीन खरीदने वाले पूर्वजों से शुरू हुई यह लड़ाई उनके बच्चों, फिर पोते और आखिरकार परपोते तक पहुंच गई। इस दौरान शराफत अली का भी निधन हो गया और उनके कानूनी उत्तराधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट में यह लड़ाई जारी रखी। आखिरकार चार पीढ़ियों की मेहनत और संघर्ष रंग लाई।
ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट ने खारिज किया था दावा
ट्रायल कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि यह सेल डीड भूमि सीलिंग कानून से बचने के उद्देश्य से तैयार की गई थी, इसलिए इसे शून्य माना जाएगा। बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी 2017 में अपीलकर्ताओं की याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां अपीलकर्ताओं ने अपने पक्ष में ठोस दस्तावेज और रिकॉर्ड पेश किए।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि 1957 की रजिस्टर्ड सेल डीड को अवैध साबित करने के लिए धोखाधड़ी, जालसाजी या किसी प्रकार की फर्जीवाड़े का कोई ठोस प्रमाण पेश नहीं किया गया। अदालत ने यह भी कहा कि गवाहों के बयानों में ऐसा कोई विरोधाभास नहीं पाया गया, जिससे दस्तावेज की वैधता पर सवाल उठाया जा सके। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसलों को पलटते हुए अपीलकर्ताओं को जमीन का वास्तविक मालिक घोषित कर दिया।
न्याय व्यवस्था के लिए एक बड़ा संदेश
यह फैसला केवल एक जमीन विवाद का अंत नहीं है, बल्कि यह भारतीय न्याय व्यवस्था में लंबी मुकदमेबाजी की चुनौती को भी सामने लाता है। एक ऐसा मामला, जिसने देश के सभी प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल को देखा, आखिरकार अपने अंतिम पड़ाव तक पहुंच गया।साथ ही यह फैसला यह भी दर्शाता है कि यदि दस्तावेज और कानूनी आधार मजबूत हों, तो दशकों पुरानी लड़ाई में भी न्याय मिल सकता है।
ऐसे शुरू हुआ जमीन विवाद का मामला जो 70 साल चला
खरीददार के नाम पर जमीन के म्यूटेशन के समय, बेचने वाले ने शुरू में आपत्ति जताई थी, लेकिन बाद में उसने अपनी आपत्ति वापस ले ली ताकि राजस्व अधिकारी अपील करने वालों के पक्ष में जमीन का म्यूटेशन कर सकें। जब गांव में जमीन के चकबंदी की प्रक्रिया शुरू हुई, तो अपील करने वालों ने पाया कि खरीदी गई जमीन के मालिक के तौर पर उनका नाम गायब था और वह अभी भी बेचने वाले के नाम पर ही दर्ज थी। चकबंदी अधिकारी ने म्यूटेशन रिकॉर्ड के आधार पर अपील करने वालों के नाम जमीन के मालिक के तौर पर दर्ज कर दिए।
चकबंदी में उलझ गया मामला
बाद में इस मामले को चुनौती दी गई। चकबंदी अधिकारी ने मामले की फिर से जांच का आदेश दिया। हालांकि, जमीन बेचने वालों ने फिर अपना रुख बदला और दोनों पक्षों के बीच हुए समझौते के आधार पर अपनी आपत्तियां वापस ले लीं। लेकिन चूंकि समझौते पर सभी पक्षों ने साइन नहीं किए थे, इसलिए कुछ साल बाद कुछ अन्य लोगों ने राजस्व रिकॉर्ड में अपील करने वालों को जमीन का मालिक दर्ज किए जाने को चुनौती दी।
लओर कोर्ट से शुरू होकर मुकदमा सुप्रीम कोर्ट पहुंचा
राजस्व विभाग में अपील करने वालों के लिए उतार-चढ़ाव का दौर तब तक जारी रहा जब तक उन्होंने ट्रायल कोर्ट में केस दायर नहीं किया। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि सेल डीड अमान्य थी क्योंकि इसे जमीन की सीलिंग से जुड़े कानून से बचने के लिए किया गया था। 2017 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपील करने वालों की अपील खारिज कर दी।
अपील करने वाले ही जमीन के असली मालिक
हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर, जस्टिस मिश्रा और जस्टिस अंजारिया की सुप्रीम कोर्ट बेंच ने कहा, 'रजिस्टर्ड सेल डीड, उससे जुड़ी कानूनी मान्यता, धोखाधड़ी या जालसाजी का कोई ठोस आरोप न होना, और गवाह के बयान में कोई अहम विरोधाभास न ढूंढ पाना - इन सभी बातों को मिलाकर देखें तो चकबंदी अधिकारियों के निष्कर्ष और हाई कोर्ट द्वारा उनकी पुष्टि, कानून की नजर में टिक नहीं पाते हैं।' कोर्ट ने माना कि अपील करने वाले ही जमीन के असली मालिक थे।






